हिमाचल प्रदेश में OPS और UPS को लेकर छिड़ी राजनीतिक बहस

हिमाचल में खत्म हो जाएगी OPS? क्या कहता है खजाना और कितनी टेढ़ी खीर है पुरानी पेंशन बंद करना!

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​सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ (शिमला)
​शिमला:
केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता जेपी नड्डा ने हिमाचल प्रदेश में ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) को लेकर जो बयान दिया है, उसने प्रदेश की सियासत में एक बार फिर नया तूफान खड़ा कर दिया है। छोटे पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव का टर्निंग पॉइंट रही OPS इस बार नए सिरे से चर्चा के केंद्र में है।


​केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने साफ शब्दों में कहा, “भाजपा का स्टैंड बिल्कुल क्लियर है। हमारा जो स्टैंड 2022 में था, वही आज भी रहेगा। हम तो न्यू स्कीम एनपीएस (NPS)—जिसे अब केंद्र सरकार ने यूपीएस (UPS) यानी यूनिफाइड पेंशन स्कीम के रूप में सुधारा है—उसी तर्ज पर आगे बढ़ेंगे।” इस बयान के बाद अब गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक यह बहस छिड़ गई है कि क्या हिमाचल प्रदेश में OPS बंद हो जाएगी? क्या ऐसा करना वित्तीय और कानूनी रूप से संभव है? और अगर ऐसा हुआ, तो इसके सियासी और सामाजिक असर क्या होंगे?


​’जो मामा मंदा नहीं…’ से लेकर ‘सुपर सोनिक सरकार’ तक का सफर
​हिमाचल में OPS की बहाली का आंदोलन बेहद दिलचस्प रहा है। पूर्व भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के कार्यकाल के दौरान जब कर्मचारियों का आंदोलन चरम पर था, तब एक कर्मचारी नेता ने नारा दिया था—
​”जो यह मामा मंदा नहीं, कर्मचारी को सुनता नहीं। जो यह मामा माने जा, पुरानी पेंशन पाछू ला।”
(अर्थात: जयराम मामा जी मानते नहीं और कर्मचारियों की आवाज सुनते नहीं, अब मान जाइए और पुरानी पेंशन लागू कर दीजिए।)
​चुनाव हुए, सत्ता बदली और कांग्रेस की राष्ट्रीय नेता प्रियंका वाड्रा सहित शीर्ष नेतृत्व के वादे के मुताबिक सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने पहली ही कैबिनेट में OPS को बहाल कर दिया। इसके बाद उसी कर्मचारी नेता ने सुक्खू सरकार को ‘सुपर सोनिक सरकार’ का तमगा दे दिया था। मुख्यमंत्री सुक्खू ने दावा किया था कि राज्य में होने वाली हर नई नियुक्ति OPS के दायरे में होगी।


​लोक-कल्याण और राजधर्म का नीति श्लोक
​पेंशन और जनता की सामाजिक सुरक्षा के इस विषय पर हमारे शास्त्रों और महापुरुषों ने राजधर्म को लेकर एक बेहद सुंदर बात कही है, जो आज की व्यवस्था पर बिल्कुल सटीक बैठती है:
​लोकाग्रणी प्रजायोग्यः सर्वकल्याणतत्परः।
सत्यव्रती दृढव्रतः स राजा राज्यमर्हति॥
​(अर्थात: जो जनता का सच्चा नेतृत्व करे, प्रजा के योग्य हो, सबके कल्याण के लिए तत्पर रहे, सत्यवादी हो और अपने संकल्पों पर दृढ़ रहे—वही वास्तविक रूप से शासन करने और व्यवस्था को चलाने योग्य होता है।)


​आज हिमाचल प्रदेश के लाखों कर्मचारी और युवा भी सरकारों से इसी जन-कल्याण और दृढ़ संकल्प की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
​एक तरफ OPS की खुशी, दूसरी तरफ बेरोजगारों का फूटा दर्द: “नौकरियां गायब, सिर्फ नए नाम”
​पेंशन बहाली से जहां सरकारी कर्मचारी गदगद हैं, वहीं प्रदेश का युवा वर्ग अब खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। हिमाचल के बेरोजगार युवाओं का दर्द अब खुलकर सामने आने लगा है। बेरोजगारों का साफ तौर पर मानना है कि:
​नाम नए, नौकरियां गायब: युवाओं का आरोप है कि प्रदेश में ओपीएस तो लागू हो गई है, लेकिन नियमित नौकरियां तकरीबन खत्म होने की कगार पर हैं। युवाओं को रोजगार देने के बजाय अब सरकार नई-नई योजनाओं और नए-नए नामों के जाल में उलझा रही है।
​नाममात्र की भर्तियां: युवाओं का कहना है कि जो भर्तियां निकल भी रही हैं, वे बेहद ऊंट के मुंह में जीरे के समान (नाममात्र) हैं। नियमित पदों को भरने के बजाय अलग-अलग श्रेणियों और नए नामों के तहत अस्थाई या अनुबंध जैसी व्यवस्थाएं खड़ी की जा रही हैं, जिससे युवाओं का भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा है।


​क्या है हिमाचल में OPS का गणित और कानूनी पेच?
​हिमाचल प्रदेश में ओल्ड पेंशन स्कीम को बंद करना या दोबारा बदलना कोई आसान खेल नहीं है। इसके पीछे एक मजबूत कानूनी और प्रशासनिक ढांचा तैयार हो चुका है:
​1.36 lakh कर्मचारियों को लाभ: प्रदेश के करीब 1.36 लाख कर्मचारी वर्तमान में OPS के दायरे में आ चुके हैं।
​नियमों में संशोधन: राज्य सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव प्रमोद सक्सेना ने मई 2023 में एनपीएस (NPS) खत्म करने और ओपीएस (OPS) शुरू करने के आदेश जारी किए थे। इसके लिए सेंट्रल सिविल सर्विस (पेंशन) रूल्स 1972 में बाकायदा संशोधन किया गया है।
​कट-ऑफ डेट का नियम: हिमाचल में ओपीएस की बहाली 15 मई 2003 से लागू मानी गई है। इसके तहत 15 मई 2003 से लेकर 31 मार्च 2023 तक रिटायर हो चुके एनपीएस (NPS) कर्मचारियों के लिए एचपी सिविल सर्विस कंट्रीब्यूटरी पेंशन रूल्स 2006 में संशोधन किया गया।


​खजाने पर बोझ या साख का सवाल?
​अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई भी सरकार इतने बड़े कानूनी संशोधनों के बाद इसे वापस ले सकती है? विशेषज्ञों की मानें तो लागू हो चुकी पेंशन योजना को वापस लेना सरकार के लिए ‘टेढ़ी खीर’ साबित होगा। यह मामला अब सिर्फ वित्तीय बोझ का नहीं, बल्कि कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा, बेरोजगारों के रोजगार और राजनीतिक दलों की साख का बन चुका है। नड्डा के बयान के बाद जहां कर्मचारी संगठनों में चिंता की लकीरें हैं, वहीं विपक्ष और बेरोजगार युवाओं के तेवरों ने राज्य के राजनीतिक तापमान को एक बार फिर बढ़ा दिया है।


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