वरिष्ठ पत्रकार: उमांशी राणा
पंजाब दस्तक एक्सक्लूसिव (हमीरपुर / शिमला)
देवभूमि की सरकारी मशीनरी पर इस वक्त एक ऐसा अजीबोगरीब सन्नाटा पसरा है, जिसकी गूंज सीधे आम जनता की जेब, नौजवानों के भविष्य और इंसाफ की चौखट तक सुनाई दे रही है। सूबे के भीतर निष्पक्षता, नियम कायदों और पारदर्शिता की पहरेदारी करने वाले पांच सबसे बड़े मंच पूरी तरह सूने पड़े हैं। हालिया घटना में हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के कर्ताधर्ता कैप्टन रामेश्वर सिंह ठाकुर की विदाई के बाद से सरकारी नौकरियों के इम्तिहान कराने वाली सबसे बड़ी चौखट का तख्त पूरी तरह खाली हो चुका है।
हैरानी की बात यह है कि सियासी गलियारों में सारा शोर-शराबा सिर्फ कैबिनेट की खाली पड़ी एक सीट पर कब्जे को लेकर मचा है, जबकि जनसरोकार से जुड़ी पांच सबसे बड़ी अदालतें और नियामक संस्थाएं महीनों से बिना कप्तान के घिसट रही हैं।
किस-किस दफ्तर पर जड़ा है अनिर्णय का ताला?
लोक सेवा आयोग (HPPSC): भर्ती इम्तिहानों की सर्वोच्च अदालत के मुखिया का चैंबर खाली।
पारदर्शिता का मंच (सूचना आयोग): मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त दोनों कुर्सियां महीनों से वीरान।
उच्च शिक्षा नियामक (HPPERC): प्राइवेट कालेजों व विश्वविद्यालयों पर नकेल कसने वाला ओहदा 36 महीनों से लावारिस।
पावर टैरिफ रेगुलेटर (HPSERC): बिजली की दरों और बोर्ड के कामकाज का हिसाब-किताब देखने वाली गद्दी सितंबर 2025 से ठप।
राज्य निर्वाचन प्राधिकरण: सूबे के चुनावी ढांचे का सबसे बड़ा संवैधानिक पद खाली।
अदालत का डंडा और आरटीआई का दम घुटता तंत्र
शत-प्रतिशत साक्षरता की ओर बढ़ रहे सूबे में सूचना मांगने वालों को तारीख पर तारीख मिल रही है, क्योंकि सुनवाई करने वाले साहब की कुर्सी ही गायब है। अतीत के पन्ने पलटें तो जब वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट भीमसेन मार्च 2016 में सेवामुक्त हुए थे, तब भी डेढ़ साल तक यह महकमा ठप रहा था—यह वही चर्चित दौर था जब शिमला में प्रियंका वाड्रा के जमीन सौदे से जुड़ी जानकारियां दबाने के फेर में सूचना पीठ को उच्च न्यायालय की दहलीज पर माफीनामे की नौबत झेलनी पड़ी थी।
बाद में नरेंद्र चौहान और उनके बाद जनवरी 2023 में पूर्व मुख्य सचिव आर.डी. धीमान को कमान सौंपी गई। धीमान के रेरा की तरफ रुख करते ही जून 2025 से यह दरवाजा दोबारा बंद हो गया। कार्मिक विंग ने नवंबर 2025 और फिर 18 फरवरी 2026 को फॉर्म तो भरवाए, मगर फाइलें दफ्तरों में ही दबी रह गईं। अब हाईकोर्ट ने तल्ख तेवर दिखाते हुए सरकार को 14 सितंबर तक दोनों कुर्सियां आबाद करने का अल्टीमेटम थमाया है, जिस पर 22 सितंबर को कटघरे में जवाब देना होगा।
निजी शिक्षण संस्थानों पर किसका नियंत्रण? 3 साल से नदारद अध्यक्ष
पहाड़ों में कुकुरमुत्तों की तरह खुले प्राइवेट विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों में पढ़ने वाले हजारों छात्रों की फीस, हॉस्टल के मनमाने खर्च और शोषण पर ब्रेक लगाने वाली एजेंसी बीते तीन साल से पंगु है। नाहन के रहने वाले पूर्व फौजी अफसर मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) अतुल कौशिक अगस्त 2020 में तीन साल के लिए बैठे थे, लेकिन अगस्त 2023 में उनके हटने के बाद से कोई नया अध्यक्ष नहीं मिला। मई 2025 में विजय पाल सिंह को सदस्य बनाकर महकमे को जिंदा रखने का दिखावा जरूर हुआ, लेकिन पूर्णकालिक चेयरमैन न होने से बड़े नीतिगत फैसलों पर ताला जड़ा है।
बिजली का पहरेदार लापता, रसूखदारों की अपनी-अपनी उड़ान
बिजली बोर्ड की कार्यप्रणाली और टैरिफ तय करने वाले विद्युत आयोग की चौखट सितंबर 2025 से वीरान है। अगस्त 2025 में शुरू हुई चयन कवायद को 30 सितंबर 2025 को राजभवन ने खारिज कर दिया था, जिसके बाद से फाइलें ठंडे बस्ते में हैं। दिलचस्प पहलू यह रहा कि पूर्व मुख्य सचिव राम सुभग सिंह मुख्यमंत्री के ऊर्जा सलाहकार बन गए और पूर्व मुख्य सचिव संजय गुप्ता पंजाब के विद्युत नियामक आयोग के शीर्ष पद पर जा विराजे, मगर अपने हिमाचल का नियामक बिना सारथी के खड़ा है।
संवैधानिक चुनाव पीठ भी खाली, लोकायुक्त का पुराना दर्द ताजा
प्रशासनिक दक्षता के लिए पहचाने जाने वाले पूर्व मुख्य सचिव अनिल खाची ने अगस्त 2021 से इस कुर्सी को संभाला और सूबे के 73 विधानसभा हल्कों में चुनावी नैया पार लगाई। अगस्त 2026 में उनके रिटायर होते ही यह संवैधानिक पद भी लावारिस हो गया। यह परिपाटी राज्य में नई नहीं है; वर्तमान लोकायुक्त न्यायमूर्ति बी.सी. बारवालिया के आने से पहले भी शीर्ष अदालत के पूर्व जज की रवानगी के बाद भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाला लोकायुक्त संस्थान पूरे पांच साल तक ताले में बंद रहा था।
जब नीति-नियंताओं का पूरा ध्यान सियासी बिसात बिछाने तक सिमट जाता है, तो संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं का इस कदर वीरान होना सीधे तौर पर प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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