विशेष राजनीतिक विश्लेषण: पंजाब दस्तक
ग्राउंड रिपोर्ट: भेषज / उमांशी राणा
हिमाचल प्रदेश की सियासत में सवाल अब सिर्फ यह नहीं रह गया है कि 2027 का विधानसभा चुनाव कौन जीतेगा, बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव से पहले ही सूबे के गांवों ने सत्ता के खिलाफ अपना मिजाज तय करना शुरू कर दिया है? अगर देवभूमि के असल राजनीतिक तापमान को मापना है, तो विधानसभा के बंद कमरों की बयानबाजी से बाहर निकलकर गांव की चौपालों और पंचायती राज के नतीजों पर नजर डालनी होगी। जिला परिषदों के ताजा चुनाव परिणामों ने जो जमीनी हकीकत बयां की है, उसने सत्तारूढ़ कांग्रेस के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
प्रदेश की कुल 12 जिला परिषदों में से 11 के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। इनमें से 10 जिला परिषदों की कुर्सी पर भाजपा समर्थित प्रत्याशियों ने एकतरफा कब्जा जमाया है, जबकि सत्ताधारी कांग्रेस केवल एक जिले में ही अपने दोनों पद बचाने में कामयाब हो सकी।
शिमला से हमीरपुर तक: बड़े चेहरों के गढ़ में बिखरा सत्ता का तिलिस्म
शिमला में 26 साल बाद भाजपा की ऐतिहासिक वापसी: जिस शिमला जिले की 8 में से 7 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस काबिज है और सुक्खू कैबिनेट में तीन कद्दावर मंत्री—विक्रमादित्य सिंह, अनिरुद्ध सिंह व रोहित ठाकुर मौजूद हैं, वहां 25 सदस्यीय जिला परिषद में कांग्रेस बहुमत नहीं जुटा पाई। भाजपा के भूपेंद्र सिंह ससोदिया अध्यक्ष (13 वोट) और निर्दलीय भरत सिंह क्लांटा उपाध्यक्ष (14 वोट) निर्वाचित हुए। 2022 में महज एक सीट जीतने वाली भाजपा ने कांग्रेस के इस अभेद्य किले को ढहा दिया।
कांगड़ा में संख्याबल को साधने का हुनर: प्रदेश के सबसे बड़े जिले कांगड़ा में 15 विधानसभा सीटों में से 10 कांग्रेस के पास हैं। 54 सदस्यीय जिला परिषद में भाजपा के पास अपने दम पर स्पष्ट बहुमत नहीं था (भाजपा समर्थित 23, कांग्रेस 13, अन्य 18), लेकिन सटीक फ्लोर मैनेजमेंट के दम पर 22 सदस्यों को साथ लेकर भाजपा समर्थित सीमा देवी अध्यक्ष और अभिमन्यु कंवर उपाध्यक्ष बनने में सफल रहे।
मंडी में जयराम ठाकुर का अभेद्य दुर्ग: पूर्व मुख्यमंत्री व नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के गृह जिले मंडी में भाजपा का संगठनात्मक ढांचा इतना मजबूत दिखा कि अमरू राम अध्यक्ष और बोधी देवी उपाध्यक्ष निर्विरोध चुन लिए गए। यहां भाजपा ने न सिर्फ जिला परिषद पर कब्जा किया, बल्कि चुनाव से पहले ही अपने समर्थित सदस्यों को पूरी तरह लामबंद रखा।
हमीरपुर (मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र): सबसे बड़ा उलटफेर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के अपने गृह जिले हमीरपुर में देखने को मिला। 2022 के विधानसभा चुनाव में हमीरपुर की 5 में से 4 सीटें जीतने वाली कांग्रेस अपने ही घर में मात खा गई। यहां भाजपा समर्थित अनीता शर्मा अध्यक्ष तथा गुरदीप उपाध्यक्ष चुने गए।
ऊना (उपमुख्यमंत्री का इलाका): उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री के गृह जिले ऊना में भी विधानसभा का गणित जिला परिषद में उलट गया। 5 में से 4 विधानसभा सीटें कांग्रेस के पास होने के बावजूद जिला परिषद में भाजपा समर्थित पवन लंबरदार अध्यक्ष और अविनाश मनन उपाध्यक्ष बने।
बिलासपुर में भाजपा का मजबूत आधार: बिलासपुर हमेशा से भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है, जहां 2022 में 4 में से 3 विधानसभा सीटें पार्टी ने जीती थीं। जिला परिषद में भी भाजपा समर्थित सदस्यों की मजबूत स्थिति बरकरार रही और लेखराम ठाकुर अध्यक्ष व प्रोमिला चंदेल उपाध्यक्ष निर्विरोध चुने गए।
