वरिष्ठ पत्रकार मीनाक्षी, पंजाब दस्तक
शिमला। आर्थिक संकट और खाली खजाने की दुहाई देकर हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य में बंद पड़ी लॉटरी व्यवस्था को दोबारा जिंदा करने का पूरा ताना-बाना बुन लिया है। नियमों की अधिसूचना, राज्यपाल की मुहर और वित्त विभाग के लॉटरी निदेशालय द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर ई-टेंडर जारी होने के बाद अब सरकार सालाना ₹100 करोड़ की कमाई के सपने देख रही है। लेकिन इस कथित ‘राजस्व मॉडल’ के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जिसने देवभूमि के शांत वातावरण में एक बड़े सामाजिक तूफान की आशंका खड़ी कर दी है।
अतीत का जख्म: पूर्व सरकारों ने क्यों लगाया था कड़ा बैन?
हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्रियों ने जब लॉटरी पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया था, तो वह कोई जल्दबाजी में लिया गया फैसला नहीं था। वह फैसला था उन हजारों उजड़े हुए परिवारों की चीखों को सुनकर लिया गया, जिनकी जिंदगी लॉटरी के टिकटों की भेंट चढ़ गई थी। लोग पाई-पाई के मोहताज होकर सड़कों पर आ गए थे, हंसते-खेलते घर नीलाम हो गए थे। अब सवाल यह उठता है कि क्या इतिहास की उसी भयानक भूल को दोहराना ही व्यवस्था परिवर्तन है?
लॉटरी का चक्रव्यूह और बर्बादी की जमीन:
मेहनत की गाढ़ी कमाई पर जुआ: दिहाड़ीदार, मजदूर और कम वेतन पाने वाला तबका रातों-रात अमीर बनने और अपनी किस्मत चमकाने के झांसे में आकर पूरे महीने का राशन और बच्चों की स्कूल फीस लॉटरी के टिकटों में फूंक देता है।
अंधविश्वास का बाजार और ‘लकी नंबर’ का ढोंग: लॉटरी की लत लगते ही लोग काम-धंधा छोड़कर तांत्रिकों, बाबाओं और कथित महात्माओं के डेरों पर ‘लकी नंबर’ की पर्चियां तलाशने में वक्त और पैसा बर्बाद करने लगते हैं।
हार, डिप्रेशन और नशे की दलदल: जब लॉटरी का जैकपॉट नहीं लगता और जेबें खाली हो जाती हैं, तो इंसान भारी मानसिक तनाव और हताशा में डूब जाता है। इस गम को भुलाने के लिए शराब और नशे का सहारा लिया जाता है, जिससे घरों में रोज-रोज के झगड़े, घरेलू हिंसा और भुखमरी पैर पसारती है।
कर्ज का अंतहीन जाल: ‘अगली बार पक्का लॉटरी निकलेगी’ की अंधी दौड़ लोगों को भारी ब्याज वाले कर्जों में धकेल देती है, जिसका अंत अक्सर पारिवारिक त्रासदियों और बिखरते रिश्तों के रूप में होता है।
पंजाब दस्तक का सीधा सवाल: क्या गरीबों की जेब काटना ही एकमात्र विकल्प है?
सरकार का काम जनता को सुरक्षा, रोजगार और खुशहाली देना है, न कि उन्हें जुए और लॉटरी जैसी बर्बादी के रास्ते पर धकेल कर अपने खजाने भरना। अगर सरकार को राजस्व ही जुटाना है, तो पर्यटन, जलविद्युत, स्थानीय उद्योग और प्राकृतिक संसाधनों के पारदर्शी दोहन जैसे अनगिनत रास्ते मौजूद हैं। एक दरियादिल और जनहितैषी सरकार को ऐसे रास्ते तलाशने चाहिए, न कि गरीब परिवारों के चूल्हे बुझाकर ₹100 करोड़ जुटाने की जिद पर अड़े रहना चाहिए।
जनता की अदालत: आपकी क्या राय है?
क्या हिमाचल सरकार का लॉटरी शुरू करने का यह फैसला सही है? क्या चंद रुपयों के राजस्व के लिए प्रदेश के युवाओं और परिवारों को इस दलदल में झोंकना उचित है या सरकार को तुरंत यह निर्णय वापस लेना चाहिए?
अपनी बेबाक राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर दर्ज करें।
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