ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा
हिमाचल प्रदेश में नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष चुनाव में विधायकों के वोटिंग अधिकार को लेकर कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर दी है।
क्या है पूरा मामला?
राज्य सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी कर स्थानीय विधायकों को नगर निकायों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में, बराबर पार्षद होने की स्थिति में ‘वोट’ (बोर्ड) डालने का अधिकार दिया था। इसे हिमाचल हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 4 जून को पारित आदेश में रोक लगा दी थी। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की पीठ ने स्पष्ट किया था कि पदेन सदस्य यानी विधायक इन शीर्ष पदों के चुनाव में मतदान नहीं कर सकते; अध्यक्ष का चुनाव केवल चुने हुए पार्षद ही करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 15 जून को
राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के इस अंतरिम आदेश को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायाधीश अतुल एस. चांद्रकर की पीठ के समक्ष यह मामला 15 जून के लिए सूचीबद्ध किया गया है। वहीं, दूसरी ओर पार्षदों ने भी शीर्ष अदालत में कैविट पिटीशन दाखिल कर दी है, जिससे मामला और रोचक हो गया है।
अधिकारों का क्या है दायरा?
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि विधायकों के अधिकार पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। वे अधिनियम की धारा 28, 30, 31 और 32 के तहत होने वाली सामान्य बैठकों या समितियों की बैठकों में भाग ले सकते हैं और अन्य सामान्य प्रशासनिक मुद्दों पर अपना वोट डाल सकते हैं। सरकार ने अपने तर्कों में विधायकों को पूर्ण वोटिंग अधिकार देने की पैरवी की थी, जिसे हाई कोर्ट ने फिलहाल खारिज कर दिया है।
अब सबकी निगाहें 15 जून को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं कि क्या विधायकों को अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनाव में वोटिंग का अधिकार बरकरार रहेगा या पार्षदों का वर्चस्व बना रहेगा।
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