[FCRA: विदेशी अंशदान विनियमन कानून / विदेशी चंदा रोकथाम अधिनियम]
विशेष खोजी रिपोर्ट | ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा | पंजाब दस्तक न्यूज़ रूम, चंडीगढ़
चंडीगढ़ / नई दिल्ली:
देश के राजनीतिक हलकों में अब तक यह माना जाता रहा कि मोदी सरकार का सबसे साहसिक फैसला जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को समाप्त करना या अयोध्या में भव्य राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त करना था। लेकिन रणनीतिक जानकारों की मानें, तो अब जिस मोर्चे पर सीधा प्रहार किया जा रहा है, उसके आगे 370 और राम मंदिर का मुद्दा भी छोटा नजर आने लगेगा। संसद के पटल पर केंद्र सरकार एक ऐसा कानूनी चक्रव्यूह रचने जा रही है, जिसकी आहट मात्र से वाशिंगटन से लेकर लंदन तक हड़कंप मच गया है। यह ऐतिहासिक कदम है—विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) में अब तक का सबसे कठोर और निर्णायक संशोधन।
आसान शब्दों में समझिए: क्या है एफसीआरए (FCRA) और क्यों मची है खलबली?
एफसीआरए (विदेशी अंशदान विनियमन कानून) भारत का वह कानूनी सुरक्षा कवच है जो यह तय करता है कि विदेशों से आने वाला धन (डॉलर, पाउंड या यूरो) देश में किन शर्तों पर आएगा, कौन उसे स्वीकार कर सकता है और वह किस काम में खर्च होगा।
कानून की मूल भावना (1976): मूल रूप से यह कानून 1976 में आपातकाल के दौरान बनाया गया था, ताकि कोई भी विदेशी ताकत अपनी अकूत दौलत के दम पर भारत के लोकतंत्र, चुनावी राजनीति, संसद, प्रेस और आंतरिक नीतियों को प्रभावित न कर सके। यह कानून सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय की निगरानी में काम करता है।
नए संशोधन का खौफ: इस बार के बदलावों ने उन तमाम चोर दरवाजों को हमेशा के लिए बंद करने का खाका खींचा है, जिनकी आड़ में एनजीओ समानांतर व्यवस्था चलाते थे। नए प्रावधानों के तहत लाइसेंस रद्द होने पर विदेशी फंड से खड़ी की गई संपत्तियों की जब्ती, एक-एक पैसे की डिजिटल निगरानी और फर्जी समाज सेवा के नाम पर चलने वाले खेल पर सीधी कानूनी नकेल कसी जा रही है।
आंकड़ों का भयानक मायाजाल: 37 लाख संस्थाएं और 30,000 करोड़ का खेल
विदेशी ताकतों की भारत के अंदरूनी मामलों में इतनी गहरी दिलचस्पी क्यों है? इसकी गवाही देते हैं ये चौंकाने वाले जमीनी आंकड़े:
दुनिया में सबसे बड़ा आंकड़ा: इस वक्त भारत में करीब 37 लाख गैर-सरकारी संगठन (NGOs) पंजीकृत हैं। वैश्विक स्तर पर किसी भी एक देश में मौजूद स्वयंसेवी संस्थाओं की यह सबसे बड़ी तादाद है।
जी-20 का एक-तिहाई हिस्सा: विश्व की शीर्ष 20 आर्थिक महाशक्तियों (G-20) के पास जितने कुल पंजीकृत संगठन हैं, उनमें से अकेले एक-तिहाई सिर्फ भारत की धरती पर सक्रिय हैं।
सालाना 30,000 करोड़ की डंपिंग: हर साल लगभग 23,000 करोड़ से 30,000 करोड़ रुपये का बेहिसाब विदेशी फंड सामाजिक सरोकारों के नाम पर भारत के खातों में उड़ेल दिया जाता है।
सवाल उठना लाजिमी है: क्या कोई विदेशी हुकूमत या अंतरराष्ट्रीय संस्था भारत के नागरिकों पर इतना निस्वार्थ प्यार लुटा रही है कि वह हर साल 30 हजार करोड़ रुपये मुफ्त में बहा दे? या फिर इस चंदे की आड़ में देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता को खोखला करने का खेल चल रहा था?
