बड़सर में भाजपा की अंदरूनी कलह और इंद्रदत्त लखनपाल-बलदेव शर्मा की सियासत

बड़सर में ‘मां’ का मुखौटा और अपनों से दगा: बीडीसी से लेकर जिला परिषद तक बलदेव शर्मा के सियासी खेल बेपर्दा, लखनपाल की जनप्रियता के आगे फीकी पड़ी साज़िशें

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​हमीरपुर / बड़सर (उमांशी राणा):
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का यह तीखा बयान कि “भारतीय जनता पार्टी कई गुटों में बंटी हुई है”, बड़सर विधानसभा क्षेत्र के मौजूदा घटनाक्रम में अक्षरशः सच साबित हो रहा है। बड़सर में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों से लेकर स्थानीय संगठन तक जो अंदरूनी खींचतान सामने आई है, उसने पार्टी के समर्पित कैडर को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ पूर्व विधायक बलदेव शर्मा सार्वजनिक मंचों पर खुद को पार्टी का निष्ठावान सिपाही और भाजपा को अपनी “मां” बताते नहीं थकते, वहीं दूसरी ओर धरातल पर पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की जड़ें काटने का खेल खुलेआम खेला जा रहा है।


​जिला परिषद से बीडीसी तक अपनों की पीठ में छुरा
पंजाब दस्तक की ग्राउंड पड़ताल और बड़सर के दर्जनों गांवों में भाजपा-कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं से हुई बातचीत में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं:
​रवि कानगो का टिकट कटवाना: जिला परिषद चुनावों में भाजपा ने रवि कानगो को अधिकृत तौर पर समर्थित प्रत्याशी बनाया था। पूरा कैडर सक्रिय था, लेकिन ऐन वक्त पर रातों-रात उनका टिकट बदलवा दिया गया। निष्ठावान कार्यकर्ता आज भी पूछ रहे हैं कि यह अंदरूनी घात किसके इशारे पर हुआ?
​18 बीडीसी सदस्य जीतने के बाद भी खेला: बीडीसी चुनावों में भाजपा समर्थित 18 सदस्यों की स्पष्ट जीत के बावजूद ओपन सीट पर अध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार रमेश शर्मा को दरकिनार किया गया।


​कांग्रेस के साथ अंदरूनी मिलीभगत: एक सोची-समझी साजिश के तहत राजेश मांगा को पैनल में आगे किया गया और फिर सरकार व कांग्रेस के साथ अंदरूनी तालमेल बैठाकर अध्यक्ष रमेश शर्मा और उपाध्यक्ष पवन शर्मा को बनवा दिया गया। भाजपा का स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद कांग्रेस समर्थित धड़े से हाथ मिलाना यह साबित करता है कि निजी स्वार्थ के लिए पार्टी हित की बलि कैसे चढ़ाई गई।


​तीन बार की हार के बाद छटपटाहट, कैडर में भारी रोष
लगातार तीन विधानसभा चुनावों में शिकस्त झेलने के बाद बलदेव शर्मा फिर से सियासी वजूद तलाशने की जुगत में हैं। कभी प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल का ‘हनुमान’ बनना तो कभी अनुराग ठाकुर के नाम की ओट लेना, यह सब केवल समानांतर शक्ति केंद्र खड़ा करने की कोशिश है। जिन पुराने समर्थकों को वे अपने साथ दिखाते हैं, उनमें से अधिकांश अंदरखाते संगठन और मौजूदा विधायक इंद्रदत्त लखनपाल के संपर्क में हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि जो नेता अपनी ही पार्टी के उम्मीदवारों को हराने की रणनीति बनाए, उसका भाजपा को ‘मां’ कहना सिर्फ एक सियासी ढोंग है।


​इंद्रदत्त लखनपाल: जनता का अटूट विश्वास और भविष्य का मजबूत चेहरा
साजिशों के इस दौर में बड़सर के विधायक इंद्रदत्त लखनपाल की छवि एक फौलादी और जनप्रिय नेता के रूप में निखर कर सामने आई है:
​जनता के लिए सत्ता की बलि: कांग्रेस सरकार में जब 1 लाख नौकरियों, महिलाओं को ₹1500 सम्मान राशि और मुफ्त बिजली जैसी गारंटियों से पल्ला झाड़ा गया, तो लखनपाल ने विधानसभा के भीतर जनता की आवाज उठाई। जब सरकार ने जनहित की अनदेखी की, तो उन्होंने सत्ता सुख को लात मारकर जनता के स्वाभिमान का रास्ता चुना।
​घर-घर से सीधा पारिवारिक नाता: शिमला नगर निगम के दिनों से लेकर आज तक लखनपाल का स्वभाव सादगी और अपनत्व की मिसाल रहा है। हर गांव, हर घर में बच्चे-बुजुर्ग को नाम से पहचानना और हर सुख-दुख में बिना बुलाए परिवार के सदस्य की तरह खड़े रहना उनकी सबसे बड़ी ताकत है।


​टिकट और जीत तय, सरकार में मिलेगा बड़ा रुतबा: बड़सर की जनता और भाजपा हाईकमान भली-भांति जानती है कि क्षेत्र में लखनपाल का कोई विकल्प नहीं है। आगामी विधानसभा चुनावों में बड़सर से भाजपा का टिकट केवल और केवल इंद्रदत्त लखनपाल को ही मिलना तय है। जनता का स्पष्ट मानना है कि वे प्रचंड बहुमत से जीत दर्ज करेंगे और आने वाले समय में भाजपा सरकार में उन्हें एक बड़ा और महत्वपूर्ण ओहदा देकर पार्टी उनके जनसमर्पण का सम्मान करेगी।
​बड़सर की प्रबुद्ध जनता अब सब समझ चुकी है। पीठ में छुरा घोंपने वाली राजनीति के दिन लद चुके हैं और क्षेत्र की जनता पूरी मजबूती से अपने लोकप्रिय विधायक इंद्रदत्त लखनपाल के साथ चट्टान की तरह खड़ी है।


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