मंडी दिशा बैठक में सांसद कंगना रनौत अफसरों से विकास कार्यों की समीक्षा करती हुईं

ग्राउंड रिपोर्ट: मंडी दिशा बैठक में गरजीं कंगना रनौत, अफसरशाही की लगाई क्लास; सांसद निधि के आंकड़ों ने खोली सुस्त सिस्टम की पोल

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​मंडी (पंजाब दस्तक ब्यूरो / वरिष्ठ पत्रकार ओमांश):
मंडी उपायुक्त कार्यालय के सभागार में आयोजित ‘दिशा’ समिति की समीक्षा बैठक उस समय पूरी तरह गरमा गई, जब स्थानीय सांसद कंगना रनौत का बेहद तल्ख और आक्रामक अंदाज सामने आया। विकास कार्यों में बरती जा रही ढिलाई और सांसद निधि (MPLAD) के उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC) जमा न होने को लेकर सांसद ने प्रशासनिक अधिकारियों को जमकर लताड़ लगाई। सभागार में मौजूद अमले पर सांसद की नाराजगी इस कदर हावी रही कि अफसरों के पास उनके तीखे सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं था।


​बैठक में बीडीओ की खिंचाई: “पैसा दबाकर बैठे लोग तुरंत करें हिसाब चुकता”
​समीक्षा के दौरान सांसद ने सीधे विकास खंड अधिकारियों (BDOs) को खड़ा कर प्रगति रिपोर्ट तलब की। उन्होंने स्पष्ट लहजे में याद दिलाया कि पूर्व बैठक में भी यही निर्देश दिए गए थे, लेकिन महीनों बाद भी जमीनी हालात जस के तस हैं। संसद और केंद्र सरकार की ओर से लगातार खर्च का ब्यौरा मांगा जा रहा है ताकि आगे की किस्तें जारी हो सकें, मगर सुस्त रवैये ने विकास की रफ्तार थाम रखी है।


​सांसद ने चेतावनी भरे शब्दों में कहा कि कई जगहों पर मंजूरशुदा राशि पर कुंडली मारकर फाइलें दबा दी गई हैं। न निर्माण कार्य समय पर निपट रहे हैं और न ही उनके यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट पोर्टल पर दर्ज हो रहे हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि विकास का पैसा दबाकर बैठने वाले तुरंत प्रभाव से राशि वापस करें, लापरवाही किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।


​”मंडी पर पूरे देश की निगाहें, जनता के सवालों का क्या दूं जवाब?”
​अपनी तीखी नाराजगी का कारण स्पष्ट करते हुए सांसद ने कहा कि मंडी लोकसभा क्षेत्र हमेशा राष्ट्रीय विमर्श और मीडिया के केंद्र में रहता है। ऐसे में विकास की कछुआ चाल को लेकर सीधे उनसे सवाल पूछे जाते हैं। जब केंद्र से जनता के हित के लिए बजट आ चुका है, तो वह धरातल पर नजर क्यों नहीं आ रहा?


​पोर्टल के आंकड़ों की पड़ताल: बजट भारी, लेकिन फाइलों में सिमटी रफ्तार
​एंपावर इंडिया पोर्टल पर उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़ों की पड़ताल करें तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। सांसद कंगना रनौत की बैठकों में उपस्थिति का रिकॉर्ड 90 फीसदी के मजबूत स्तर पर है, लेकिन धरातल पर काम की रफ्तार सवालों के घेरे में है:
​आवंटित बजट और खर्च: 9 जून 2024 से अब तक कुल 14 करोड़ 70 लाख रुपये का आवंटन हुआ। फंड यूटिलाइजेशन करीब 64 प्रतिशत दर्ज है और खर्च का आंकड़ा 9 करोड़ 42 लाख 43 हजार 903 रुपये बताया गया है, जबकि रिकॉर्डेड एक्सपेंडिचर लगभग 5 करोड़ 69 लाख 86 हजार 9 रुपये है।


​मंजूर बनाम मुकम्मल काम: सांसद ने कुल 316 विकास कार्यों की अनुशंसा की थी, जिनमें से अब तक महज 73 प्रोजेक्ट्स ही पूरे घोषित हुए हैं।
​अधूरे कार्यों पर भुगतान: लगभग 73 मुकम्मल कार्यों पर करीब 1 करोड़ 90 लाख रुपये व्यय हुए हैं, जबकि करीब 7 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC) सिस्टम में लटके हैं। पोर्टल यह भी दर्शाता है कि करीब 3 करोड़ 80 लाख रुपये उन कार्यों के लिए जारी किए जा चुके हैं जो कागजों पर अब तक अधूरे हैं।


​विभिन्न क्षेत्रों में जारी बजट का विवरण
​सांसद निधि का नियम है कि राशि सांसद के खाते में नहीं, बल्कि जिला प्रशासन (डीसी दफ्तर) के जरिए कार्यदायी एजेंसियों तक जाती है:
​चौंतड़ा ब्लॉक में सामुदायिक भवन व पार्क विकास हेतु 2,27,013 रुपये का प्रावधान।
​डीसी मंडी के मार्फत ग्राम पंचायत गलू बहला और रोक बड़ी में संपर्क मार्गों के लिए 1-1 लाख रुपये का बजट।
​बल्ह, सुंदरनगर, जोगिंदर नगर और जंजैली क्षेत्र में 1 से 2 लाख रुपये के स्थानीय बुनियादी ढांचे के काम।
​संसदीय सीमा से जुड़े चुराग और करसोग के क्षेत्रों में ग्राम सुधार कमेटी नारायण के सामुदायिक भवन निर्माण के लिए डीसी शिमला के जरिए 3 लाख रुपये का भुगतान।


​पड़ोसी सीट हमीरपुर से तुलना: आंकड़ों का गणित
​पोर्टल के तुलनात्मक आंकड़ों से यह भी साफ होता है कि यह समस्या केवल एक क्षेत्र की नहीं है। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद अनुराग सिंह ठाकुर के आंकड़ों पर गौर करें तो:
​कुल आवंटन: 15 करोड़ रुपये।
​फंड यूटिलाइजेशन: केवल 22 प्रतिशत।
​कार्यों की स्थिति: 205 अनुशंसित कार्यों में से सिर्फ 46 ही पूरे हो सके हैं।


​मंडी में फंड यूटिलाइजेशन 64 फीसदी होने के बावजूद, 316 प्रोजेक्ट्स में से केवल 73 का पूरा होना और प्रमाण पत्रों का पोर्टल पर अपलोड न होना ही सांसद के आक्रोश की मुख्य वजह बना। जब प्रशासनिक मशीनरी बार-बार दिए निर्देशों को नजरअंदाज करती है, तो जनप्रतिनिधियों का सख्त रुख अपनाना स्वाभाविक है। अब देखना यह होगा कि इस कड़े रुख के बाद विकास कार्य कितनी तेजी से पटरी पर लौटते हैं।


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