सुरेन्द्र राणा (ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक)
चंडीगढ़/मोहाली: पंजाब की राजनीति में इस वक्त का सबसे बड़ा और पक्का घटनाक्रम सामने आ चुका है। राज्यसभा के 7 दिग्गज सांसदों—राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल—के सामूहिक इस्तीफे और भाजपा में शामिल होने के बाद अब पंजाब की भगवंत मान सरकार के भीतर भी बड़ी ‘टूट’ की पटकथा लिखी जा चुकी है। विश्वसनीय सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि सत्ताधारी दल के 15 से 18 विधायक अब बगावत का झंडा बुलंद कर चुके हैं और किसी भी समय बड़ा फैसला ले सकते हैं।
सचिवालय से मोहाली तक खलबली:
सचिवालय और मोहाली के सियासी गलियारों में यह खबर अब महज चर्चा नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है। इन विधायकों ने साफ कर दिया है कि वे अब और चुप बैठने को तैयार नहीं हैं। खबर की गंभीरता को निम्नलिखित तथ्यों से समझा जा सकता है:
धरातल पर अधूरे वादे: बागी तेवर अपना रहे विधायकों के गुट ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव के समय जनता से किए गए वादे और ‘गारंटियां’ जमीनी स्तर पर पूरी नहीं हो रही हैं। विकास कार्य ठप होने के कारण विधायकों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जनता के भारी विरोध और कड़े सवालों का सामना करना पड़ रहा है।
”क्या फायदा ऐसी सत्ता का?”: नाराज विधायकों का तर्क है कि जब वे जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे और लोगों के छोटे-छोटे काम भी नहीं हो रहे, तो ऐसी सरकार का हिस्सा बने रहने का कोई औचित्य नहीं है।
अफसरशाही का ‘जंगलराज’: विधायकों में इस बात को लेकर गहरा रोष है कि जिलों और सचिवालय में उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही। प्रशासनिक अधिकारियों की मनमानी और जनप्रतिनिधियों की निरंतर अनदेखी ने विधायकों की राजनीतिक साख को दांव पर लगा दिया है।
हाईकमान की नाकाम कोशिशें:
सूत्र बताते हैं कि मनीष सिसोदिया और मुख्यमंत्री मान द्वारा विधायकों को मनाने के लिए की गई आपातकालीन बैठकें बेअसर साबित हुई हैं। सांसदों के पलायन के बाद अब विधानसभा के भीतर इस बड़ी बगावत ने सरकार की स्थिरता पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। यदि इन 15-18 विधायकों ने कोई सामूहिक कदम उठाया, तो पंजाब में सत्ता का पूरा समीकरण बदलना तय है।
