बिलासपुर रेल परियोजना भूमि अधिग्रहण पर हाई कोर्ट का फैसला

बिलासपुर में रेल प्रोजेक्ट के नाम पर किसानों की जमीनों पर लटकी तलवार हटी: हाई कोर्ट ने निरस्त किया भूमि अधिग्रहण, शासन की लेटलतीफी को बताया नियम विरुद्ध

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​ग्राउंड जीरो से एक्सक्लूसिव रिपोर्ट: ‘पंजाब दस्तक’ के लिए राहुल
​बिलासपुर / शिमला:


विकास योजनाओं के नाम पर किसानों के अधिकारों से खिलवाड़ करने वाले प्रशासनिक तंत्र को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने जोरदार सबक सिखाया है। बहुचर्चित भानुपल्ली-बिलासपुर-बैरी ब्रॉडगेज रेल परियोजना को लेकर सरकारी मशीनरी जिस मनमाने तरीके से जमीनें हड़पने की तैयारी में थी, उस पूरी प्रक्रिया पर अदालत ने पूर्ण विराम लगा दिया है। जस्टिस अजय मोहन गोयल और जस्टिस योगेश जसवाल की दो सदस्यीय पीठ ने अधिग्रहण से जुड़े हर सरकारी आदेश को सीधे तौर पर गैर-कानूनी करार देते हुए निरस्त कर दिया है।


​सालों से असमंजस में थे तीन गांवों के बाशिंदे
सदर उपमंडल के अंतर्गत बरमाना, ऊपरी भटेड़ और खतेड़—ये वे तीन गांव हैं जहां के किसान बरसों से अपनी ही पुरखों की धरती पर बेगाने बने बैठे थे। उनकी हरी-भरी खेती और रिहायशी आशियानों पर अधिग्रहण का डर मंडरा रहा था। स्थिति यह थी कि किसान अपनी जमीन पर न तो कोई नया निर्माण कर पा रहे थे और न ही खेती से जुड़ा कोई ढांचा खड़ा कर पा रहे थे। जब सरकारी रवैये से तंग आकर कुलदीप ठाकुर समेत अन्य ग्रामीणों ने अदालत की चौखट खटखटाई, तब जाकर न्याय की यह मजबूत लकीर खिंची।


​तीन साल तक तारीख पर तारीख, फाइलों में निकली खाली खानापूर्ति
मामले की जड़ें मार्च 2023 की उस प्राथमिक अधिसूचना से जुड़ी हैं, जिसके तहत नियमों के मुताबिक ठीक एक साल के भीतर अधिग्रहण का अंतिम प्रारूप सामने आना जरूरी था। लेकिन प्रशासनिक महकमा अपनी ही सुस्ती के चलते लगातार तीन बार (2024, 2025 और फिर 2026 में) मियाद बढ़ाता चला गया। हर बार फाइलों में केवल एक रटा-रटाया मुहावरा चिपका दिया गया—’असाधारण प्रशासनिक परिस्थितियां’।
अदालत के सख्त आदेश पर जब महकमे के दस्तावेज जजों के सामने खुले, तो सरकारी वकीलों के पास जवाब नहीं था। फाइलों में एक भी ऐसा दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिला जो यह साबित कर सके कि आखिर तीन साल तक काम अटकाने की वाजिब वजह क्या थी।


​हाई कोर्ट का कड़ा संदेश: बिना ठोस वजह समय बढ़ाना स्वीकार्य नहीं
न्यायालय ने भूमि अधिग्रहण से संबंधित वैधानिक प्रावधानों की याद दिलाते हुए दो-टूक कहा कि अगर किसी योजना की समयसीमा बढ़ाई जाती है, तो उसके स्पष्ट और पुख्ता कारण फाइलों में दर्ज होने चाहिए, उन्हें सार्वजनिक गजट में आना चाहिए और विभाग के पोर्टल पर भी दिखना चाहिए। महज कागजी बहानों के सहारे जनता को अनिश्चितता के भंवर में नहीं धकेला जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने 29 मार्च 2023 के शुरुआती आदेश से लेकर हालिया समय-विस्तार तक, सभी सरकारी अधिसूचनाओं को रद्द कर किसानों के पक्ष में अंतिम मुहर लगा दी।


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