पंजाब दस्तक
विशेष ब्यूरो (वंदना ठाकुर), पंजाब दस्तक (विधि विभाग डेस्क)
शिमला:हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक और कानूनी इतिहास में आज का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया है। प्रदेश सचिवालय से लेकर सुदूर जनजातीय क्षेत्रों के फील्ड कार्यालयों तक कार्यरत लाखों चतुर्थ श्रेणी (क्लास-फोर) कर्मचारियों के हक में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने एक युगांतकारी और अंतिम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की उस विशेष अनुमति याचिका (SLP) को सिरे से खारिज कर दिया, जिसके जरिए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्ति का लाभ देने वाले हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक रुख से सरकार की भेदभावपूर्ण नीति ध्वस्त हो गई है और पूरे प्रदेश के क्लास-फोर कर्मचारी वर्ग में जश्न का माहौल है।
सरकार की ‘बांटो और राज करो’ की नीति पर करारा कानूनी प्रहार
सचिवालय के गलियारों और विधि विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, यह पूरी कानूनी लड़ाई राज्य सरकार की 21 फरवरी 2018 की उस विवादित अधिसूचना (नोटिफिकेशन) के खिलाफ थी, जिसने एक ही कैडर के कर्मचारियों को दो धड़ों में बांट दिया था। सरकार ने नियम बनाया था कि 10 मई 2001 से पहले भर्ती हुए चतुर्थ श्रेणी कर्मी 60 वर्ष में रिटायर होंगे, जबकि इसके बाद भर्ती होने वाले कर्मियों की सेवानिवृत्ति आयु घटाकर 58 वर्ष कर दी गई थी।
देश की सबसे बड़ी अदालत ने हिमाचल हाई कोर्ट के विस्तृत और तर्कसंगत फैसले पर पूरी तरह सहमति जताते हुए स्पष्ट कर दिया कि:
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पूरी तरह से एक समान वर्ग (Homogeneous Class) हैं, जिन्हें भर्ती की तारीख के आधार पर अलग नहीं किया जा सकता।
एक ही श्रेणी के कर्मचारियों के बीच सेवानिवृत्ति की आयु में ऐसा दोहरा मापदंड रखना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का सरेआम उल्लंघन है।
इस टिप्पणी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की उस भेदभावपूर्ण अधिसूचना को हमेशा के लिए निरस्त कर दिया है।
112 याचिकाओं का महा-संग्राम: हाई कोर्ट के फैसले पर सर्वोच्च मुहर
गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. एस. रामचंद्र राव और न्यायमूर्ति ज्योत्सना रीवाल दुआ की खंडपीठ ने करीब 112 याचिकाओं पर एक साथ गहन सुनवाई करते हुए कर्मचारियों के पक्ष में यह ऐतिहासिक निर्णय दिया था। राज्य सरकार ने करोड़ों रुपये के वित्तीय बोझ और प्रशासनिक संप्रभुता का हवाला देकर इस फैसले को पलटने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। परंतु, शीर्ष अदालत ने सरकार के सभी तर्कों और अपीलों को पूरी तरह अमान्य घोषित करते हुए कर्मचारियों के लोकतांत्रिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा की है।
सचिवालय से लेकर फील्ड तक: इन 3 मोर्चों पर मिलेगा सीधा लाभ
इस फैसले के लागू होते ही अब प्रदेश सरकार को बैक-डेट से वित्तीय लाभ और एरियर जारी करने की प्रक्रिया युद्ध स्तर पर शुरू करनी होगी। विधि विभाग के जानकारों के मुताबिक, इस निर्णय से प्रभावित कर्मियों को तीन बड़े मोर्चों पर सीधी राहत मिलेगी:
वर्तमान में कार्यरत कर्मियों की निर्बाध सेवा: जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी न्यायालय के अंतरिम आदेशों या स्टे के सहारे 58 वर्ष की आयु पार करने के बाद भी वर्तमान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, वे अब बिना किसी प्रशासनिक बाधा के पूरे सम्मान के साथ 60 वर्ष की आयु तक पद पर बने रहेंगे।
जबरन हटाए गए कर्मियों की तुरंत बहाली: जिन क्लास-फोर कर्मचारियों को 58 वर्ष की आयु पूरी होने पर विभाग द्वारा जबरन कार्यमुक्त (रिटायर) कर घर भेज दिया गया था, उन्हें सरकार को तुरंत प्रभाव से नौकरी पर बहाल करना होगा और 60 वर्ष की आयु पूरी होने तक काम का पूरा अवसर देना होगा।
रिटायर हो चुके बुजुर्ग कर्मियों को भारी मुआवजा: जो कर्मचारी इस लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान ही 60 वर्ष की आयु भी पार कर चुके हैं और जिन्हें अब उम्र के कारण वापस नौकरी पर नहीं लिया जा सकता, उन्हें सरकार द्वारा मुआवजे के रूप में 2 वर्ष का पूरा वेतन (पेंशन राशि को समायोजित करके) और सभी बकाया वित्तीय लाभों का एकमुश्त भुगतान करना होगा।
यह फैसला प्रदेश के उन हजारों गरीब और मेहनतकश क्लास-फोर कर्मचारियों के वर्षों के तप, संघर्ष और धैर्य की सबसे बड़ी जीत है, जिन्होंने सचिवालय से लेकर हर सरकारी दफ्तर की नींव को मजबूत रखा है।
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