मंडी सांसद कंगना रनौत का 2014 से पहले के भारत पर बयान

विशेष संपादकीय: 2014 से पहले के भारत पर सांसद कंगना रनौत के बयान के मायने — इतिहास, आंकड़े और जन-अपेक्षाओं का एक संतुलित विश्लेषण

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​विशेष रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
​देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के पावन अवसर पर जहां पूरे देश ने उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित कीं, वहीं मंडी संसदीय क्षेत्र से माननीय सांसद कंगना रनौत द्वारा 2014 से पहले के भारत की स्थिति को लेकर दिए गए वक्तव्य ने एक नई नीतिगत और सामाजिक चर्चा को जन्म दिया है। 2014 से पहले के भारत में भुखमरी, गंदगी और लाचारी की स्थिति का उल्लेख करते हुए दिए गए बयान पर अब मंडी के वरिष्ठ नागरिक, प्रबुद्ध बुद्धिजीवी और आम जनता दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक गंभीर और तथ्यपरक विमर्श की अपेक्षा कर रहे हैं।


​एक जनप्रतिनिधि के तौर पर माननीय सांसद का ध्येय संभवतः पिछले वर्षों में हुए ढांचागत और प्रशासनिक सुधारों को रेखांकित करना रहा होगा। परंतु, किसी भी सार्वजनिक मंच से जब इतिहास का मूल्यांकन किया जाए, तो यह ध्यान रखना जरूरी है कि देश का वर्तमान स्वरूप दशकों के निरंतर नीतिगत प्रयासों, पूर्ववर्ती सरकारों की योजनाओं और करोड़ों नागरिकों के पुरुषार्थ की मजबूत नींव पर खड़ा है।


​2014 से पहले की मजबूत नीतिगत नींव और प्रशासनिक व्यवस्था
​भारत में खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण संपर्क और शिक्षा का विस्तार किसी एक कालखंड का परिणाम नहीं, बल्कि निरंतर प्रयासों की देन रहा है। आजादी के बाद से प्रशासनिक तंत्र में एसडीएम से लेकर मुख्य सचिव तक की हमेशा से यह वैधानिक जिम्मेदारी रही है कि कोई भी नागरिक भुखमरी या असहाय स्थिति का शिकार न बने:
​अंत्योदय अन्न योजना व खाद्य सुरक्षा: समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए सस्ते अनाज और भरण-पोषण की कानूनी गारंटी।
​मिड डे मील योजना (1995): प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों के पोषण स्तर को सुधारने और स्कूलों में ठहराव सुनिश्चित करने वाली ऐतिहासिक पहल।
​प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (2000): पहाड़ों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों को पक्की सड़कों से जोड़कर ग्रामीण आर्थिकी को गति देने का राष्ट्रव्यापी अभियान।


​सर्व शिक्षा अभियान (2001) व मनरेगा: प्राथमिक शिक्षा की पहुंच और ग्रामीण परिवारों को आजीविका की 100 दिन की कानूनी गारंटी।
​एनआरएचएम (2005) व जेएनएनयूआरएम (2005): ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र का विस्तार और आधुनिक शहरी सार्वजनिक परिवहन की मजबूत नींव।
​इंदिरा आवास योजना: निर्धन परिवारों को पक्की छत उपलब्ध कराने का दीर्घकालिक सामाजिक कार्यक्रम।


​आंतरिक ऋण, वित्तीय संतुलन और आर्थिक चुनौतियां
​देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति और प्राथमिकताओं पर संतुलित और तथ्यपरक चर्चा हमेशा लोकतंत्र को परिपक्व बनाती है:
​बढ़ता आंतरिक कर्ज: 2014 में देश का आंतरिक कर्ज लगभग 55 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर था, जो वर्तमान में बढ़कर 200 से 206 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। बढ़ती देनदारियों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय दायित्वों के बीच दीर्घकालिक आर्थिक संतुलन बनाए रखना नीति-निर्माताओं के सामने एक बड़ा विषय है।


​बैंकिंग सुधार और ऋण प्रबंधन: जहां एक आम किसान और मध्यम वर्गीय नागरिक पर बैंक ऋण चुकाने का नैतिक और प्रशासनिक दबाव रहता है, वहीं बड़े उद्योगपतियों के एनपीए (NPA) राइट-ऑफ की व्यवस्था पर भी पारदर्शी चर्चा की आवश्यकता महसूस की जाती है।
​डिजिटल सुरक्षा और उपभोक्ता हित: देश में ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर धोखाधड़ी के मामलों से 52,000 से 55,000 करोड़ रुपये के वित्तीय नुकसान के आंकड़े सामने आए हैं। ऐसे में 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई मर्चेंट लेन-देन पर लगने वाले शुल्क के साथ-साथ आम जनता की साइबर सुरक्षा को सुदृढ़ करना भी एक प्राथमिक विषय है।
​वित्तीय अनियमितताओं पर नियंत्रण: एबीजी शिपयार्ड, डीएचएफएल, यस बैंक, पीएनबी और आईएल एंड एफएस जैसे बड़े बैंकिंग मामलों से सबक लेते हुए नियामकीय तंत्र को और अधिक मजबूत किए जाने की निरंतर दरकार है।


​संसदीय क्षेत्र मंडी के ज्वलंत मुद्दे और जन-अपेक्षाएं
​मंडी संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाले 17 विधानसभा क्षेत्रों—सदर मंडी, बल्ह, सुंदरनगर, करसोग, नाचन, सराज, द्रंग, जोगिंद्रनगर, सरकाघाट से लेकर जनजातीय क्षेत्र लाहौल-स्पीति, किन्नौर, रामपुर और कुल्लू-मनाली—की जनता की यह स्वाभाविक अपेक्षा है कि माननीय सांसद क्षेत्र की वास्तविक भौगोलिक और ढांचागत चुनौतियों को संसद के पटल पर प्राथमिकता से रखें:
​प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा: कोटरोपी जैसी भीषण भूस्खलन की घटनाओं से सीख लेकर पहाड़ी क्षेत्रों के लिए ठोस और दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन नीति का निर्माण।


​आईआईटी रोपड़ का अध्ययन और सिस्मिक संवेदनशीलता: मंडी और आसपास के क्षेत्रों के अत्यधिक भूकंपीय संवेदनशीलता वाले जोन में होने के चलते सुरक्षा मानकों और इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती।
​पर्यावरण संतुलन और ग्लेशियर संरक्षण: लाहौल-स्पीति और किन्नौर के संवेदनशील ट्राइबल अंचलों में जलवायु परिवर्तन और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के संरक्षण हेतु केंद्र से विशेष नीतिगत सहायता।


​एक माननीय जनप्रतिनिधि से समाज हमेशा यही उम्मीद रखता है कि वे ऐतिहासिक तथ्यों का सम्मान करते हुए दलगत सीमाओं से ऊपर उठें और अपने क्षेत्र की बुनियादी चुनौतियों और जनसरोकारों को संसद में शालीनता व गंभीरता के साथ उठाएं।
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