हिमाचल अनुबंध कर्मचारियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला

पंजाब दस्तक एक्सक्लूसिव: कर्मचारियों के हक में सुप्रीम कोर्ट का सबसे बड़ा फैसला, असंवैधानिक कानून रद्द, सरकार को 4 महीने की मोहलत!

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​विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ (पंजाब दस्तक)
​पंजाब दस्तक बिग ब्रेकिंग:

​कानून को पूरी तरह से नकारा: अनुबंध कर्मचारियों की पीठ में छुरा घोंपने के लिए लाए गए कानून (अधिनियम 23/2025) पर सुप्रीम कोर्ट की अंतिम मुहर—हाई कोर्ट का फैसला रहेगा पूरी तरह बरकरार।
​समय सीमा तय: प्रदेश सरकार की एसएलपी (SLP) खारिज, एडवोकेट जनरल की गुहार पर अदालती आदेश लागू करने के लिए मिला 4 महीने का समय।
​सवा लाख से ज्यादा परिवारों में खुशी की लहर: 2003 के बाद भर्ती हुए करीब 1.35 लाख कर्मचारियों के लिए न्याय का रास्ता पूरी तरह साफ।


​सर्वोच्च अदालत का कड़ा संदेश—नहीं चलेगा कर्मचारियों का शोषण!
​शिमला / नई दिल्ली (पंजाब दस्तक ब्यूरो):
हिमाचल प्रदेश के लाखों कर्मचारियों के अधिकारों पर डाका डालने की सरकारी कोशिशों पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने पानी फेर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) को सिरे से खारिज करते हुए साफ कह दिया है कि वह हिमाचल हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में रत्ती भर भी दखल नहीं देगा।


​अदालत में जब राज्य सरकार के एडवोकेट जनरल ने हाथ जोड़कर फैसले पर अमल के लिए मोहलत मांगी, तो सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार को कागजी और वित्तीय औपचारिकताएं पूरी करने के लिए आज से ठीक 4 महीने की समय सीमा तय कर दी है।


​क्या था सरकार का वो ‘काला कानून’?
​पंजाब दस्तक की पड़ताल के अनुसार, पूर्व के अदालती फैसलों से बचने और कर्मचारियों के वित्तीय हक मारने के लिए सरकार ने दिसंबर 2024 में ‘हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी भर्ती और सेवा शर्तें अधिनियम’ पास कराया था, जिसे 7 फरवरी 2025 को राजभवन से मंजूरी दिलवाई गई थी।


​सरकार की नीयत यह थी कि इस कानून को पिछली तारीखों (Backdate) से लागू करके अनुबंध और तदर्थ कर्मचारियों को सरकारी सेवाओं के दायरे से ही बाहर कर दिया जाए—ताकि उन्हें मिलने वाले एरियर, वरिष्ठता और पेंशन के लाभ वापस छीने जा सकें। लेकिन देवेंदर कुमार और उनके साथी कर्मचारियों ने इस तानाशाही फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।


​25 अप्रैल 2026: हाई कोर्ट का वो ऐतिहासिक प्रहार
​हिमाचल हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रोमेश वर्मा की डबल बेंच ने 260 से अधिक याचिकाओं पर ऐतिहासिक सुनवाई करते हुए 25 अप्रैल 2026 को सरकार के इस कानून को ‘अवैध, असंवैधानिक और शून्य’ करार दिया था। तब हाई कोर्ट ने 3 महीने में सारा बकाया चुकाने को कहा था, जिस पर स्टे लेने सरकार सुप्रीम कोर्ट भागी थी—पर वहां भी मुंह की खानी पड़ी।


​अब आगे क्या? 1.35 लाख कर्मचारियों की नजरें
​शीला देवी, ताज मोहम्मद और लेखराम केस के नजीर (Precedents) ने पहले ही साफ कर दिया है कि अगर भर्ती तय नियमों से हुई है, तो अनुबंध काल को हर हाल में पेंशन और सीनियरिटी के लिए गिना जाएगा।
​12,000 लड़ाके कोर्ट में थे: इस हक की लड़ाई के लिए 12,000 कर्मचारी सीधे अदालत पहुंचे थे।
​पंजाब दस्तक का बड़ा सवाल: अब सबसे बड़ा असमंजस यह है कि क्या यह वित्तीय लाभ केवल कोर्ट जाने वाले कर्मचारियों को ही मिलेगा, या सरकार पूरे 1.35 लाख कर्मचारियों को बिना नए केस किए यह हक देगी?


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