बड़ा सवाल: क्या अस्पताल बंद हो जाएंगे या मरीज आने बंद? ओपीएस देने वाली सरकार में युवाओं से ये कैसा अधूरा न्याय!
पंजाब दस्तक
विशेष ब्यूरो, धर्मशाला (भेषज):
हिमाचल प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग द्वारा हाल ही में निकाली गई 372 असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की भर्ती ने राज्य के बेरोजगार युवाओं और नीतिगत गलियारों में एक नया भूचाल ला दिया है। ‘पंजाब दस्तक’ पर इस खबर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर प्रदेश के युवाओं का गुस्सा और सन्नाटा दोनों एक साथ देखने को मिल रहा है। हर तरफ से एक ही तीखा सवाल गूंज रहा है—”क्या केंद्र की ‘अग्निवीर’ नीति की तर्ज पर अब हिमाचल सरकार भी युवाओं के भविष्य को ‘शॉर्ट-टर्म’ (अल्पकालिक) के चक्रव्यूह में फंसाने जा रही है?”
सवाल सिर्फ एक विभाग का नहीं है। हिमाचल के पढ़े-लिखे बेरोजगार युवा आज इस व्यवस्था से कोई संदेश नहीं, बल्कि सीधा और तीखा प्रश्न पूछ रहे हैं, जिसका जवाब देना सरकार और नीति-निर्धारकों के लिए भी आसान नहीं होगा।
इन प्रमुख मेडिकल कॉलेजों में तैनात किया जाएगा
हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग हमीरपुर की सिफारिशों के आधार पर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान निदेशालय (HP) द्वारा अधिसूचित ‘अंतिम असिस्टेंट स्टाफ नर्स नीति’ के तहत चयनित इन 372 नर्सों को प्रदेश के इन शीर्ष चिकित्सा संस्थानों में तैनात किया जाएगा:
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सरकारी मेडिकल कॉलेज (टांडा, धर्मशाला), डॉ. राधाकृष्णन सरकारी मेडिकल कॉलेज (हमीरपुर), इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC, शिमला), डॉ. वाई एस परमार सरकारी मेडिकल कॉलेज (नाहन), श्री लाल बहादुर शास्त्री सरकारी मेडिकल कॉलेज (नेरचौक), पंडित जवाहरलाल नेहरू सरकारी मेडिकल कॉलेज (चंबा), अटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशलिटी (चमियाना, शिमला)।
’नाम नए, नीति वही’—हर विभाग में युवाओं से खिलवाड़ क्यों?
युवाओं का सबसे बड़ा आरोप यह है कि हर विभाग में युवाओं को उलझाने के लिए ‘नए-नए नाम’ गढ़ दिए जाते हैं। वन विभाग में अलग नाम, स्वास्थ्य विभाग में ‘स्टाफ नर्स’ की जगह ‘असिस्टेंट स्टाफ नर्स’ का नया नाम और अन्य विभागों में भी इसी तरह के अस्थायी पदनाम दिए जा रहे हैं।
युवा पूछ रहे हैं कि इन भारी-भरकम नए नामों के पीछे का असली सच क्या है? क्या सिर्फ नाम बदलकर पक्की नौकरियों के वादों से पल्ला झाड़ा जा रहा है? जिस सरकार ने सत्ता में आने से पहले राज्य के युवाओं को ‘पक्की नौकरी’ का भरोसा दिया था, वहां आज 25,000 रुपये के फिक्स मानदेय पर 5 साल के ‘शॉर्ट-टर्म’ सौदे क्यों थमाए जा रहे हैं?
काम पूरा, बंदिशें सख्त… क्या इतने मानदेय में हो जाएगा गुजारा?
बेरोजगार युवाओं का एक सीधा सवाल काम और जिम्मेदारी को लेकर है। इस नई नीति के तहत आने वाली इन बच्चियों से काम तो पूरा लिया जाएगा, लेकिन वेतन के नाम पर महज 25,000 रुपये थमाए जा रहे हैं। आज के इस महंगाई के दौर में युवा पूछ रहे हैं कि क्या इतने कम मानदेय में उनका गुजारा हो पाएगा?
इस नियुक्ति के साथ-साथ बेहद सख्त आदेश भी जारी किए गए हैं। नीति के तहत इन नर्सों को ट्रॉमा, आईसीयू (ICU), एनआईसीयू (NICU), लेबर रूम और अन्य क्रिटिकल वार्डों में कम से कम 30% रात्रि ड्यूटी (Night Duty) भी अनिवार्य रूप से करनी होगी। युवाओं का सीधा प्रश्न है कि जब काम और जिम्मेदारी इतनी बड़ी है, तो सुरक्षा और सुविधाओं के नाम पर ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों? इसके अलावा पात्रता में कमी या कार्यस्थल पर किसी भी कदाचार पर सीधे सेवा समाप्त करने के भी सख्त आदेश हैं।
सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न: 5 साल बाद अंधकार, बेबसी या फिर कोर्ट के चक्कर?
