शिमला हिमाचल प्रदेश के हजारों अनुबंध कर्मचारियों के लिए सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) से बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। वर्ष 2003 के बाद भर्ती नियमों (R&P Rules) के तहत विभिन्न सरकारी विभागों में नियुक्त हुए कर्मचारियों के हक में आए उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह निरस्त कर दिया है।
पंजाब दस्तक के ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा से खास बातचीत करते हुए हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता मनदीप चंदेल—जिन्होंने कर्मचारियों की पेंशन सहित कई महत्वपूर्ण मामले हाई कोर्ट में जीते हैं—ने इस लैंडमार्क फैसले और इसके असर की विस्तृत जानकारी साझा की।
4 महीने में देनदारियां चुकाने के स्पष्ट निर्देश
वरिष्ठ अधिवक्ता मनदीप चंदेल ने पंजाब दस्तक को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की एसएलपी को खारिज करते हुए हाई कोर्ट के आदेशों को चार महीने के भीतर लागू करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य के एडवोकेट जनरल (AG) द्वारा खुद अदालत से चार महीने का समय मांगा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए सरकार को निर्देशित किया है कि इस समय अवधि के भीतर कर्मचारियों की सभी वित्तीय व सेवा संबंधी देनदारियों (Arrears & Benefits) का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
किन्हें मिलेगा लाभ और कौन रहेंगे बाहर?
पंजाब दस्तक के ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा द्वारा पूछे गए सवाल—”किन्हें मिलेगा इसका लाभ और कौन रहेंगे बाहर?”—का सीधा जवाब देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मनदीप चंदेल ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की:
पात्र कर्मचारी (जिन्हें मिलेगा पूरा लाभ): लोक सेवा आयोग (HPPSC) या राज्य चयन आयोग जैसी अधिकृत भर्ती एजेंसियों के माध्यम से भर्ती नियमों (R&P Rules) के तहत अनुबंध पर लगे सभी कर्मचारियों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। इनकी अनुबंध अवधि (Contract Period) को वरिष्ठता (Seniority), नोशनल इंक्रीमेंट और पदोन्नति लाभों के लिए पूरा गिना जाएगा।
अपात्र कर्मचारी (जो रहेंगे बाहर): पीटीए (PTA), एडहॉक (Ad-hoc) और स्टॉप-गैप व्यवस्था के तहत नियुक्त कर्मचारियों को भर्ती नियमों के तहत सीधी भर्ती न होने के कारण इस फैसले के दायरे से बाहर रखा गया है।
कानूनी विकल्प समाप्त: अब रिव्यू या क्यूरेटिव की गुंजाइश नहीं
वरिष्ठ अधिवक्ता मनदीप चंदेल के अनुसार, अब राज्य सरकार के पास पुनरीक्षण याचिका (Review Petition) या क्यूरेटिव याचिका (Curative Petition) दायर करने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता:
रिव्यू याचिका: इसमें केवल तब जाया जाता है जब निर्णय में कोई स्पष्ट त्रुटि या भूल हो। चूंकि सरकार ने स्वयं अदालत में 4 महीने का समय मांगा है, इसलिए फैसले में किसी त्रुटि का सवाल ही नहीं उठता।
क्यूरेटिव याचिका: यह अंतिम विकल्प केवल न्याय के गंभीर हनन (Miscarriage of Justice) के दुर्लभ मामलों में प्रयोग होता है, जिसकी इस मामले में कोई गुंजाइश नहीं है।
’ताज मोहम्मद केस’ से शुरू हुई थी कानूनी लड़ाई
इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत ताज मोहम्मद बनाम हिमाचल सरकार (CWP No. 2704/2017) मामले से हुई थी। कर्मचारी सबसे पहले प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunal) गए थे, जहां फैसला कर्मचारियों के पक्ष में आया। बाद में मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुबंध अवधि को वरिष्ठता और अन्य सेवा लाभों (Consequential Service Benefits) व पदोन्नति के लिए गिना जाएगा।
इसके बाद सरकार द्वारा बनाए गए संबंधित अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर रद्द (Quash) कर दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसएलपी खारिज होने के बाद सरकार को हाई कोर्ट के निर्णय को चार महीनों के भीतर लागू करना अनिवार्य होगा।
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