मैं पत्रकार हूँ। मैं पत्रकार हूँ। मैं पत्रकार हूँ।
”सफर में मुश्किलें आएं तो ज़रूरत और बढ़ती है,
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है।
बुझाने को हवा के साथ अगर बारिश भी आ जाए,
चिराग-ए-हकीकत की हकीकत और बढ़ती है…”
— नवाब देवबंदी
सुरेंद्र राणा, वरिष्ठ ब्यूरो चीफ (पंजाब दस्तक)
आज रात के लगभग 2:15 बजे हैं। चारों तरफ सन्नाटा है, लेकिन मेरे मन के अंदर विचारों का एक समंदर हिलोरें ले रहा है। मन में आया कि क्यों न आज अपने पंजाब दस्तक के प्रिय पाठकों और देश के सजग नागरिकों से सीधे दिल की बात कहूँ। यह किसी राजनीतिक दल की बात नहीं है, न ही किसी प्रायोजित एजेंडे का हिस्सा है—यह मेरी अपनी 9 वर्षों की पत्रकारिता और 35 वर्षों के प्रशासनिक अनुभव से निकली एक निष्पक्ष पत्रकार के मन की सच्ची राय है।
हमारे सनातन धर्म और शास्त्रों में कहा गया है:
”सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥”
अर्थात् truth (सत्य) ही सर्वोपरि है। एक पत्रकार का धर्म भी यही है कि वह बिना किसी लालच या दबाव के निष्पक्ष सत्य को समाज के सामने रखे। केवल किसी भीड़ या सत्ता को खुश करने के लिए झूठी ‘हाँ में हाँ’ मिलाना पत्रकारिता का धर्म नहीं हो सकता।
यह सीधा संदेश उन सभी प्रदर्शनकारियों और आंदोलनकारियों के लिए है जो जन-जी (Gen-Z) युवाओं और छात्रों के आंदोलन की आड़ लेकर सच्चाई की आवाज़ दबाने की कोशिश कर रहे हैं, पत्रकारों के साथ अभद्रता, मारपीट और धक्का-मुक्की कर रहे हैं।
आज देश में हालात यह बन गए हैं कि ज़मीनी हकीकत दिखाने गए पत्रकारों को अपनी सुरक्षा के लिए छुपना पड़ता है, पुलिस उन्हें घेराबंदी करके किसी तरह सुरक्षित बाहर निकालती है। हमारी महिला पत्रकार साथियों तक के साथ अभद्रता की जाती है, उन्हें गलत तरीके से छुआ जाता है और उनके साथ दुर्व्यवहार होता है—और यह सब कुछ किया जाता है एक “आंदोलन” की आड़ में!
आंदोलन किस लिए होता है? ताकि लोकतंत्र मजबूत हो।
लोकतंत्र चुनाव से बनता है।
संविधान की मर्यादा से चलता है।
पत्रकारों के तीखे सवालों से मजबूत होता है।
और अभिव्यक्ति की आजादी से ही जीवित रहता है।
भीड़ का दोहरा रवैया: ‘वाह-वाह’ बनाम ‘गोदी मीडिया’
मैं पत्रकार हूँ और मेरा सवाल सीधे इस हिंसक भीड़ से है—क्या देश में बोलने और सवाल पूछने का एकाधिकार सिर्फ प्रदर्शनकारियों के पास है? क्या जिस रिपोर्टर के हाथ में माइक और गले में आईडी कार्ड है, उसकी गर्दन अब सार्वजनिक संपत्ति बन गई है?
आज मीडिया के प्रति एक बहुत ही गलत और संकीर्ण सोच पनप रही है। अगर कोई रिपोर्टर भीड़ की हाँ में हाँ मिलाए, केवल उनकी सहूलियत की बात करे, तो भीड़ तालियाँ बजाती है, “वाह-वाह” करती है। लेकिन जहाँ किसी निर्भीक पत्रकार ने निष्पक्ष होकर सच दिखा दिया, व्यवस्था की खामियों के साथ-साथ आंदोलन में मौजूद गड़बड़ियों पर सवाल उठा दिया—तुरंत पूरी भीड़ एकजुट होकर उसे ‘गोदी मीडिया-गोदी मीडिया’ कहकर चिढ़ाने और नारेबाज़ी करने लगती है!
