हिमाचल में पेंशनरों का आंदोलन और सुक्खू सरकार के खिलाफ प्रदर्शन

पेंशनरों से वादाखिलाफी पर सुक्खू सरकार के खिलाफ आर-पार की जंग: 13 मई के फैसले से मुकरने पर भड़कीं 18 यूनियंस, लगातार उग्र आंदोलन का बिगुल

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​सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक, हिमाचल प्रदेश
​शिमला:

हिमाचल प्रदेश में पेंशनरों और कर्मचारियों की लंबित वित्तीय देनदारियों को लेकर प्रदेश की सुक्खू सरकार के खिलाफ आक्रोश की ज्वाला भड़क उठी है। 18 प्रमुख कर्मचारी एवं पेंशनर संगठनों के साझा मंच ‘संयुक्त संघर्ष समिति’ ने सरकार की वादाखिलाफी और दोहरे मापदंडों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का खुला ऐलान कर दिया है। समिति ने दो टूक चेतावनी दी है कि वर्षों तक प्रदेश के विकास में पसीना बहाने वाले बुजुर्ग पेंशनरों के साथ हो रहे सौतेले व्यवहार को अब कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और हक मिलने तक सड़कों पर लगातार उग्र आंदोलन जारी रहेगा।


​संयुक्त संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश ठाकुर, अतिरिक्त महासचिव भूप राम वर्मा और मीडिया प्रभारी सेन राम नेगी ने शिमला से संयुक्त प्रेस बयान जारी करते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा जारी हालिया अधिसूचना पूरी तरह से दिशाहीन और पेंशनरों की पीठ में छुरा घोंपने जैसी है। यह आदेश 13 मई 2026 को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के साथ हुई आधिकारिक बैठक में बनी सर्वसम्मत सहमति के सीधे विपरीत है। उस बैठक में मुख्यमंत्री ने स्वयं भरोसा दिलाया था कि संबंधित श्रेणी के पेंशनरों को 31 जुलाई 2026 तक उनके कुल बकाए का 40-40 प्रतिशत भुगतान कर दिया जाएगा, जिसके दायरे में ग्रेच्युटी (Gratuity), लीव इनकैशमेंट (छुट्टियों का नकद भुगतान) और कम्यूटेशन शामिल था।


​नेताओं ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जारी आदेशों में ग्रेच्युटी और लीव इनकैशमेंट का नामोनिशान तक नहीं है, न ही 15 प्रतिशत महंगाई भत्ते (DA) को लेकर कोई स्थिति स्पष्ट की गई है। पिछले 10 वर्षों से पेंशनरों का जायज एरियर दबाकर बैठी सरकार अब इसे 35 और 15 फीसदी की किस्तों में देने का तुगलकी फरमान जारी कर रही है, जो बुजुर्गों के स्वाभिमान के साथ सीधा खिलवाड़ है।


​समिति ने सरकार की कार्यशैली पर कड़ा हमला बोलते हुए सवाल उठाया कि जब मुख्यमंत्री खुद मंचों से प्रदेश में किसी भी प्रकार का वित्तीय संकट न होने का दावा करते हैं, तो फिर जीवनभर सेवाएं देने वाले पेंशनरों की देनदारियां रोकने का क्या औचित्य है? एक तरफ वित्तीय संकट का बहाना बनाया जाता है, वहीं दूसरी तरफ बोर्डों और निगमों में चेयरमैन, वाइस चेयरमैन, राजनीतिक सलाहकारों और डिप्टी एडवोकेट जनरलों की भारी-भरकम फौज खड़ी कर सरकारी खजाने की खुली बर्बादी की जा रही है। हाल ही में चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का दैनिक भत्ता ₹400 से सीधे बढ़ाकर ₹1200 कर दिया गया और चहेतों को धड़ल्ले से पुनर्रोजगार की रेवड़ियां बांटी जा रही हैं। फिजूलखर्ची के लिए खजाना खुला है, लेकिन बुजुर्गों के वैध अधिकारों के समय सरकार हाथ खड़े कर देती है।


​संयुक्त संघर्ष समिति ने पेंशनर वर्ग के बीच सक्रिय तथाकथित मुट्ठी भर ‘सरकारी पिट्ठुओं’ को भी सीधी चुनौती दी है। नेताओं ने कहा कि ये स्वार्थी तत्व सरकार की चाटुकारिता और झूठा गुणगान बंद करें। यदि उनमें जरा भी गैरत और पेंशनरों का समर्थन है, तो वे सड़कों पर उतरकर सरकार की कर्मचारी-विरोधी नीतियों का विरोध करें और पेंशनरों को गुमराह करने की साजिशें छोड़ें।


​प्रदेश अध्यक्ष सुरेश ठाकुर व अतिरिक्त महासचिव भूप राम वर्मा ने प्रदेश भर के पेंशनरों और कर्मचारी संगठनों से अपील की है कि वे इन चाटुकारों के बहकावे में न आएं और अपने हकों की इस निर्णायक जंग में संयुक्त संघर्ष समिति के झंडे तले एकजुट हों। कर्मचारी नेता भी निजी स्वार्थों को त्यागकर एरियर और महंगाई भत्ते की साझा लड़ाई में खुलकर साथ आएं। समिति ने साफ कर दिया है कि यह आंदोलन अब एक दिन के सांकेतिक धरने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूर्ण देनदारियां मिलने तक लगातार चलेगा, जिसकी पूरी जवाबदेही शासन-प्रशासन की होगी।


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