कर्नाटक में फॉर्म-7 के जरिए जीवित मतदाताओं के नाम हटाने के आवेदन का मामला

​’द हिंदू’ के खुलासे पर ‘पंजाब दस्तक’ के तीखे सवाल: फॉर्म-6 और 7 के ‘यस-नो’ कॉलम में झूठी जानकारी का खेल, खुद के फर्जी दस्तखत करने वाले जालसाजों पर कब कसेगा शिकंजा?

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पंजाब दस्तक – सच की आवाज़, हर खबर आपके साथ
​विशेष रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा (ब्यूरो चीफ, ‘पंजाब दस्तक’)


स्थान: चंडीगढ़ न्यूज़ रूम
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत देश के हर नागरिक का वैध वोट होता है, लेकिन जब इसी चुनावी प्रक्रिया से खिलवाड़ होने लगे, तो यह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला बन जाता है। प्रतिष्ठित अखबार ‘द हिंदू’ ने अपनी एक रिपोर्ट में सनसनीखेज खुलासा किया है कि कर्नाटक में कम से कम 37 ऐसे मतदाता सामने आए हैं, जिन्हें कागजों में ‘मृत’ (Dead) घोषित करने के लिए फॉर्म-7 (Form 7) भर दिया गया, जबकि हकीकत यह है कि वे सभी जिंदा हैं और अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के पूरी तरह योग्य हैं।
​इस गंभीर और चौंकाने वाली खबर के सामने आने के बाद अब ‘पंजाब दस्तक’ ने चुनाव आयोग और पूरी व्यवस्था से सीधे और तीखे सवाल खड़े किए हैं।


​फॉर्म नंबर 6 और 7 का गणित: खुद के फर्जी दस्तखत भी गंभीर अपराध!
​चुनावी नियमों के अनुसार:
​फॉर्म नंबर 6: इसमें मतदाता को अपनी पहचान, पिता का नाम, गांव/पता और यह स्वघोषणा (Declaration) देनी होती है कि मेरा वोट देश में कहीं और नहीं है।
​फॉर्म नंबर 7: इसमें स्पष्ट कॉलम होता है कि व्यक्ति जीवित है या मृत (Yes/No)। इसमें फर्जीवाड़ा करते हुए जिंदा व्यक्ति को कागजों में ‘मृत’ बताकर नाम काटने का आवेदन दे दिया गया।
​बड़ा कानूनी सवाल: यदि किसी व्यक्ति ने स्वयं अपने हाथ से फॉर्म-7 में ‘मृत’ होने का कॉलम भरा और खुद ही अपने फर्जी हस्ताक्षर या अंगूठा लगाया, तो यह कानून की नजर में ‘स्वयं फर्जीवाड़ा’ (Self-Forgery) और जालसाजी का संगीन अपराध है! और यदि किसी दूसरे जालसाज ने किसी जिंदा इंसान के नाम पर उसके फर्जी साइन करके फॉर्म भरा है, तो यह उससे भी बड़ा आपराधिक षड्यंत्र है।


​’पंजाब दस्तक’ के सीधे सवाल – आखिर ये सब कैसे और क्यों हुआ?
​’द हिंदू’ ने पोल खोली, तो प्रशासन क्यों चुप? जब प्रतिष्ठित अखबार ने यह साबित कर दिया कि कर्नाटक में जिंदा लोगों के नाम पर मृत होने के फर्जी फॉर्म भरे गए, तो अब तक इस पर गहरी चुप्पी क्यों साधी गई है?
​किसने भरा फॉर्म-7 और क्यों बोला झूठ? जब संबंधित मतदाता पूरी तरह सुरक्षित और जीवित हैं, तो फिर फॉर्म नंबर 7 में जीवित इंसान को मृत क्यों बताया गया?
​किसने किए फर्जी दस्तखत और अंगूठा? सरकारी दस्तावेजों में फर्जी दस्तखत (Sign) या अंगूठे का निशान (Thumb Impression) लगाने वाला असली मास्टरमाइंड कौन है?
​वोट काटने की क्या थी गंदी साजिश? जब नागरिक जीवित हैं, तो उन्हें मरा हुआ बताकर नाम काटने की अर्जी क्यों दी गई? क्या यह किसी खास चुनाव में वोटों का संतुलन बिगाड़ने और असली मतदाताओं का अधिकार छीनने का कोई बड़ा संगठित षड्यंत्र है?


