ब्यूरो चीफ, सुरेंद्र राणा (पंजाब दस्तक)
लोकतंत्र में जनता को व्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, लेकिन आज वही आम नागरिक अपने बुनियादी हक के लिए घिसटने को मजबूर है। एक तरफ पूर्व सांसदों और पूर्व विधायकों को हर महीने ₹1.20 लाख से लेकर ₹3.25 लाख तक की पेंशन, मुफ्त आवास, रेल-हवाई यात्रा और आजीवन वीआईपी स्वास्थ्य सुविधाएं बिना किसी रुकावट के मिल रही हैं। वहीं दूसरी तरफ, जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़ी 85 वर्षीय आदरणीय बुजुर्ग श्रीमती दर्शना देवी जैसी माताओं को मात्र ₹1000 की वृद्धा और विधवा पेंशन के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं।
’पंजाब दस्तक’ की टीम जब धरातल पर सच जानने हिमाचल प्रदेश के ठियोग स्थित गड़ा कुफर पंचायत पहुंची, तो वहां की तस्वीर ने संवेदनहीन प्रशासनिक तंत्र की पोल खोलकर रख दी।
गड़ा कुफर से ग्राउंड रिपोर्ट: न आवाज, न सहारा—सिस्टम के आगे लाचार श्रीमती दर्शना देवी
लाठी के सहारे जिंदगी: 85 वर्ष की उम्र में आदरणीय श्रीमती दर्शना देवी गंभीर बीमारियों से घिरी हैं। वह न तो अपने पैरों पर ठीक से चल सकती हैं और न ही बोलकर अपनी तकलीफ बयां कर सकती हैं। हाथ में थमी एक लकड़ी की लाठी ही उनका एकमात्र सहारा है।
अधिकार की भीख नहीं: वृद्धा पेंशन और विधवा (विडो) पेंशन कोई सरकारी खैरात या रहम नहीं, बल्कि उनका कानूनी और मानवीय अधिकार है। इसके बावजूद लगभग एक साल से उन्हें इस मामूली राशि के लिए तड़पाया जा रहा है।
प्रशासन से तीखे सवाल: ‘पंजाब दस्तक’ ने मौके पर पहुंचकर ठियोग के वेलफेयर ऑफिसर (चौहान साहब) से सीधा इंटरव्यू लिया और तीखे सवाल दागे। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि फाइलों के दफ्तरों में गुम इस संवेदनहीनता की जवाबदेही आखिर किसकी है?
अकेली श्रीमती दर्शना देवी नहीं, देश में लाखों बुजुर्ग बेहाल
गड़ा कुफर की यह व्यथा अकेली नहीं है। आज पूरे भारतवर्ष, नॉर्थ इंडिया और समूचे हिमाचल प्रदेश में लाखों बेसहारा बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं इसी तरह सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब से लेकर मध्य प्रदेश तक—हर राज्य में अनगिनत ‘दर्शना’ न्याय की आस में बैठी हैं, जिन्हें अपने ही हक के लिए भटकना पड़ रहा है।
मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय प्रशासन तक सीधे सवाल:
नीति-निर्माताओं की जिम्मेदारी: माननीय मुख्यमंत्री महोदय, जिलाधीश (डीसी), एसडीएम और जिला कल्याण अधिकारी (डीएसडब्ल्यूओ) कब इस गंभीर मुद्दे पर संज्ञान लेंगे?
सिस्टम का अड़ंगा: फाइलों में जानबूझकर अड़ंगा लगाने वाले, दस्तावेजों की कमियां गिनाने वाले और बुजुर्गों को टहलाने वाले कर्मचारियों की जवाबदेही कब तय होगी?
दोहरा मापदंड क्यों: जो माननीय एक कार्यकाल पूरा करते ही जीवनभर लाखों की पेंशन और शाही सुख-सुविधाएं पाते हैं, क्या उन्हें वोट देकर सत्ता तक पहुंचाने वाले इन बेसहारा बुजुर्गों के हक की कोई कीमत नहीं है?
जनता की राय: सोई हुई सरकार और अफसरों को जगाने के लिए कमेंट जरूर करें
यह लड़ाई केवल एक पेंशन की नहीं, बल्कि देश के लाखों बेसहारा बुजुर्गों के सम्मान और अधिकार की है। सोई हुई सरकार और बेपरवाह अफसरों को नींद से जगाने तथा इस आवाज को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आपकी राय बेहद जरूरी है। आपके विचार और कमेंट्स ही हमारा मनोबल बढ़ाते हैं और निष्पक्ष पत्रकारिता को ताकत देते हैं।
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