विशेष रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा (ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक)
नई दिल्ली / पंजाब दस्तक ब्यूरो:
भारतीय रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन इसी रेलवे के भीतर से एक ऐसी सनसनीखेज रिपोर्ट सामने आई है जिसने पूरे सरकारी और प्रशासनिक तंत्र को हिलाकर रख दिया है। एक आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक, रेलवे के एसी कोचों (AC Coaches) से सामान गायब होने की वजह से भारतीय रेलवे को पिछले वर्षों में 100 करोड़ रुपये का भारी-भरकम नुकसान हुआ है।
लेकिन पंजाब दस्तक की इस खोजी रिपोर्ट में ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा ने अब यह बड़ा और तीखा सवाल उठा दिया है कि क्या वाकई यह सिर्फ यात्रियों की चोरी है, या फिर रेलवे के भीतर बैठा कोई बड़ा सिंडिकेट और प्राइवेट एजेंसियां मिलकर इस महालूट को अंजाम दे रही हैं?
आंकड़ों का मायाजाल: गायब हुए लाखों तौलिए और बेडशीट
रेलवे द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, एसी श्रेणियों में सफर करने वाले यात्रियों के नाम पर ट्रेनों से लाखों की तादाद में सरकारी सामान गायब दिखाया गया है:
तौलिए: लगभग 46 लाख
बेडशीट: लगभग 41 लाख
कंबल: लगभग 13 लाख
अन्य सामान: हजारों की संख्या में तकिए, तकिए के कवर और कोच की अन्य कीमती सामग्रियां।
ये सभी वस्तुएं हर यात्रा के बाद धोने और सैनिटाइज होने के बाद दोबारा उपयोग में लाई जाती हैं। लेकिन इनके गायब होने से देश के ईमानदार करदाताओं (Taxpayers) के पैसे की सरेआम बर्बादी हो रही है।
प्राइवेटाइजेशन का खेल: लॉन्ड्री और खाने के ठेकेदारों की जवाबदेही पर सवाल
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र राणा की इस ग्राउंड रिपोर्ट में एक बेहद चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। रेलवे ने पिछले कई वर्षों से ट्रेनों में लॉन्ड्री (Laundry) और कैटरिंग/खाना (Catering) का पूरा काम प्राइवेट एजेंसियों (Private Agencies) को ठेके पर दे रखा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि असली जिम्मेदारी किसकी बनती है?
जब इन प्राइवेट कंपनियों को करोड़ों रुपये का ठेका सिर्फ इसी काम के लिए दिया जाता है कि वे तौलिए-चादरें धोएं, उन्हें गिनें और यात्रियों को सुरक्षित सौंपकर वापस लें, तो उनके कर्मचारी अपनी ड्यूटी में इतनी ढिलाई क्यों बरत रहे हैं? क्या इन प्राइवेट एजेंसियों और रेलवे के कुछ बड़े अधिकारियों के बीच कोई अंदरूनी साठगांठ है, जिसके तहत नुकसान को कागजों पर दिखाकर करोड़ों का खेल खेला जा रहा है? अगर सामान लगातार गायब हो रहा था, तो पिछले कई वर्षों से रेलवे इन प्राइवेट ठेकेदारों पर कार्रवाई करने के बजाय चुप क्यों बैठा रहा? क्या प्राइवेट कंपनियों के मुनाफे और लापरवाही को छिपाने के लिए सारा ठीकरा आम जनता के सिर फोड़ा जा रहा है?
धारदार सवाल: क्या रक्षक ही बन गए भक्षक? क्यों साधी है अफसरों ने चुप्पी?
दिल्ली के विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से पंजाब दस्तक सीधे रेलवे प्रशासन से कुछ कड़वे सवाल पूछ रहा है। जनवरी 2022 से मई 2022 के बीच ही केवल करोड़ों रुपये का सामान साफ कर दिया गया।
स्टाफ की जिम्मेदारी क्यों तय नहीं?: हर एसी कोच में एक डेडिकेटेड अटेंडेंट होता है, टीटीई (TTE) तैनात रहते हैं और आरपीएफ (RPF) के सुरक्षाकर्मी मुस्तैद होते हैं। जब ट्रेन गंतव्य पर पहुंचती है, तो स्टाफ यात्रियों से सामान गिनकर वापस क्यों नहीं लेता?
