नए नियमों में बदलाव से कई उम्मीदवार रेस से बाहर

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शिमला, सुरेंद्र राणा: हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर सियासी सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच गई है। अब नामांकन भरने में मात्र एक दिन शेष रह गया है। ऐसे में कानूनी प्रावधानों के अनुसार राज्य के बहुत से उम्मीदवारों में चुनाव लडऩे और नहीं लडऩे को लेकर असमंजस जरूर बना हुआ है। राज्य में बीते दो दिनों में हालांकि 42,562 उम्मीदवार अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं, लेकिन चुनावी उत्साह के बीच एक बड़ा सवाल चर्चा में है कि आखिर कौन लोग चुनाव नहीं लड़ सकते। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे कई लोग हैं, जो चुनाव तो लडऩा चाहते हैं, लेकिन नियमों के तहत अब असमंजस में है। हाल ही में सरकार ने कई नियमों में बदलाव भी किया है तो ऐसे में नए निर्देशों में बहुत कुछ बदल गया है।

यदि पिता ने अतिक्रमण किया हो, तो बेटा चुनाव नहीं लड़ सकता है। दादा-दादी ने अतिक्रमण किया हो, तो पोता चुनाव नहीं लड़ सकता। इसके अलावा ससुर ने अतिक्रमण किया हो, तो बहू भी अब चुनाव नहीं लड़ सकती है। पति या पत्नी में से किसी के नाम पर अवैध कब्जा हो, तो वे भी चुनाव लडऩे के अयोग्य होंगे। अविवाहित पुत्री के नाम पर अवैध कब्जा होने पर, वह चुनाव प्रक्रिया से बाहर हो जाएगी। इसी तरह माता-पिता ने अतिक्रमण किया हो, तो बेटा चुनाव नहीं लड़ सकता। उम्मीदवारों को कानूनी प्रावधानों की जानकारी न होने के कारण कई उम्मीदवार चुनावी रेस से बाहर हो सकते हैं। इतना ही नहीं, यदि चुनाव जीतने के बाद भी आरोप सिद्ध होते हैं तो जनप्रतिनिधि की कुर्सी भी जा सकती है।भ्रष्टाचार में संलिप्त लोगों पर लगा विरामभ्रष्टाचार या चुनावी अनियमितता में दोषी पाए गए व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि को-ऑपरेटिव सोसायटी या पंचायत के डिफाल्टर भी चुनाव लडऩे से वंचित रहेंगे। यदि परिवार के किसी सदस्य ने सरकारी भूमि पर कब्जा किया हो तो भी उम्मीदवारी प्रभावित हो सकती है। पंचायत निधि या टैक्स का भुगतान न करने वाले व्यक्ति को चुनाव लडऩे की अनुमति नहीं होगी। जिस व्यक्ति पर पंचायत की रिकवरी लंबित है, वह भी अयोग्य माना जाएगा।प्रदेश में 31,182 पदों पर चुनावप्रदेशभर में कुल 31,182 पदों पर चुनाव होने हैं. इनमें 21,654 ग्राम पंचायत सदस्य, 3,754 प्रधान, 3,754 उपप्रधान, 1,769 पंचायत समिति सदस्य और 251 जिला परिषद सीटें शामिल हैं। गांव की चौपालों से लेकर जिला मुख्यालय तक चुनावी हलचल तेज हो चुकी है और अब हर किसी की नजर नामांकन प्रक्रिया और चुनावी मुकाबले पर टिकी हुई है।

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