प्रशासनिक सुधारों, कैडर कटौती और ₹200 करोड़ की बचत के दावों पर पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव तरुण श्रीधर से ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा की तीखी और बेबाक बातचीत
पंजाब दस्तक विशेष
शिमला: हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के स्वीकृत पद 153 से घटाकर 130, भारतीय वन सेवा (IFS) के 118 से घटाकर 83 और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के कैडर में भी कटौती कर सालाना लगभग ₹200 करोड़ बचाने के दावे ने प्रशासनिक, राजनीतिक और नीतिगत हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है।
क्या गंभीर वित्तीय संकट और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से जूझ रहे हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य में केवल शीर्ष अधिकारियों की संख्या कम कर देने से सुशासन, त्वरित विकास और वित्तीय अनुशासन संभव है? क्या पदों में कटौती से सचिवालय की कार्यप्रणाली वास्तव में चुस्त होगी या फिर बची हुई व्यवस्था पर काम का बोझ और बढ़ जाएगा?
इन्हीं नीतिगत, संवैधानिक और जमीनी सवालों की तह तक जाने के लिए पंजाब दस्तक के ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा ने हिमाचल प्रदेश के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS), भारतीय खाद्य एवं कृषि परिषद के महानिदेशक तथा पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी तरुण श्रीधर से टेलीफोन पर विशेष और बेबाक चर्चा की।
श्रीधर ने साफ और दो-टूक शब्दों में कहा—”कैंची चलाना सरल है, लेकिन समझदारी यह जानने में है कि काटना किसे है—सूखी शाखा या पेड़ की जड़? प्रशासन छोटा हो, दुर्बल नहीं। यदि प्रशासनिक कार्यकुशलता केवल अफसरों की संख्या घटाने पर निर्भर होती, तो समाधान बहुत सीधा था—संख्या आधी कर दीजिए, प्रशासन दोगुना दक्ष हो जाएगा! लेकिन शासन का गणित इतना सीधा नहीं होता। भवन की मरम्मत करते समय चौखट निकालने से पहले छत का भार देखना अनिवार्य है।”
पेश हैं इस विशेष टेलीफोनिक संवाद के प्रमुख अंश:
सुरेंद्र राणा: सरकार का तर्क है कि 100 से 110 आईएएस अफसरों से हिमाचल का कामकाज आसानी से चल सकता है और इससे लगभग ₹200 करोड़ प्रति वर्ष बचेंगे। इस वित्तीय गणित और मितव्ययिता के दावे को आप किस नजरिए से देखते हैं?
तरुण श्रीधर: वित्तीय अनुशासन स्वागत योग्य है और करदाता के पैसे से चलने वाली व्यवस्था को प्रत्येक रुपये का औचित्य सिद्ध करना चाहिए। लेकिन क्या अफसरों की संख्या घटते ही शासन चुस्त और खर्चे कम हो जाएंगे?
यह समझना जरूरी है कि अखिल भारतीय सेवाएं (IAS, IPS, IFS) क्या हैं। संविधान के अनुच्छेद 312 के तहत ये न तो पूरी तरह केंद्रीय सेवाएं हैं और न ही सामान्य राज्य सेवाएं। इनकी भर्ती राष्ट्रीय स्तर पर होती है, अधिकारी राज्यों को आवंटित किए जाते हैं और आवश्यकता पड़ने पर केंद्र में भी सेवाएं देते हैं।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने इन्हें भारत के प्रशासनिक ढांचे की ‘इस्पाती चौखट’ (स्टील फ्रेम) कहा था, ताकि राजनीतिक सरकारें बदलने के बावजूद शासन में निरंतरता बनी रहे, राष्ट्रीय नीतियां स्थानीय परिस्थितियों से जुड़ें और संकट के समय जिले से दिल्ली तक एक मजबूत व परिचित प्रशासनिक श्रृंखला उपलब्ध रहे।
आज उस चौखट पर कहीं जंग और कहीं टेढ़ापन हो सकता है, लेकिन भवन की मरम्मत करते समय चौखट निकालने से पहले छत का भार देखना आवश्यक है। बिना भार आंके चौखट खींचने से पूरा ढांचा कमजोर पड़ सकता है।
सुरेंद्र राणा: आबादी के लिहाज से हिमाचल एक छोटा राज्य है, तो फिर यहां इतने बड़े प्रशासनिक कैडर की आवश्यकता क्यों है?
