हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का पीटीए शिक्षकों को झटका: 2006-08 की शुरुआती सेवा नहीं मानी जाएगी नियमित

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​सुरेंद्र राणा, पंजाब दस्तक
​तय नियमों व निष्पक्ष चयन के बिना मिली नियुक्ति पर नहीं मिलेंगे पक्के लाभ: हाई कोर्ट
​पंजाब दस्तक, विशेष रिपोर्ट:
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने पीटीए (Parent Teacher Association) शिक्षकों के मामले में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत के इस सख्त रुख से वर्ष 2006 से 2008 के बीच नियुक्त हुए सैकड़ों पीटीए शिक्षकों की उन उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर गया है, जो अपनी शुरुआती अस्थाई सेवा को ‘नियमित नौकरी’ मानकर पेंशन, इंक्रीमेंट और वरिष्ठता के लाभ की आस लगाए बैठे थे।


​सिंगल बेंच के फैसले को डबल बेंच ने बदला
​गौरतलब है कि इससे पहले हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने शिक्षकों के पक्ष में फैसला सुनाया था। लेकिन राज्य सरकार द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए 23 जुलाई को न्यायमूर्ति की खंडपीठ (डबल बेंच) ने सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त कर दिया और सरकार की अपील को स्वीकार कर लिया।


​फैसले के मुख्य कानूनी आधार
​हाई कोर्ट की डबल बेंच ने स्पष्ट किया कि आखिर क्यों पीटीए की शुरुआती नौकरी को नियमित नहीं माना जा सकता:
​आरएंडपी नियमों (R&P Rules) की अनदेखी: वर्ष 2006 से 2008 के दौरान की गई पीटीए भर्तियां राज्य के निर्धारित भर्ती एवं पदोन्नति नियमों (Recruitment and Promotion Rules) के तहत नहीं हुई थीं।


​बिना प्रतियोगी परीक्षा के सीधी तैनाती: इन नियुक्तियों के लिए कोई राज्यस्तरीय प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा (Competitive Exam) आयोजित नहीं की गई थी। ये केवल स्थानीय निकायों (SMC/PTA) द्वारा तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए रखे गए अस्थाई प्रबंध थे।


​वित्तीय व सेवा लाभों पर रोक: चूंकि शुरुआती नियुक्ति असंवैधानिक और तदर्थ (Ad-hoc) थी, इसलिए इस अवधि को जोड़कर वार्षिक वेतन वृद्धि (Increments), वरिष्ठता (Seniority) या सेवानिवृत्ति पेंशनरी लाभ (Retirement Benefits) का दावा नहीं किया जा सकता।


​वर्षों की कठिन सेवा के बाद अब रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़ा शिक्षक वर्ग कहां जाए?
​इस कानूनी फैसले के इतर एक बेहद दुखद और संवेदनशील पहलू यह भी है कि 2006 से 2008 के बीच लगे ये शिक्षक आज अपनी उम्र और सेवा के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं जहां अधिकांश शिक्षक रिटायरमेंट (सेवानिवृत्ति) की दहलीज पर खड़े हैं या जल्द ही सेवानिवृत्त होने वाले हैं।


​इन शिक्षकों ने अपने जीवन के सबसे सुनहरे और कीमती साल राज्य के उन बेहद दुर्गम, कठिन और दूर-दराज़ के ग्रामीण इलाकों में सेवाएं देते हुए न्योछावर कर दिए, जहां कोई जाना भी पसंद नहीं करता था। शून्य सुविधाओं के बीच बच्चों का भविष्य संवारने वाले इन पीटीए शिक्षकों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि ‘आखिर अब यह लोग कहां जाएंगे?’
​जीवन भर की कठिन निष्ठा के बाद जब हाथ में न तो शुरुआती सेवा की पेंशनरी मदद होगी और ना ही पर्याप्त वित्तीय लाभ, तो ऐसे में रिटायरमेंट के बाद जीवन यापन करना इन परिवारों के लिए एक बहुत बड़ा संकट बन जाएगा।


​प्रशासनिक नियम बनाम मानवीय धरातल
​अदालत का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की उस नीति को तो स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि बिना तय प्रक्रिया और आरएंडपी नियमों के तहत हुई बैकडोर या अस्थाई नियुक्तियों को पक्की नौकरी का दर्जा नहीं दिया जा सकता ताकि सरकारी भर्तियों में निष्पक्षता बनी रहे।


​परंतु दूसरी ओर, वर्षों तक दुर्गम इलाकों में खून-पसीना बहाने वाले इन शिक्षकों का यह दर्द भी पूरी तरह जायज है कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर उन्हें अपनी ही मेहनत के वाजिब हक से वंचित होना पड़ रहा है।


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