हिमाचल सरकार के 400 करोड़ रुपये के कर्ज और डीए घोषणा से जुड़ी खबर

एक हाथ से डीए का छलावा, दूसरे से 400 करोड़ का कर्ज; जनता के तीखे सवाल— आखिर कब थमेगी मंत्रियों के शाही काफिलों और फिजूलखर्ची की बहार?

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​सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
​शिमला:

हिमाचल प्रदेश में सरकार की वित्तीय नीतियों और ताबड़तोड़ कर्ज लेने की फितरत को लेकर अब जनता का सब्र जवाब देने लगा है। एक तरफ सरकार कर्मचारियों और पेंशनर्स को 5 फीसदी डीए (महंगाई भत्ता) का झुनझुना थमाकर अपनी पीठ थपथपा रही है, तो वहीं ठीक उसी दिन 400 करोड़ रुपये का एक और भारी-भरकम कर्ज उठाने की अधिसूचना जारी कर दी गई है। राज्य का खजाना पहले से ही खाली है और प्रदेश कर्ज के दलदल में धंसता जा रहा है, ऐसे में जनता सीधे तौर पर व्यवस्था और हुक्मरानों से कड़े सवाल पूछ रही है।


​कर्ज का कच्चा चिट्ठा और आंकड़ों की मार:
​डीए की घोषणा के साथ ही लोन का धमाका:

शुक्रवार को जैसे ही मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए डीए का ऐलान किया, ठीक उसी दिन वित्त विभाग ने 400 करोड़ का नया लोन लेने का फरमान भी जारी कर दिया। यानी एक हाथ से राहत दी और दूसरे हाथ से जनता पर कर्ज का नया पहाड़ लाद दिया।
​करोड़ों का सालाना ब्याज का बोझ:
इस 400 करोड़ के नए कर्ज पर सरकार को 7.77% सालाना की दर से ब्याज चुकाना होगा। इस हिसाब से केवल ब्याज के रूप में ही हर साल 31 करोड़ 8 लाख रुपये से ज्यादा की राशि जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से चुकानी पड़ेगी।


​आरबीआई में बॉन्ड की नीलामी:
वित्त सचिव देवेश कुमार के अनुसार, 400 करोड़ रुपये के इन सरकारी बॉन्डों की नीलामी 23 अक्टूबर को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के कार्यालय में तय की गई है।


​23 साल की लंबी देनदारी:
यह लोन कुल 23 साल की लंबी अवधि के लिए लिया गया है, जिसे 24 जून 2049 तक चुकाना होगा। इसका ब्याज हर साल दो किस्तों में—24 जून और 24 दिसंबर को नियमित रूप से भरना पड़ेगा।


​जनता के तीखे सवाल: क्या लोन के सहारे ही चलेगी सरकार, या बंद होगी मंत्रियों की अय्याशी?
​प्रदेश की वित्तीय बदहाली और अंधाधुंध कर्ज लेने के इस खेल पर अब हर तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। जनता और प्रबुद्ध वर्ग सरकार के सामने कुछ चुभते हुए सवाल खड़े कर रहा है:


​मंत्रियों और अफसरों के शाही काफिले कब होंगे कम?
जनता पूछ रही है कि क्या मंत्रियों के दौरों पर चलने वाली स्कॉटी, पायलट और गाड़ियों के बड़े-बड़े काफिलों पर कुछ दिनों के लिए रोक नहीं लग सकती? क्या वीआईपी कल्चर और शाही खर्चों को कम करने की कोई इच्छाशक्ति सरकार के पास बची है या नहीं?
​एक मंत्री, कई विभाग और अलग-अलग गाड़ियां — इस फिजूलखर्ची पर ब्रेक क्यों नहीं?
सचिवालय गलियारों में चर्चा है कि जिन मंत्रियों और सचिवों के पास दो-तीन विभाग हैं, वे हर विभाग से अलग गाड़ियां और अमला इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या इस तरह की महा-फिजूलखर्ची को तुरंत खत्म नहीं किया जाना चाहिए?


​क्या अधिकारी और विभाग सरकार को सुझाव नहीं दे सकते?
जनता का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रदेश में बैठे बड़े-बड़े आईएएस, वित्त सचिव और विभागाध्यक्ष (Head of Department) इतनी क्षमता भी नहीं रखते कि वे बैठकर कोई ऐसी बैठक करें, जिससे सरकार के खर्चों को कम करने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना तैयार हो सके? क्या सरकार को आर्थिक संकट से उबारने के लिए अधिकारियों की तरफ से कोई व्यावहारिक सुझाव नहीं आ सकते?
​प्रदेश की जनता अब दो टूक कह रही है कि केवल लोन के सहारे सरकार चलाने का यह सिलसिला अब और नहीं चलना चाहिए। यदि वित्तीय सेहत सुधारनी है, तो सबसे पहले शासन-प्रशासन स्तर पर मंत्रियों के शाही खर्चों और अनावश्यक फिजूलखर्ची पर ताला लगाना होगा।
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देखते रहें — पंजाब दस्तक (सच की आवाज़)!
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