यूपीए का दौर: एनएसी (NAC) और सुपर-कैबिनेट का साया
इस सिंडिकेट की गहराई को समझने के लिए यूपीए शासनकाल के उस दौर को देखना होगा जब ‘वीजा ऑन अराइवल’ और टूरिस्ट वीजा का खुला दुरुपयोग करके विदेशी प्रचारक और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता भारत के कोने-कोने में पैठ बना रहे थे।
उस समय सोनिया गांधी की अध्यक्षता में गठित नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (NAC) संसद और संविधान से परे एक अघोषित ‘सुपर कैबिनेट’ बनकर उभरी थी। हर्ष मंदर, अरुणा रॉय और अरुंधति रॉय जैसे चेहरों से लैस यह काउंसिल पर्दे के पीछे से सरकार का रिमोट कंट्रोल थामे हुए थी। मनमोहन सिंह की चुनी हुई कैबिनेट मूकदर्शक बनी रहती थी और देश की नीतियां एनजीओ के दबाव में तय होती थीं।
आर्थिक तोड़फोड़ की तीन बड़ी मिसालें
विदेशी फंडिंग का सबसे आक्रामक चेहरा तब सामने आया जब भारत के रणनीतिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया:
कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र: तमिलनाडु में रूस के सहयोग से बन रहे इस संयंत्र से भारत की ऊर्जा सुरक्षा तय होनी थी। लेकिन जैसे ही यह पूरा होने को आया, ग्रीनपीस जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की शह पर सुनियोजित विरोध प्रदर्शन खड़े किए गए ताकि भारत परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भर न बन सके।
सरदार सरोवर बांध: गुजरात और राजस्थान के प्यासे इलाकों की जीवनरेखा बने इस बांध को ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ और मेधा पाटकर के नेटवर्क ने दशकों तक कानूनी अड़चनों में उलझाए रखा, जिसकी अंतरराष्ट्रीय फंडिंग जगजाहिर रही।
स्टरलाइट कॉपर प्लांट (थूथुकुडी): देश की 40% तांबा जरूरत पूरी करने वाले इस विशाल कारखाने को पर्यावरण के नाम पर हिंसक उपद्रव करवाकर बंद करवा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि तांबे का शुद्ध निर्यातक भारत रातों-रात इसका आयातक बन गया और अरबों डॉलर का तांबा विदेशी बाजारों—खासकर चीन से—खरीदना पड़ा।
अंतरराष्ट्रीय दबाव और मोदी सरकार की दो-टूक नीति
जब नई दिल्ली ने इस फंडिंग पाइपलाइन को काटना शुरू किया, तो वैश्विक कूटनीति के चेहरे बेनकाब होने लगे। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि क्रिस्टोफर लैंडो का यह बयान कि “अमेरिका ने चीन को बढ़ने देकर जो गलती की, वह भारत के मामले में नहीं दोहराएगा”, पश्चिमी ताकतों की असली चिंता को उजागर करता है। जब शीर्ष अमेरिकी नेता मार्को रुबियो जैसे कूटनीतिज्ञ भारत आते हैं, तो उनकी पहली प्राथमिकता साउथ ब्लॉक के बजाय चुनिंदा सिविल सोसाइटी समूहों से संवाद साधना होती है। संदेश साफ था—यदि विदेशी फंडिंग पर लगाम लगाई, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार का राग अलापा जाएगा।
लेकिन आदिवासी इलाकों और पूर्वोत्तर में विदेशी धन के बल पर चल रहे जनसांख्यिकी बदलाव और वोट-बैंक की राजनीति पर अब पूर्णविराम लगना तय है। यही वजह है कि मिजोरम के संगठनों से लेकर केरल के मंचों और संसद के गलियारों तक विरोध की आंधी खड़ी की जा रही है। विपक्ष के तमाम हंगामे और तथाकथित प्रदर्शनों के पीछे का असली एजेंडा केवल इस बिल की धार को कुंद करना है।
नई दिल्ली का दो-टूक संदेश:
”यदि कोई विदेशी संस्था भारत में वास्तविक शिक्षा, स्वास्थ्य या जनसेवा के लिए संसाधन लगाना चाहती है, तो उसका स्वागत है। लेकिन उस पूंजी की पाई-पाई का हिसाब देश के बैंकिंग तंत्र और गृह मंत्रालय के पास होना चाहिए। देश के विकास की राह में रोड़ा अटकाना, उग्रवादी प्रवृत्तियों को हवा देना और पैसे के जोर पर भारत के ताने-बाने से खिलवाड़ करना अब इस नए भारत में मुमकिन नहीं होगा।”
संसद का यह सत्र राष्ट्रहित में संप्रभुता की रक्षा का सबसे कड़ा अध्याय लिखने जा रहा है, जहां फर्जी एनजीओ और उनके विदेशी आकाओं का पूरा तंत्र बेनकाब होगा।
पंजाब दस्तक का सवाल — आपकी राय:
विदेशी फंडिंग की नकेल कसने और देश की संप्रभुता को सुरक्षित करने वाले इस कड़े एफसीआरए कानून पर आपका क्या मानना है? क्या देश के विकास को बाधित करने वाली विदेशी लॉबी की फंडिंग रोकना सही कदम है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।
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पंजाब दस्तक न्यूज़ रूम, चंडीगढ़ से ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा की रिपोर्ट।
