36,000 मतदाताओं के समर्थन का दावा कर घिरे पूर्व मंत्री; सुजानपुर व सुलह का उदाहरण दे जनता बोली— “कद्दावर नेता कभी जनता के जनादेश को नहीं कोसते”
पंजाब दस्तक / उमांशी राणा
मंडी / द्रंग:
हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठतम नेता, पूर्व कैबिनेट मंत्री और आठ बार विधायक रह चुके कौल सिंह ठाकुर अपने ही बयानों को लेकर चौतरफा घिर गए हैं। राजनीति से संन्यास लेने की सार्वजनिक घोषणा करने के महज 24 घंटे के भीतर अपने फैसले से पलटने के बाद, अब उनका एक और विवादित बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
कौल सिंह ठाकुर ने दावा किया है कि द्रंग विधानसभा क्षेत्र के 36,000 मतदाता आज भी उनके साथ पूरी मजबूती से खड़े हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि 2022 के विधानसभा चुनाव में उनका चुनाव हारना “जनता का दुर्भाग्य” था।
संन्यास, हाईकमान और कार्यकर्ताओं की राय: बार-बार बदलते बोल
सोमवार को द्रंग के कटौला में ‘सैरनु मेले’ का शुभारंभ करने पहुंचे कौल सिंह ठाकुर के ढुलमुल रवैये पर अब सवाल उठने लगे हैं। संन्यास से मुकरने के बाद अब उनका कहना है कि यदि कांग्रेस हाईकमान उन्हें चुनाव लड़ने का आदेश देता है तो वह मना नहीं कर सकते।
इस पर राजनीतिक हलकों और जनता में चर्चा छिड़ गई है कि जब संत रामपाल के समक्ष जाकर उन्होंने पूर्ण रूप से संन्यास लेने की घोषणा की थी, तब क्या हाईकमान का कोई आदेश आड़े आया था? जब आश्रम में अध्यात्म के सामने सब छोड़कर आने का दावा किया था, तब ऐसा क्यों कहा गया?
इतना ही नहीं, अब कौल सिंह कह रहे हैं कि वह नवंबर महीने में समर्थकों और कार्यकर्ताओं को बुलाकर आगे की रणनीति पर उनकी राय लेंगे। बार-बार बयान बदलने, कभी संन्यास लेने, कभी संन्यास वापस लेने, कभी हाईकमान की दुहाई देने और कभी कार्यकर्ताओं से राय मांगने के इस ‘पलटू’ रवैये से जनता और कार्यकर्ता दोनों असमंजस में हैं।
”क्या MLA बनने पर ही होंगे काम?”— जनता ने कौल सिंह से पूछे तीखे सवाल
स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों ने कौल सिंह ठाकुर की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आखिर क्या विधायक या मंत्री बनने पर ही जनता के काम होते हैं? प्रदेश में अपनी ही कांग्रेस पार्टी की सरकार है। कौल सिंह ठाकुर आठ बार के विधायक, चार बार के कैबिनेट मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और दो बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं। इतने कद्दावर कद के नेता के लिए क्या बिना विधायक पद के द्रंग के विकास कार्य करवाना संभव नहीं है?
लोग सवाल उठा रहे हैं कि एक तरफ तो वह दावा करते हैं कि 36,000 मतदाता उनके साथ हैं, वहीं दूसरी तरफ अक्सर उनके ऐसे बयान आते रहते हैं कि ‘मेरे कहने पर तो चपरासी का तबादला भी नहीं होता’। जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और वह पार्टी के इतने बड़े नेता हैं, तो वह आज भी जनता और उन 3,6,000 समर्थकों के काम क्यों नहीं करवा पा रहे हैं? क्या जनता के काम करने के लिए सत्ता की कुर्सी का होना ही अनिवार्य है?
”जनता का दुर्भाग्य” बताने पर लोगों में भारी नाराजगी
वर्ष 2022 के चुनाव में अपनी हार का ठीकरा जनता के विवेक पर फोड़ते हुए इसे ‘जनता का दुर्भाग्य’ करार देने पर स्थानीय लोगों और राजनीतिक विश्लेषकों में तीखा आक्रोश देखने को मिल रहा है। जनमानस का कहना है कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है और वह अपने भाग्य व स्वविवेक से वोट डालती है। किसको सत्ता देनी है और किसे नहीं, यह पूरी तरह जनता पर निर्भर करता है। जनता के जनादेश को ‘दुर्भाग्य’ कहना जनता का सीधा अपमान है।
बड़े नेताओं ने कभी जनता के जनादेश को नहीं कोसा
सुलह और सुजानपुर जैसे बड़े विधानसभा क्षेत्रों के उदाहरण देते हुए क्षेत्र के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि जब-जब बड़े नेताओं को पराजय का सामना करना पड़ा, तब भी उन नेताओं ने हमेशा जनता के फैसले को सिर-आंखों पर बिठाया और कभी जनता को दोष नहीं दिया। सुलह और सुजानपुर के दिग्गजों ने भी कभी पराजय के लिए जनता को कसूरवार नहीं ठहराया।
इसके विपरीत, कौल सिंह ठाकुर का अपनी हार को जनता का ही ‘दुर्भाग्य’ बताना और अपनी मर्जी से वोट देने वाली जनता पर सवाल उठाना यह दर्शाता है कि वह जनता के फैसले का सम्मान करने के बजाय उस पर तंज कस रहे हैं।
24 घंटे के यू-टर्न से लगातार हो रही फजीहत
हरियाणा में संत रामपाल के समक्ष संन्यास का ऐलान करने, फिर 24 घंटे में मुकरने और अब कटौला मेले में फिर से बयान बदलने के बाद कौल सिंह ठाकुर की चौतरफा फजीहत हो रही है। 36,000 समर्थकों का दावा करने और हार के लिए जनता को दोष देने वाले बयानों ने उनकी राजनीतिक साख पर और बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। उनके इस रुख से द्रंग क्षेत्र की जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं में गहरी निराशा व्याप्त है।