तरुण श्रीधर: आबादी प्रशासनिक आवश्यकता का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकती। हिमाचल की भौगोलिक दुर्गमता, अंतरराष्ट्रीय सीमावर्ती स्थिति, विशाल वन क्षेत्र, बिखरी आबादी, जनजातीय इलाके, पर्यटन का भारी दबाव, जल विद्युत परियोजनाएं, आपदा संवेदनशीलता और जलवायु परिवर्तन—इनका भार किस जनसंख्या अनुपात से मापा जाएगा?
लाहौल-स्पीति की आबादी कम है, तो क्या वहां प्रशासन की आवश्यकता भी कम हो जाती है? किन्नौर में भूस्खलन अथवा चंबा के पांगी-भरमौर जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में जब भीषण आपदा आती है, तो क्या जनसंख्या का छोटा आंकड़ा राहत पहुंचाएगा या मौके पर मौजूद अनुभवी प्रशासनिक नेतृत्व?
सुरेंद्र राणा: स्वीकृत कैडर, उपलब्ध अधिकारियों और वास्तविक तैनाती के मौजूदा आंकड़ों की क्या हकीकत है?
तरुण श्रीधर: स्वीकृत कैडर संख्या, सेवा में उपलब्ध और वास्तव में तैनात अधिकारियों की संख्या में हमेशा बड़ा अंतर होता है। कुछ अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति, प्रशिक्षण या अवकाश पर होते हैं और कुछ पद हमेशा रिक्त रहते हैं। कैडर में जिलों और विभागों के साथ प्रतिनियुक्ति व प्रशिक्षण के लिए आवश्यक आरक्षित पद भी शामिल होते हैं:
मौजूदा स्थिति: हिमाचल में आईएएस के 153 स्वीकृत पदों के विरुद्ध वास्तव में लगभग 127 अधिकारी ही नियुक्त हैं।
सीधी भर्ती बनाम पदोन्नति: सीधी भर्ती के 107 स्वीकृत पदों में से केवल 83 भरे हैं, जबकि राज्य प्रशासनिक सेवा (HAS) से पदोन्नति के 46 पदों के कोटे में 44 अधिकारी सेवारत हैं।
153 से ठीक 130 का आंकड़ा किसी वैज्ञानिक ‘कार्यभार अध्ययन’ (Workload Assessment) पर आधारित नहीं लगता। ₹200 करोड़ की बचत का दावा भी तत्काल संभव नहीं है, क्योंकि वर्तमान अधिकारी तो सेवा में ही रहेंगे। यह बचत कई वर्षों बाद क्रमिक सेवानिवृत्ति और कम भर्ती के बाद ही दिखाई देगी। वित्तीय अनुशासन ठोस और पारदर्शी गणना से बनता है, केवल घोषणाओं से नहीं।
सुरेंद्र राणा: कैडर में कटौती का सबसे सीधा और गंभीर प्रभाव राज्य प्रशासनिक सेवा (HAS) के अधिकारियों पर क्या पड़ेगा?
