शिमला | विशेष रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक: हिमाचल प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के अपने वादे पर अडिग हैं। अपने करीबियों और बोर्ड-निगमों के अध्यक्षों से कैबिनेट रैंक वापस लेने का फैसला उनकी उस छवि को और मजबूत करता है, जिसमें उन्हें एक ‘कड़े और निडर फैसले लेने वाला जननायक’ माना जाता है।ब्यूरो चीफ का विश्लेषण:हिमाचल की जनता और पंजाब दस्तक के दर्शक इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं। मुख्यमंत्री सुक्खू ने यह दिखा दिया है कि जब बात प्रदेश के आर्थिक हितों की आती है, तो वे अपने राजनीतिक हितों या करीबियों की नाराजगी की परवाह नहीं करते। अपने ही सलाहकारों और सहयोगियों की सुविधाओं पर कैंची चलाना एक ऐतिहासिक कदम है, जो केवल वही मुख्यमंत्री ले सकता है जिसमें अटूट राजनीतिक इच्छाशक्ति हो।30 सितंबर की समय सीमा: एक बड़ी चुनौतीसरकार ने मानदेय में 20% की कटौती और रैंक वापसी के लिए 30 सितंबर तक की समय सीमा तय की है। अधिसूचना के बाद अब जनता की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस छोटी अवधि में आर्थिक हालात पटरी पर लौट आएंगे? या फिर मुख्यमंत्री इस मुहिम को और व्यापक बनाएंगे?पंजाब दस्तक के दर्शकों का सीधा सुझाव: ‘नो व्हीकल डे’ की दरकारप्रदेश के कोने-कोने से पंजाब दस्तक से जुड़े दर्शकों का एक बड़ा सुझाव सामने आया है। दर्शकों का मानना है कि चूंकि मुख्यमंत्री सुक्खू कड़े फैसले लेने में सक्षम हैं, इसलिए उन्हें एक और क्रांतिकारी कदम उठाना चाहिए:”सरकार सप्ताह का कोई एक दिन (जैसे सोमवार या कोई अन्य दिन) ‘नो व्हीकल डे’ घोषित करे। इस दिन मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों और आला अधिकारियों तक की सरकारी गाड़ियां बंद रहें। अगर एक दिन भी सचिवालय में गाड़ियों का धुआं नहीं उड़ेगा, तो इससे करोड़ों रुपये के ईंधन की बचत होगी और जनता के बीच एक सकारात्मक संदेश जाएगा कि सरकार वाकई फिजूलखर्ची के खिलाफ है।”क्या सुक्खू सरकार बनेगी मिसाल?हिमाचल की जनता को पूरा भरोसा है कि मुख्यमंत्री सुक्खू इस तरह के कड़े सुधारों को अंजाम देने का दम रखते हैं। अब देखना यह होगा कि कैबिनेट रैंक वापस लेने के बाद क्या सरकार गाड़ियों के काफिलों और अन्य बड़े खर्चों पर भी इसी तरह का ‘हंटर’ चलाती है या नहीं।
