पंजाब दस्तक
विशेष ब्यूरो रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा (ब्यूरो चीफ)
अयोध्या/ब्यूरो। दशकों के लंबे इंतजार, कड़े संघर्ष, असंख्य कुर्बानियों और माननीय अदालत के ऐतिहासिक फैसले के बाद आज भव्य राम मंदिर लगभग बनकर तैयार है। देश-विदेश के राम भक्तों की अटूट आस्था का केंद्र बन चुके इस पावन धाम से इस समय एक ऐसा संवेदनशील विवाद सामने आ रहा है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। ‘पंजाब दस्तक’ के ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा अयोध्या की जमीन से इस पूरे मामले का ऐसा तीखा और विस्तृत विश्लेषण लेकर आए हैं, जो आज हर राम भक्त के दिल में सुलग रहा है।
सवाल यह उठ रहा है कि जो मुद्दा इतने वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद सुलझा था, क्या वह व्यवस्था की एक छोटी सी लापरवाही और ढिलाई के कारण फिर से राजनीतिक पार्टियों के हाथ में एक नया हथियार बन जाएगा? अगर ट्रस्ट ने समय रहते इन प्रशासनिक कमियों को पहचान कर सुधार लिया होता, तो आज देश के हर चैनल पर यह मुद्दा न बनता और न ही विपक्षी पार्टियों को राम मंदिर के पवित्र नाम पर राजनीति करने, उंगलियां उठाने और तीखे बयान देने का कोई मौका मिलता।
ईमानदारी पर शक नहीं, लेकिन जिम्मेदारी और जवाबदेही से पल्ला क्यों?
’पंजाब दस्तक’ और देश का कोई भी राम भक्त चंपत राय जी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर रत्ती भर भी शक नहीं कर रहा है। उत्तर प्रदेश की जनता, देश-विदेश के नागरिक और हर वर्ग के लोग भली-भांति मानते हैं कि वे एक बेहद ईमानदार, समर्पित और नेक इंसान हैं। उनकी निष्ठा और शुचिता का सभी पूरा सम्मान करते हैं। लेकिन यहाँ सवाल उनकी नीयत का है ही नहीं, सवाल पूरी तरह से ‘प्रशासनिक विफलता’ और ‘लापरवाही’ का है।
अक्सर देखा जाता है कि किसी भी सरकार या व्यवस्था के अधीन काम करने वाले नीचे के कर्मचारी और अधिकारी ही हेराफेरी या वित्तीय गड़बड़ी करते हैं, लेकिन उसका पूरा खामियाजा और बदनामी शीर्ष पर बैठी व्यवस्था या सरकार को भुगतनी पड़ती है। ठीक वैसा ही आज राम मंदिर ट्रस्ट के साथ होता दिख रहा है। यह बात साफ है कि गड़बड़ी नीचे के स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों या बैंक के स्तर पर हुई है, लेकिन ट्रस्ट के मुख्य कर्ता-धर्ता और प्रशासनिक मुखिया होने के नाते चंपत राय जी की जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। यह मामला व्यवस्था पर किए गए ‘अंधविश्वास’ और अति-आत्मविश्वास का है, जिसके कारण कर्मचारियों को इतनी बड़ी ढील मिल गई कि वे आस्था के खजाने में सेंध लगाने की जुर्रत कर बैठे।
जब साक्षात लक्ष्मी मां का खेल हो, तो निगरानी ‘अभेद्य’ क्यों नहीं रखी गई?
देश-विदेश से करोड़ों राम भक्त अपनी अटूट श्रद्धा के साथ अयोध्या पहुंच रहे हैं। कोई अपनी गाढ़ी कमाई से पेट काटकर, अपनी सुख-सुविधाओं को त्यागकर पाई-पाई जोड़कर दान कर रहा है, तो कोई सोने-चांदी के रूप में अपनी पूरी आस्था प्रभु श्री राम के चरणों में अर्पित कर रहा है। जहां साक्षात ‘लक्ष्मी मां’ का ऐसा अद्भुत खेल हो रहा हो और हर रोज करोड़ों का प्रत्यक्ष और गुप्त चढ़ावा आ रहा हो, वहां सुरक्षा, सतर्कता और प्रशासनिक चौकसी का स्तर सबसे ऊंचा और सख्त होना चाहिए था। लेकिन इस पूरे मामले में जो ढिलाई सामने आई है, उसने सुरक्षा चक्र पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
कुर्सियों का आराम और दरियों की जगह चूक: राम भक्तों का सबसे बड़ा और तीखा सवाल यह है कि नोटों की गिनती की व्यवस्था जमीन पर खुली दरी बिछाकर क्यों नहीं की गई? कर्मचारियों को कुर्सियों पर बैठकर पैसे गिनने की छूट क्यों दी गई? कुर्सियों पर आराम से बैठने के कारण ही कर्मचारियों को यह मौका मिल गया कि वे धीरे-धीरे पैसों को नीचे सरकाते हुए अपनी जेबों में डालते रहे। आखिर पैसे गिनने वाले कर्मचारियों के कपड़ों में जेबें लगी ही क्यों थीं?