तरुण श्रीधर: अखिल भारतीय सेवा में 33.33% पद राज्य सिविल सेवा के अधिकारियों को पदोन्नति के माध्यम से देने का प्रावधान है। यदि कुल कैडर घटता है, तो संभावित रूप से पदोन्नति के अवसरों का सीधा नुकसान राज्य सेवा के अधिकारियों को होगा, जिससे प्रांतीय संवर्ग में भारी निराशा उत्पन्न हो सकती है।
आज कागज से पद हटाना आसान है, लेकिन 15 वर्ष बाद अनुभवी अधिकारियों की जो कमी पैदा होगी, उसे पूरा करना अत्यंत कठिन होगा। राज्य सेवा से आए अधिकारी स्थानीय समाज, भूगोल, राजस्व परंपराओं और प्रशासनिक व्यवहार को बहुत गहराई से जानते हैं। दूसरी ओर, सीधी भर्ती के अधिकारी व्यापक प्रशिक्षण, अंतर-राज्यीय अनुभव और नीति स्तर का राष्ट्रीय दृष्टिकोण लाते हैं। अच्छा प्रशासन इन दोनों धाराओं के सहयोग से बनता है, प्रतिस्पर्धा से नहीं। यदि पदोन्नति की राह संकरी हो गई, तो प्रशासनिक संतुलन बिगड़ जाएगा।
सुरेंद्र राणा: क्या राज्य सरकार अपने स्तर पर अखिल भारतीय सेवाओं का कैडर घटाने का अंतिम निर्णय ले सकती है?
तरुण श्रीधर: कानूनी और संवैधानिक रूप से बिल्कुल नहीं। संविधान के अनुच्छेद 312 और सेवा नियमों के तहत अखिल भारतीय सेवा कैडर की संख्या और संरचना का पुनरीक्षण केंद्र सरकार (DoPT) राज्य से परामर्श करके ही करती है। राज्य सरकार केवल प्रस्ताव भेज सकती है। इसलिए मुख्यमंत्री की घोषणा कोई अंतिम आदेश नहीं, बल्कि केंद्र के साथ औपचारिक विमर्श और प्रक्रिया की शुरुआत मात्र है।
सुरेंद्र राणा: सचिवालय में सलाहकारों, विशेष सचिवों और फाइलों के लंबे सफर के बीच वास्तविक प्रशासनिक सुधार का क्या रास्ता होना चाहिए?
तरुण श्रीधर: निर्णय के पक्ष में यह मजबूत तर्क है कि प्रशासन में अनेक पद कार्य की आवश्यकता से अधिक अधिकारियों को संयोजित करने के लिए बने प्रतीत होते हैं—विशेष सचिव, अतिरिक्त सचिव, सलाहकार और मिशन निदेशक। कभी-कभी एक काम के लिए इतने अधिकारी हो जाते हैं कि काम स्वयं भ्रमित हो जाए कि फाइल किसके पास जाए। यदि सरकार पद-आधारित नहीं बल्कि कार्य-आधारित व्यवस्था बनाना चाहती है, तो यह उपयोगी सुधार हो सकता है।
लेकिन केवल शीर्ष अधिकारियों की संख्या घटाना पर्याप्त नहीं है। ऊपर से कुछ अफसर हटाकर नीचे वही उलझी फाइल प्रक्रियाएं छोड़ दी जाएं, तो बोझ कम नहीं होगा—वह शेष अधिकारियों की मेज पर स्थानांतरित हो जाएगा:
प्रक्रियाओं की कैंची चले: अनावश्यक अनुमतियां, कई स्तरों के हस्ताक्षर और फाइलों का लंबा चक्रव्यूह समाप्त हो।
विशेषज्ञता और युक्तिकरण: जहां विशेषज्ञता की आवश्यकता है वहां विशेषज्ञ ही लगाए जाएं और अनावश्यक पदों को समाप्त किया जाए।
क्षमता और अधिकार: राज्य सेवाओं को बेहतर प्रशिक्षण, अधिकार और सम्मान देकर मजबूत बनाया जाए।
सीधी जवाबदेही: डिजिटल युग के अनुकूल अधिकारियों को स्पष्ट कार्य और सीधी जवाबदेही सौंपी जाए।
उत्तर आकर्षक आंकड़ों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि कार्यभार, भविष्य की चुनौतियों और सार्वजनिक हित के ठोस अध्ययन से निकलना चाहिए। प्रशासन छोटा हो, दुर्बल नहीं। बड़ा कैडर दक्षता की गारंटी नहीं है, तो अंधाधुंध कटौती भी मितव्ययिता का हल नहीं है। कैंची चलाना सरल है, लेकिन समझदारी यह जानने में है कि काटना किसे है—सूखी शाखा या पेड़ की जड़।
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