विनाक्षी | पंजाब दस्तक, शिमला
शिमला:
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ (डबल बेंच) ने सेवानिवृत्ति के बाद 10 वर्षों तक सरकारी आवास पर अनधिकृत कब्जा जमाए रखने के गंभीर मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली डबल बेंच ने स्वास्थ्य विभाग के रिटायर डॉक्टर को किसी भी तरह की कानूनी राहत देने से दो-टूक इनकार कर दिया। खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को सही ठहराते हुए डॉक्टर पर लगाई गई 12.90 लाख रुपये की भारी-भरकम पेनल्टी और 50 हजार रुपये के अदालती जुर्माने को पूरी तरह बरकरार रखा है।
अवैध कब्जे पर हाईकोर्ट की डबल बेंच की सख्त टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कड़ी नाराजगी जताते हुए स्पष्ट किया कि सरकारी आवास किसी की निजी जागीर नहीं हैं। सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद आवास खाली करना अनिवार्य वैधानिक नियम है। अदालत ने टिप्पणी की:
एक उच्च पदस्थ और शिक्षित चिकित्सा अधिकारी द्वारा नियमों को ताक पर रखकर 10 वर्षों तक सरकारी संपत्ति पर कब्जा बनाए रखना सीधे तौर पर कानून और व्यवस्था का खुला उल्लंघन है।
ऐसे अनधिकृत कब्जों के कारण सेवा में कार्यरत अन्य डॉक्टरों और कर्मचारियों को आवास की भारी किल्लत झेलनी पड़ती है, जिसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासनिक कार्यों पर पड़ता है।
अदालत ने साफ कहा कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और जनहित से जुड़ी संपत्तियों पर इस तरह की मनमानी को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
10 वर्षों की मनमानी पर 12.90 लाख की पेनल्टी और 50 हजार जुर्माना
स्वास्थ्य विभाग में सेवाएं देने के बाद उक्त डॉक्टर सरकारी आवास में लगातार काबिज रहे। विभाग द्वारा बार-बार नोटिस जारी किए जाने के बावजूद आवास खाली करने में आनाकानी की गई।
इस लंबी अवधि के अनधिकृत उपयोग के एवज में विभाग और प्रशासनिक नियमों के तहत 12 लाख 90 हजार रुपये का बाजार किराया/पेनल्टी निर्धारित की गई थी। इसके अतिरिक्त न्यायिक प्रक्रिया और नियमों की अवहेलना पर 50 हजार रुपये का अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया गया था।
डबल बेंच में भी नहीं मिली कोई राहत
एकल पीठ के सख्त आदेश के खिलाफ रिटायर डॉक्टर ने मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ में अपील दायर कर पेनल्टी और जुर्माने में राहत मांगी थी। लेकिन डबल बेंच ने तथ्यों और दस्तावेजों का बारीकी से परीक्षण करने के बाद याचिका को पूरी तरह आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि वसूली की यह पूरी राशि तय समयसीमा के भीतर सरकारी खजाने में जमा करवाई जाए।
प्रशासनिक हलकों में हाईकोर्ट के इस कड़े रुख की सराहना की जा रही है। माना जा रहा है कि इस फैसले से उन तमाम पूर्व अधिकारियों और कर्मचारियों में कड़ा संदेश जाएगा जो सेवानिवृत्ति के बावजूद सरकारी बंगलों और क्वार्टरों पर कब्जा जमाए बैठे रहते हैं।
दर्शकों और पाठकों से अपील:
सरकारी संपत्तियों पर अवैध कब्जे को लेकर हाईकोर्ट की डबल बेंच के इस कड़े फैसले पर आपकी क्या राय है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें, हमें आपके विचारों का इंतजार रहेगा।
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