पल-पल की कड़ाई और निगरानी का अभाव: इतनी संवेदनशील जगह पर ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए थी कि चार-पांच विशेष लोग अलग से तैनात रहते जो सिर्फ गिनती करने वालों पर सीधी नजर रखते। पल-पल की फुटेज को कैमरों के जरिए लाइव देखा जाना चाहिए था। यहाँ तक कि जो बंदा बीच में बाथरूम भी जा रहा है, उस पर भी कड़ी नजर होनी चाहिए थी कि वह कहाँ जा रहा है और क्या कर रहा है।
गेट से लेकर बैंक तक सुरक्षा में लूपहोल्स: इस पूरे चक्र में सुरक्षा का एक अभेद्य सिस्टम होना चाहिए था। सीमित और सुरक्षा जांच वाले गेट बनाए जाने चाहिए थे, जहाँ से एक-एक कर्मचारी को पूरी तरह चेक करके ही बाहर निकाला जाता। केवल कर्मचारी ही क्यों—जो गाड़ियां वहां आ-जा रही थीं, उन गाड़ियों की सघन चेकिंग होनी चाहिए थी, यहाँ तक कि ड्राइवरों की भी पूरी जांच होनी चाहिए थी। दानपात्र से लेकर बैंक तक पैसे ले जाने वाली गाड़ियों की संख्या, उनके आने-जाने के समय और पूरे रूट पर ऐसी चौकसी होती कि परिंदा भी पर न मार सके। आखिर ट्रस्ट ने इस पूरी चेन पर पैनी नजर क्यों नहीं रखी?
६ महीने पहले क्यों नहीं उठाया गया कदम?: जब इस गड़बड़ी की भनक महीनों पहले लग चुकी थी, तो इसे आंतरिक जांच के जरिए तभी उजागर करके कड़े और दंडात्मक कदम क्यों नहीं उठाए गए? इस मामले को दबाए रखने या ढील देने की देरी ने ही आज इस विवाद को इतना बड़ा रूप दे दिया है कि यह पूरे देश में वायरल हो रहा है।
ऑडिट और इंटरनल सिस्टम की बड़ी नाकामी
इस पूरे घटनाक्रम ने ट्रस्ट के आंतरिक ऑडिट और सुरक्षा चक्र की पोल खोलकर रख दी है। जब देश-विदेश से हर रोज लाखों-करोड़ों का प्रत्यक्ष और गुप्त दान आ रहा हो, तो वहां रोजाना या साप्ताहिक स्तर पर खातों का गहन मिलान (ऑडिट) क्यों नहीं किया गया? अगर बैंक और ट्रस्ट के बीच तालमेल मजबूत होता, तो बैंक के किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वे भक्तों की इस गाढ़ी कमाई में हेरफेर कर पाते।
श्रद्धा तो अटूट रहेगी, पर राजनीति को थाली में परोस कर मिला नया मौका
’पंजाब दस्तक’ का मुख्य उद्देश्य किसी की आलोचना या व्यक्तिगत निंदा करना नहीं है। राम भक्तों की श्रद्धा भगवान राम के प्रति हमेशा अटूट रहेगी, उनका समर्पण और विश्वास कभी कम नहीं होगा। परंतु, इस प्रशासनिक लापरवाही ने विकास और जनहित के वास्तविक मुद्दों को पीछे धकेलकर, विपक्षी राजनीतिक दलों को मंदिर के नाम पर एक नया मुद्दा थाली में परोसकर दे दिया है। अब राम भक्तों को यह चिंता सता रही है कि जो मुद्दा इतने वर्षों के संघर्ष के बाद खत्म हुआ था, क्या छोटी सी प्रशासनिक लापरवाही के कारण आने वाले समय में भी विकास की जगह सिर्फ इसी मुद्दे पर सियासत होती रहेगी?
अब देखना यह है कि इस गंभीर प्रशासनिक चूक को सुधारने, व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी बनाने और दोषियों को सजा दिलाने के लिए ट्रस्ट आने वाले समय में क्या कड़े और ठोस कदम उठाता है।
अब फैसला जनता की अदालत में: आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
’पंजाब दस्तक’ यह बड़ा, तीखा और ज्वलंत सवाल आज देश की जनता, उत्तर प्रदेश के नागरिकों और दुनिया भर के करोड़ों राम भक्तों के सामने छोड़ रहा है।
कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें:
क्या कर्मचारियों द्वारा की गई इस लापरवाही और हेराफेरी की अंतिम जिम्मेदारी ट्रस्ट के शीर्ष नेतृत्व को स्वीकार नहीं करनी चाहिए? क्या सिर्फ व्यक्तिगत ईमानदारी ही इतने बड़े और संवेदनशील ट्रस्ट को चलाने के लिए काफी है, या फिर इस प्रशासनिक ढिलाई और अति-आत्मविश्वास पर तुरंत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए? अपनी प्रतिक्रिया हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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