किन्नौर का कड़छम वांगतू हाइड्रो प्रोजेक्ट और हिमाचल की रॉयल्टी का मुद्दा

कड़छम वांगतू की 1091 मेगावाट क्षमता से रोजाना करोड़ों की कमाई: 4560 गीगावाट आवर बिजली उत्पादन के बाद भी हिमाचल को सिर्फ 12% रॉयल्टी, 18% के लिए सुप्रीम कोर्ट में घसीटे जा रहे पहाड़ के हक

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​सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ | पंजाब दस्तक, शिमला
​किन्नौर स्थित 1091 मेगावाट क्षमता वाला कड़छम वांगतू हाइड्रो प्रोजेक्ट ऊर्जा उत्पादक कंपनियों के लिए भारी मुनाफे का जरिया बना हुआ है। यह विशालकाय परियोजना सालाना औसतन 4560 गीगावाट आवर (GWh यानी 456 करोड़ यूनिट) बिजली का उत्पादन करती है। इस भारी उत्पादन से प्रोजेक्ट संचालक रोजाना करोड़ों रुपये का राजस्व और सालाना भारी शुद्ध मुनाफा (प्रॉफिट आफ्टर टैक्स) कमा रहे हैं, लेकिन जिस धरती पर यह प्रोजेक्ट स्थापित है, उस हिमाचल प्रदेश को महज 12% की सीमित रॉयल्टी से संतोष करने पर मजबूर किया जा रहा है।


​कड़छम वांगतू का वित्तीय गणित और हिमाचल के अधिकारों की अनदेखी:
​सालाना 4560 मिलियन यूनिट उत्पादन और 150 करोड़ का हक: 1091 मेगावाट की स्थापित क्षमता से हर साल अरबों यूनिट बिजली पैदा की जा रही है। तय नियमों के अनुसार रॉयल्टी को 12% से बढ़ाकर 18% करने पर हिमाचल को सालाना 150 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त राजस्व मिलना चाहिए, लेकिन इस जायज हक को दबाने के लिए कानूनी दांवपेच चलाए जा रहे हैं।


​रॉयल्टी 18% करने की बात पर सुप्रीम कोर्ट की राह: ऊर्जा कंपनियां अपनी पूंजीगत लागत की वसूली के बाद सालाना भारी मुनाफा अपनी झोली में डाल रही हैं, परंतु जैसे ही राज्य सरकार 12% की जगह 18% या 30% रॉयल्टी का दावा ठोकती है, निजी पावर लॉबी तुरंत सुप्रीम कोर्ट का रुख कर लेती है।


​189 प्रोजेक्ट्स और 25,000 हेक्टेयर जमीन का दोहन: हिमाचल में संचालित 189 से अधिक परियोजनाओं के लिए 25 हजार हेक्टेयर से ज्यादा भूमि अधिग्रहित की गई है। इसके बावजूद BBMB के 4,600 करोड़ रुपये के बकाए से लेकर कड़छम वांगतू जैसे प्रोजेक्ट्स के राजस्व तक, राज्य को हर पाई के लिए शीर्ष अदालत में संघर्ष करना पड़ रहा है।


​सियासी बयानबाजी बनाम हिमाचल के स्थायी आर्थिक हित
​जब भी हिमाचल के इन ठोस वित्तीय अधिकारों और जल संपदा की रॉयल्टी का सवाल उठता है, तो चर्चा को अक्सर 1500 रुपये महिला सम्मान निधि या मुफ्त बिजली के चुनावी वादों की बहस में भटका दिया जाता है। राजनीतिक वादों की अपनी जगह है, लेकिन कड़छम वांगतू जैसे प्रोजेक्ट्स से मिलने वाली 18% से 30% रॉयल्टी और अरबों का वैध राजस्व सीधे हिमाचल के खजाने को आत्मनिर्भर बना सकता है।


​इसके साथ ही, अत्यधिक सुरंग निर्माण के चलते किन्नौर व लाहौल-स्पीति जैसे संवेदनशील इलाकों में बढ़ रहे भूस्खलन और नेपाल जैसी हालिया आपदाओं के खतरों को देखते हुए स्थानीय युवाओं को रोजगार और पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है।


​’प्राकृतिक संपदा पर पहला अधिकार हिमाचल की जनता का’
​मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा हर मंच पर कड़छम वांगतू और अन्य हाइड्रो प्रोजेक्ट्स से जुड़ी रॉयल्टी का मुद्दा उठाना यह स्पष्ट करता है कि प्रदेश अब अपनी संपदा के एकतरफा दोहन पर चुप नहीं बैठेगा। 1091 मेगावाट के इस विशाल प्रोजेक्ट से होने वाली कमाई में हिमाचल का 18% रॉयल्टी का दावा पूरी तरह तर्कसंगत और कानूनी रूप से मजबूत है, जिसे हासिल करने के लिए प्रदेश की यह लड़ाई जारी रहेगी।


​पंजाब दस्तक की विशेष अपील:
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