हर निष्पक्ष आवाज़ को इस तरह का लेबल देकर दबाने की कोशिश करना लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है।
जंतर-मंतर से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में जो हो रहा है, उस पर पंजाब दस्तक आज सीधे सवाल उठाता है:
आपको सरकार की नीतियों से शिकायत है? बिल्कुल सड़क पर उतरकर विरोध कीजिए।
शिक्षा या परीक्षा व्यवस्था से शिकायत है? पूरी ताकत से आवाज़ उठाइए।
पुलिस या प्रशासन की कार्रवाई गलत लगती है? उसका डटकर विरोध कीजिए, अधिकार है आपका।
आपको मीडिया से असहमति है? तर्कों के साथ हमारी आलोचना कीजिए।
लेकिन किसी पत्रकार को घेर लेना, उसका चश्मा छीन लेना, कपड़े फाड़ना, कैमरा तोड़ देना और मीडिया की गाड़ियों पर पथराव करना… यह आलोचना नहीं, यह सीधे-सीधे गुंडागर्दी और अराजकता है!
गुंडागर्दी करने वाला व्यक्ति कभी छात्र या देश का भविष्य नहीं हो सकता। वह किसी पवित्र आंदोलन का प्रतिनिधि नहीं हो सकता। ऐसे लोग आंदोलनों में घुसे हुए असामाजिक तत्व होते हैं, जो देश के युवाओं के असली और जायज मुद्दों को अपनी हिंसा के तले बलि चढ़ा देते हैं।
प्रशासनिक अनुशासन से तपा पत्रकारिता का जुनून
जो लोग मुझे जानते हैं, वे बेहतर समझते हैं कि पत्रकारिता मेरे लिए कोई टीआरपी, व्यूज या सस्ती लोकप्रियता पाने का जरिया नहीं है। यह मेरे जीवन का संकल्प और जनसेवा का एक माध्यम है।
मैंने हिमाचल प्रदेश शासन के सचिवालय में एक प्रशासनिक अधिकारी (सेक्शन ऑफिसर) के रूप में लगभग 35 वर्षों तक पूरी निष्ठा और ईमानदारी से सेवा दी है। इस दौरान लोक निर्माण (PWD), सचिवालय प्रशासन, सामान्य प्रशासन (GAD), वित्त (Finance), स्वास्थ्य (Health) तथा आईटी व साइंस टेक्नोलॉजी जैसे महत्वपूर्ण विभागों में काम करते हुए मुझे शासन-प्रशासन को बेहद करीब से समझने का मौका मिला। सचिवालय में उत्कृष्ट कार्यों के लिए मुझे प्रशस्ति पत्र (Appreciation Letter) से सम्मानित भी किया गया।
प्रदेश के कई दिग्गज जननेताओं और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मुझे बतौर प्रोटोकॉल ऑफिसर काम करने का अवसर मिला:
शीर्ष नेतृत्व: हमीरपुर के गौरव स्वर्गीय कैबिनेट मंत्री ठाकुर जगदेव चंद जी, पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल जी, स्वर्गीय राजा वीरभद्र सिंह जी और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जी के साथ प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ निभाईं।
वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी: प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिवों व अतिरिक्त मुख्य सचिवों जैसे तरुण श्रीधर जी, वी. सी. फारका जी और नरेंद्र चौहान जी के साथ कार्य करते हुए प्रशासनिक अनुशासन सीखा।
सचिवालय में जब वरिष्ठ पत्रकारों को मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछते देखता था, तो मेरे भीतर भी समाज के लिए निष्पक्ष कलम चलाने का जुनून जागता था। वही जुनून मुझे सेवानिवृत्ति के बाद मीडिया के मैदान में ले आया।
9 वर्षों का संघर्ष: न झुके हैं, न झुकेंगे
62 वर्ष की आयु पार करने के बाद भी, पिछले 9 वर्षों से मैं पूरी ऊर्जा के साथ पंजाब दस्तक के माध्यम से ज़मीनी पत्रकारिता कर रहा हूँ।