क्या अंदरूनी अधिकारियों की है मिलीभगत?: लाखों की तादाद में कंबल और चादरें बिना किसी अंदरूनी मिलीभगत के ट्रेन से बाहर नहीं जा सकतीं। क्या सारा दोष सिर्फ जनता के सिर मढ़कर रेलवे के कुछ भ्रष्ट अधिकारी अपनी खाल बचा रहे हैं? क्या इस 100 करोड़ के घोटाले में ‘रक्षक ही भक्षक’ की भूमिका में हैं?
रेलवे जवाबदेही से क्यों भाग रहा है?: क्या हजारों रुपये का टिकट लेकर सफर करने वाला हर वीआईपी यात्री चोर है? अगर नहीं, तो रेलवे प्रशासन ने इस चूक पर अब तक अपने लापरवाह अधिकारियों और प्राइवेट ठेकेदारों पर क्या सख्त कार्रवाई की?
जनता की अदालत: पंजाब दस्तक पर फूटा लोगों का गुस्सा (पब्लिक कमेंट्स)
पंजाब दस्तक पर वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र राणा की इस खबर के लाइव होते ही हमारे पाठकों और दर्शकों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। जनता की राय कुछ इस प्रकार है:
कमेंट 1 (रमेश कुमार, दिल्ली): “वाह रे प्यारा भारत और वाह रे यहाँ के प्यारे लोग! जो लोग खुद को बड़े घरों का समझते हैं, वे घर से बेडशीट और तौलिया खरीदने की औकात नहीं रखते क्या? एसी का टिकट ले लेने से ट्रेन का सामान आपका नहीं हो जाता। यह बेहद शर्मनाक है।”
कमेंट 2 (अमित शर्मा, अंबाला): “सारे यात्रियों को बदनाम करना बंद कीजिए। जब कोच में अटेंडेंट और टीटीई होते हैं, तो वे उतरते वक्त सामान चेक क्यों नहीं करते? यह सीधे-सीधे प्राइवेट ठेकेदारों की लापरवाही और अंदरूनी मिलीभगत का नतीजा है। कहीं रक्षक ही भक्षक तो नहीं?”
कमेंट 3 (सुनीता देवी, शिमला): “क्या जो लोग एसी में सफर करते हैं, वे सच में ऐसा काम कर सकते हैं? कुछ लोगों की यह आदत बन चुकी है कि सरकारी संपत्ति है तो इसे अपना समझकर घर ले जाओ। लेकिन इसके साथ ही रेलवे के बड़े अधिकारियों की संपत्ति की भी जांच होनी चाहिए कि आखिर ये सामान जा कहां रहा है!”
कमेंट 4 (राजेश थापा, मोहाली): “यह करदाताओं के पैसे की खुली लूट है। रेलवे को चाहिए कि हर यात्री के उतरने से पहले चादर-तौलिया गिनकर वापस ले, जैसा कि होटलों में होता है। अगर प्राइवेट स्टाफ और अधिकारी लापरवाही बरत रहे हैं, तो सबसे पहले गाज उन पर गिरनी चाहिए।”
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आपकी राय हमारे लिए बेहद जरूरी है!
इस सनसनीखेज खुलासे पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि यह केवल यात्रियों की खराब आदत है या फिर रेलवे प्रशासन, बड़े अधिकारियों और प्राइवेट ठेकेदारों की घोर लापरवाही व मिलीभगत है? क्या रेलवे को अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़कर सारा दोष जनता पर डालना चाहिए? इस पूरे मामले पर आपकी जो भी राय है, नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर अपने कमेंट्स जरूर दें, ताकि हम आपकी आवाज को सीधे रेल मंत्रालय तक पहुंचा सकें!