सोलन में मंत्रियों का रसूख बेअसर: स्वास्थ्य मंत्री कर्नल धनीराम शांडेल, सीपीएस संजय अवस्थी और विधायक रामकुमार चौधरी जैसे कद्दावर चेहरों के रहते हुए भी 17 सदस्यीय परिषद में भाजपा समर्थित 10 सदस्यों के मजबूत संख्या बल ने बाजी मार ली। यहां कुमारी शीला अध्यक्ष और पंकज शर्मा उपाध्यक्ष चुने गए।
सिरमौर और कुल्लू का सियासी संदेश: सिरमौर में 5 में से 3 विधानसभा सीटें कांग्रेस के पास होने के बावजूद जिला परिषद में भाजपा समर्थित शिवानी अध्यक्ष और बलदेव भंडारी उपाध्यक्ष सर्वसम्मति से चुने गए। कुल्लू में भाजपा ने करीब 23 साल बाद शानदार वापसी करते हुए ठाकुर दास को अध्यक्ष और नीना जोशी को उपाध्यक्ष बनवाया, जहां कांग्रेस उम्मीदवारों को 10-4 के बड़े अंतर से करारी शिकस्त मिली।
किन्नौर में भाजपा का परचम: जनजातीय जिले किन्नौर की 10 सदस्यीय जिला परिषद में भी भाजपा समर्थित सदस्यों का स्पष्ट दबदबा दिखा। यहां हकीम नेगी अध्यक्ष और धनमाला नेगी उपाध्यक्ष निर्वाचित हुईं।
चंबा: कांग्रेस की एकमात्र सांत्वना: पूरी तस्वीर में चंबा ही इकलौता ऐसा जिला रहा जहां कांग्रेस अपने दोनों पद बचाने में कामयाब रही। 18 सदस्यीय जिला परिषद में कांग्रेस समर्थित 10 सदस्य, भाजपा के 5 और 3 अन्य सदस्य थे। यहां कांग्रेस ने अपने संख्या बल को एकजुट रखा और रेखा ठाकुर अध्यक्ष व लियाकत अली खान उपाध्यक्ष पद पर काबिज हुए।
धरातल की कड़वी हकीकत: मंत्रियों की निष्क्रियता या जनता से दूरी?
अब सवाल यह उठता है कि विधानसभा में प्रचंड बहुमत, दिग्गज मंत्रियों की लंबी-चौड़ी फौज और प्रशासनिक तंत्र के बावजूद सत्ताधारी दल अपने ही मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के गढ़ में कैसे पिछड़ गया?
मुख्यमंत्री जिस गति और सोच के साथ काम कर रहे हैं, उसका सीधा असर धरातल पर क्यों दिखाई नहीं दे रहा? ज़मीनी हकीकत यह है कि कांग्रेस के कई मंत्रियों और विधायकों का आम जनता के साथ सीधा संवाद टूटता जा रहा है। कागजी फाइलों और बंद कमरों की सियासत ने ज़मीनी कार्यकर्ताओं और आम लोगों के बीच एक बड़ी खाई पैदा कर दी है।
मुद्दों की अनदेखी और वादों की कसौटी
हिमाचल का जागरूक नागरिक और मतदाता सब समझ रहा है। सरकार को चंद स्वार्थी और मुट्ठी भर लोगों के घेरे से बाहर निकलना होगा:
पेंशनरों और कर्मचारियों की नाराजगी: सरकार को उन लोगों की असल नब्ज टटोलनी होगी जो वास्तव में कर्मचारियों और पेंशनरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। महज 10-15 लोगों को आगे रखकर पूरी जमात को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। सीआईडी और खुफिया विंग की सही रिपोर्ट के आधार पर सरकार को कर्मचारियों व पेंशनरों के साथ टेबल पर सीधी बातचीत करनी होगी।
बागबानों और मजदूरों का आक्रोश: सेब बागबानों की समस्याएं और प्रदेश के मजदूरों के रुके हुए हक सत्तापक्ष से सीधी पहल की मांग कर रहे हैं।
चुनावी गारंटियां: महिलाओं को ₹1500 प्रति माह देने का वादा हो या फिर किसानों से दूध खरीद की व्यवस्था, इन तमाम चुनावी वादों की धरातल पर मुकम्मल डिलीवरी पर बात करनी होगी। बातों से सियासत नहीं चलती, काम से भरोसा कायम होता है।
अब यह फैसला हिमाचल की जनता की अदालत में है कि क्या जिला परिषदों में मिली यह प्रचंड जीत भाजपा को 2027 की सत्ता की दहलीज तक ले जाएगी, या फिर कांग्रेस इन नतीजों से कड़ा सबक लेते हुए अपनी कमजोरियों को सुधारेगी? अगर 2027 में वापसी करनी है, तो मंत्रियों और विधायकों को अपने एसी कमरों से बाहर निकलकर धरातल पर उतरना होगा, जनता से सीधा संवाद बनाना होगा और खोई हुई राजनीतिक जमीन को दोबारा सींचना होगा।
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