इस भर्ती की सबसे घातक और सख्त शर्त यह है कि 5 साल की सेवा पूरी होने के बाद भी ये कर्मचारी नियमितीकरण (Regularization) का कोई दावा नहीं कर सकेंगे। आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा गया है:
”यह नियुक्ति किसी भी प्रकार से नियमितीकरण का अधिकार प्रदान नहीं करेगी। 5 वर्ष की सेवा पूरी होने के बाद भी नियुक्ति कर्मी नियमित पदों या विभाग के ‘एक्स-कैडर’ पदों पर नियमितीकरण का दावा नहीं कर सकेंगे।”
आज घरों में बैठे बेरोजगार युवा और उनके माता-पिता पूछ रहे हैं कि उम्र के सबसे कीमती 5 साल अस्पताल की कठिन ड्यूटियों में खपाने के बाद ये बेटियां कहां जाएंगी?
क्या 5 साल बाद इन मेडिकल कॉलेजों में मरीज आने बंद हो जाएंगे या अस्पताल बंद हो जाएंगे?
आज मजबूरी और बेबसी में यह युवा नौकरी तो ले लेंगे, लेकिन क्या 5 साल बाद इन्हें अपने हक के लिए फिर सड़कों पर नहीं उतरना पड़ेगा? क्या इन्हें अपनी आजीविका बचाने के लिए फिर अदालतों और कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पर मजबूर नहीं होना पड़ेगा?
बिना किसी स्पष्ट नीति के ऐसे अधूरे कानून क्यों बनाए जाते हैं, जो युवाओं को भविष्य में केवल धरने, हड़ताल Descriptions और मुकदमों के रास्ते पर धकेल दें?
भविष्य के इसी अंधकार के कारण आज युवाओं की शादियां और रिश्ते तक नहीं हो पा रहे हैं। सालों-साल पढ़ने लिखने के बाद भी युवा आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
ओपीएस (OPS) खत्म, वेतन वृद्धि खत्म—लाभ के नाम पर सिर्फ छलावा
एक तरफ प्रदेश सरकार पुरानी पेंशन योजना (OPS) को बहाल करने की पीठ थपथपाती है, वहीं दूसरी तरफ इस नई भर्ती में ओपीएस तो दूर, सामान्य सुविधाएं भी छीन ली गई हैं।
क्या मिलेगा: इन असिस्टेंट स्टाफ नर्सों को केवल हिमकेयर (Himcare) और आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य लाभ योजनाओं का कवर मिलेगा।
क्या नहीं मिलेगा: नियमित सरकारी कर्मचारियों पर लागू होने वाले सेवा नियम, पुरानी पेंशन (OPS), वार्षिक वेतन वृद्धि (Increment) और अन्य वित्तीय लाभ इन पर पूरी तरह से प्रतिबंधित रहेंगे। यानी ओपीएस भी खत्म और वेतन वृद्धि भी खत्म!
गंभीर सवाल: क्या लोकप्रिय मुख्यमंत्री को गुमराह कर रहे हैं अफसर?
हिमाचल प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री ने पूरे देश में पुरानी पेंशन योजना (OPS) को बहाल करके कर्मचारियों के हक में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया था। जो सरकार कर्मचारियों के बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए ओपीएस (OPS) जैसी नीति ला सकती है, उसी सरकार के नाक के नीचे युवाओं के भविष्य को अधर में लटकाने वाली ऐसी ‘अग्निवीर’ जैसी नीतियां कैसे तैयार हो रही हैं?
यहाँ एक बहुत बड़ा और गंभीर सवाल प्रशासनिक व्यवस्था पर उठता है:
”क्या सचिवालय में बैठे कुछ बड़े अफसर अपनी कागजी वाहवाही लूटने के लिए लोकप्रिय सरकार और मुख्यमंत्री को गुमराह कर रहे हैं? युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाली ये नीतियां आख़िर किस ‘अफसरशाही’ के दिमाग की उपज हैं?”
नीति बनाने वाले वातानुकूलित कमरों में बैठे इन अफसरों को यह समझना होगा कि जमीन पर एक गरीब का बच्चा दिन-रात मेहनत करके परीक्षा पास करता है। उसे 25,000 रुपये की नौकरी में सख्त बंदिशें तो मंजूर हैं, लेकिन 5 साल बाद भविष्य का अंधकार मंजूर नहीं है।
हिमाचल के बेरोजगार युवाओं का सीधा सवाल
यह नीति सीधे तौर पर युवाओं के श्रम का शोषण है। समय रहते अगर इन प्रशासनिक गलतियों और अधूरे कानूनों को नहीं सुधारा गया, तो आने वाले समय में यह नीति प्रदेश के युवाओं के आक्रोश को एक बड़े आंदोलन में बदल सकती है। सरकार को इन ‘अग्निवीर’ मार्का नीतियों को लाने वाले अफसरों की जवाबदेही तय करनी ही होगी।
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