शिमला जिला परिषद अध्यक्ष उपाध्यक्ष चुनाव पर हाई कोर्ट का कारण बताओ नोटिस

शिमला जिला परिषद चुनाव टालने पर हाई कोर्ट की बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक: राज्य सरकार, चुनाव आयोग और DC शिमला को थमाया कारण बताओ नोटिस

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​पंजाब दस्तक | न्यूज रूम (विधि विभाग डेस्क)
(महेंद्र वर्मा की रिपोर्ट)


​शिमला: हिमाचल प्रदेश में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रशासनिक ठंडे बस्ते में डालने के रवैये पर प्रदेश उच्च न्यायालय ने कड़ा प्रहार किया है। शिमला जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनाव में ढाई महीने से जारी गतिरोध और अनिश्चितता पर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार, राज्य चुनाव आयोग और उपायुक्त (DC) शिमला को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
​अदालत के इस कड़े संज्ञान के बाद अब प्रशासनिक गलियारों और राजनीतिक खेमों में हड़कंप मच गया है।


​सत्ता और प्रशासन की लीपापोती पर अदालत का हंटर
​यह कड़ा आदेश न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल्दूआ की एकल पीठ ने नवनिर्वाचित जिला परिषद सदस्य ममता और 12 अन्य निर्वाचित पार्षदों की याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के बाद जारी किया। अदालत ने सीधे तौर पर प्रतिवादियों को आदेश दिए हैं कि मामले की अगली सुनवाई यानी 17 अगस्त से पहले अपना लिखित जवाब और स्पष्टीकरण कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करें।


​ढाई महीने से लोकतंत्र बंधक, कानून को ठेंगा!
​मामले की कड़वी सच्चाई यह है कि 6 जून को सभी 25 नवनिर्वाचित सदस्यों ने पूरी निष्ठा के साथ पद व गोपनीयता की शपथ ले ली थी। हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 90 (2) के तहत शपथ ग्रहण के तुरंत बाद अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव करवाना वैधानिक रूप से अनिवार्य था।


​लेकिन, ढाई महीने का लंबा वक्त बीत जाने के बावजूद जिला प्रशासन ने बिना कोई ठोस या वैध विधिक कारण बताए बैठकों को लगातार स्थगित किया। याचिकाकर्ताओं का सीधा आरोप है कि सत्ता की आड़ में लोकतांत्रिक जनादेश को कुचलने और निष्पक्ष चुनाव टालने की नीयत से यह पूरी स्क्रिप्ट लिखी गई है।


​17 अगस्त को होगा जवाब-तलब, कुर्सी पर कसता शिकंजा
​याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट से गुहार लगाई है कि जिला प्रशासन शिमला को तुरंत विशेष बैठक बुलाकर अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनाव की प्रक्रिया संपन्न कराने का सख्त हुक्म दिया जाए।


​अब सारा दारोमदार 17 अगस्त की सुनवाई पर है, जहां राज्य सरकार और DC शिमला को अदालत में यह साबित करना होगा कि आखिर किस कानून और अधिकार के तहत जनादेश को इतने दिनों तक अधर में लटका कर रखा।

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