​दोषियों पर लगनी चाहिए ये सख्त कानूनी धाराएं (FIR & Sections)
​’पंजाब दस्तक’ की दो टूक मांग है कि ऐसी हरकतों से समाज में भ्रम, फर्जीवाड़ा और सनसनी फैलाने वाले असामाजिक तत्वों पर बिना किसी ढील के तुरंत कड़ी से कड़ी कानूनी धाराएं लगाकर FIR दर्ज की जानी चाहिए:
​भारतीय न्याय संहिता (BNS) / IPC की कड़क धाराएं:
​धारा 420 (धोखाधड़ी/Cheating): फर्जी दस्तावेज बनाकर सरकारी तंत्र और आम जनता को गुमराह करने के जुर्म में।
​धारा 467, 468 व 471 (कूटरचना और फर्जी दस्तावेज/Forgery): जाली हस्ताक्षर करने, फर्जी अंगूठे के निशान लगाने और जालसाजी से बने फॉर्म का इस्तेमाल करने के गंभीर आरोप में।
​धारा 177 व 181 (झूठी सूचना देना/False Information): निर्वाचन अधिकारी या सरकारी प्राधिकारी के समक्ष कानूनी रूप से झूठी घोषणा करने पर।
​धारा 120-B (आपराधिक षड्यंत्र/Criminal Conspiracy): लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की सामूहिक साजिश रचने पर।
​जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act, 1950): मतदाता सूची में जानबूझकर हेराफेरी करने और झूठी घोषणाएं (False Declarations) प्रस्तुत करने के लिए कानूनन सख्त सजा और जेल का प्रावधान।


​पंजाब दस्तक की कलम से: कमेंट्स और अपनी राय जरूर दें!
​’द हिंदू’ अखबार द्वारा उजागर किया गया कर्नाटक का यह मामला महज़ एक प्रशासनिक गलती या तकनीकी चूक नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और आम नागरिक के मताधिकार पर किया गया एक गहरा प्रहार है। ‘पंजाब दस्तक’ के दर्शक और आम जनता भी यही पूछ रही है कि आखिर कोई जिंदा इंसान खुद को मृत कैसे घोषित करवा सकता है?


​हमारी स्पष्ट और दो टूक राय यह है:
​लोकतंत्र के मंदिर में सेंध: जो लोग जिंदा होते हुए भी कागजों में खुद को ‘मृत’ घोषित करवाते हैं और ‘फॉर्म-7’ का दुरुपयोग करते हैं, वे केवल कानून का मज़ाक नहीं उड़ा रहे, बल्कि वे समाज के उस भरोसे को तोड़ रहे हैं जो एक वोटर को उसकी सबसे बड़ी ताकत देता है।
​मास्टरमाइंड का बेनकाब होना जरूरी: इसके पीछे साफ तौर पर किसी बड़े राजनीतिक षड्यंत्र, रंजिश या सोची-समझी जालसाजी की बू आ रही है। यह जांच का विषय है कि इन मामलों के पीछे असली गुनहगार कौन है।


​चुनाव आयोग सख्त एक्शन ले: चुनाव आयोग और देश की कानून-व्यवस्था को इस मामले में तुरंत सख्त से सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
​कड़े कानूनी शिकंजे की दरकार: इस तरह के फर्जीवाड़े में शामिल एक-एक शख्स पर BNS और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की सबसे सख्त धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज होने चाहिए।


​दर्शकों के लिए संदेश: इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या खुद झूठे दस्तखत करने वालों और फर्जी फॉर्म भरने वालों पर तुरंत जेल की सजा होनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें!


​देखते रहें ‘पंजाब दस्तक’ – सच की आवाज़, हर खबर आपके साथ!
(ब्यूरो रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा, चंडीगढ़ न्यूज़ रूम)

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