जब हमने बद्दी में घटिया व जहरीली दवाइयों के अवैध काले कारोबार का पर्दाफाश किया, तो भ्रष्ट तंत्र और माफिया तिलमिला गया। मेरे खिलाफ सड़कों पर “सुरेंद्र राणा हाय-हाय” के प्रायोजित नारे लगवाए गए।
बाखनाघाट से लेकर पांवटा साहिब तक पुलिस और तंत्र द्वारा दबाव बनाया गया, झूठी एफआईआर (FIR) दर्ज कराकर डराने का प्रयास हुआ। लेकिन मैंने पीछे हटने से मना कर दिया और अंततः माननीय उच्च न्यायालय (High Court) से न्याय प्राप्त कर फिर से मैदान में खड़ा हुआ।
चाहे शिमला का सचिवालय हो, हिमाचल विधानसभा हो, धर्मशाला का शीतकालीन सत्र हो, दिल्ली का जंतर-मंतर हो, संसद भवन (Parliament) हो या ऐतिहासिक किसान आंदोलन का मैदान—पंजाब दस्तक की टीम ने हमेशा बिना किसी भय के सच्चाई को सामने रखा है।
पत्रकारिता की वास्तविक मर्यादा: एक निडर दृष्टिकोण
एक सच्चे पत्रकार की असली ताकत उसका माइक या कैमरा नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता और नैतिक साहस होता है।
पत्रकार का काम किसी विचारधारा का झंडा उठाना नहीं है, न ही किसी भीड़ का तालियाँ बजाने वाला हिस्सा बनना है। पत्रकार का एकमात्र काम सच्चाई का आईना बनना है—चाहे वह सच सरकार के खिलाफ हो या प्रदर्शनकारियों की कमियों के बारे में हो। जब तक पत्रकारिता में यह साहस रहेगा, तब तक देश में लोकतंत्र की साँसें चलती रहेंगी।
असहमति का सम्मान कीजिए, हिंसा का नहीं
हम साफ कहते हैं—आपको मीडिया से असहमति का पूरा अधिकार है, और मीडिया का फर्ज है कि वह आपकी असहमति को भी जगह दे। लेकिन किसी को भी किसी पत्रकार पर हाथ उठाने का अधिकार संविधान नहीं देता!
कैमरे से शिकायत है तो कैमरे के सामने आकर अपना पक्ष रखिए।
माइक से शिकायत है तो माइक पर आकर तर्कों से जवाब दीजिए।
खबर गलत लगती है तो तथ्य सामने लाइए, लेकिन रिपोर्टर पर हमला मत कीजिए।
क्योंकि जिस दिन भीड़ यह तय करने लगेगी कि कौन सा पत्रकार खबर दिखाएगा और कौन सा नहीं, उस दिन आंदोलन लोकतंत्र को बचाने का काम नहीं कर रहा होगा—वह खुद लोकतंत्र की हत्या कर रहा होगा।
पंजाब दस्तक: सच की निडर और सटीक आवाज़
सरकार चाहे किसी भी दल की हो—अगर वह जनता के हित में अच्छा काम करती है, तो मैं अपनी कलम से उसकी सराहना लिखता हूँ। और जहाँ सरकार गलत करती है, वहाँ बिना किसी डर के जनता का पक्ष मजबूती से रखता हूँ।
मैं पत्रकार हूँ—मेरा काम भीड़ का हिस्सा बनना नहीं, भीड़ के बीच खड़े होकर सच दिखाना है।
मैं पत्रकार हूँ—मेरी आवाज़ किसी राजनीतिक दल की नहीं, केवल सत्य और संविधान की है।
मैं पत्रकार हूँ—मैं भीड़तंत्र का गुलाम नहीं, भारत के लोकतंत्र का सजग पहरेदार हूँ।
पंजाब दस्तक सच की, सटीक और निर्भीक आवाज़ है। जब तक मेरी उंगलियों में कलम पकड़ने की ताकत है, यह आवाज़ इसी तरह सच्चाई के हक में बुलंद होती रहेगी!
पत्रकारिता में निष्पक्षता क्यों जरूरी? सुरेंद्र राणा की राय
💬 आपके विचार हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं (Comment Below)
मेरे प्रिय पाठकों और पंजाब दस्तक के दर्शकों! आज रात के इस पहर व्यक्त किए गए मेरे इन विचारों पर आपकी क्या राय है? क्या आंदोलनों में पत्रकारों के साथ होने वाली हिंसा सही है? क्या मीडिया को निष्पक्ष होकर सवाल पूछने की आजादी मिलनी चाहिए?
कृपया नीचे कमेंट बॉक्स (Comment Section) में अपने विचार और सुझाव जरूर लिखें। पंजाब दस्तक आपके हर एक विचार का सम्मान करता है और आपकी आवाज़ को मंच देता है।
