शिमला/हमीरपुर (सुरेंद्र राणा – ब्यूरो चीफ पंजाब दस्तक, चंडीगढ़ न्यूज़ रूम):
हिमाचल प्रदेश की राजनीति में इस समय ऐसा सियासी भूचाल आया हुआ है, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के दिग्गजों की नींद उड़ा दी है। हालांकि आगामी विधानसभा चुनावों में लगभग एक ही वर्ष का समय शेष बचा है और 5-6 महीने तो देखते ही देखते निकल जाएंगे, लेकिन सूबे में राजनीतिक सरगर्मियां अभी से चरम पर पहुंच चुकी हैं। राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले देश के गृह मंत्री अमित शाह के कड़े और सीधे निर्देशों पर दिल्ली की एक प्राइवेट एजेंसी पिछले दो महीनों से प्रदेश की सभी 68 विधानसभा सीटों पर एक कड़ा और गोपनीय ‘सीक्रेट सर्वे’ चला रही है।
55 से ज्यादा सीटों पर सर्वे पूरा, 30-31 अक्टूबर को फाइनल रिपोर्ट
पंजाब दस्तक को मिली अंदरूनी और बेहद पुख्ता जानकारी के मुताबिक, दिल्ली से आई एजेंसी का पहला चरण अब समाप्ति की ओर है। एजेंसी अब तक राज्य की 54 से 55 से ज्यादा विधानसभा सीटों का सर्वे पूरा कर चुकी है। इस पहले चरण में हर सीट से संभावित दावेदारों, उनकी स्थानीय पकड़ और जनाधार पर गोपनीय फीडबैक जुटाया गया है। इस सर्वे की फाइनल रिपोर्ट 30 या 31 अक्टूबर तक पार्टी हाईकमान (गृह मंत्री अमित शाह) को सौंप दी जाएगी।
14-15 नवंबर के बाद शुरू होगा ‘विनेबिलिटी’ टेस्ट: क्या फिर कटेंगे बड़े दिग्गजों के टिकट?
सूत्रों का कहना है कि 31 अक्टूबर को रिपोर्ट मिलने के बाद, 14 से 15 नवंबर के बीच सर्वे का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू होगा।
क्या पूछा जाएगा?: इस दूसरे चरण में केवल और केवल एक ही सवाल पर फोकस रहेगा— ‘विनेबिलिटी’ (जीत की असली क्षमता)। यानी, यदि आज की तारीख में चुनाव करवा दिए जाएं और किसी प्रत्याशी को खड़ा कर दिया जाए, तो क्या वह अपनी सीट निकालकर पार्टी की झोली में डाल सकता है?
पुराने विधायकों को सीधी चेतावनी: भाजपा का इतिहास रहा है कि पुराना जीता हुआ विधायक या दिग्गज नेता यह न समझे कि अगली बार भी टिकट उसकी जेब में है। पार्टी बिना किसी हिचकिचाहट के जीते हुए प्रत्याशियों का पत्ता काटकर नए चेहरों पर दांव खेलती है। करसोग सीट इसका जीवंत उदाहरण है, जहाँ पिछली बार जीते हुए प्रत्याशी (हीरालाल जी) का टिकट काटकर नए चेहरे (दीपराज जी) को मैदान में उतारा गया और उन्होंने जीत दर्ज की। सूत्रों का दावा है कि इस गुप्त सर्वे के बाद कई बड़े-बड़े नेताओं और वर्तमान विधायकों के टिकट कटने की पूरी-पूरी संभावना है।
पत्रकारों को आए सीक्रेट कॉल: जब पूछा गया—”राणा जी क्या हाल है?”
इस सर्वे की गोपनीयता का आलम यह था कि इसकी भनक स्थानीय स्तर के बड़े नेताओं तक को नहीं थी, ताकि कोई इस प्रक्रिया पर अपना प्रभाव न डाल सके। एजेंसी ने निष्पक्ष राय जानने के लिए धरातल पर डटे पत्रकारों और विश्लेषकों तक से फोन पर सीधे सवाल पूछे।
जब हमारे ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा को एजेंसी का कॉल आया, तो माहौल काफी दोस्ताना था। एजेंसी ने पूछा— “राणा जी, क्या हाल है? आजकल कहाँ हैं?” जब बताया गया कि वे चंडीगढ़ में हैं, तो उन्होंने कहा कि हम आपकी खबरें लगातार पढ़ते रहते हैं—चाहे हमीरपुर हो, बड़सर हो या सुजानपुर।
इस पर हल्के-फुल्के अंदाज में कहा गया— “यह टिकट मुझे ही दे दो!” लेकिन इसके बाद एजेंसी ने हमीरपुर, बड़सर, सुजानपुर समेत पूरे जिले के समीकरणों और नेताओं के रिपोर्ट कार्ड पर सिलसिलेवार तीखे सवाल पूछे। पत्रकारों से लेकर आम जनता और पंचायत-जिला परिषद स्तर के जनप्रतिनिधियों से राय ली जा रही है, जिससे नेताओं के पसीने छूट रहे हैं।
कांग्रेस की ‘दिल्ली दरबार’ संस्कृति बनाम भाजपा का अनुशासित ‘पर्ची सिस्टम’
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू अक्सर अपने बयानों में कहते हैं कि भाजपा कई गुटों में बंटी हुई है। लेकिन पंजाब दस्तक के राजनीतिक विश्लेषण के मुताबिक, हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है:
कांग्रेस का हाल: कांग्रेस में टिकट के लिए दिल्ली में नेताओं की लंबी कतारें लगती हैं, मारामारी होती है और टिकट न मिलने पर पार्टी में भारी कलह और गुटबाज़ी देखने को मिलती है—जिसे कांग्रेस नेता ‘पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र’ कहकर टालते हैं।
भाजपा का अनुशासन: भाजपा में न तो कोई गुट काम करता है और न ही सिफारिश। यहाँ सब कुछ दिल्ली केंद्रित है। भाजपा के नेता दिल्ली के चक्कर बहुत कम लगाते हैं। चुनाव जीतने के बाद जब 35-36 से ज्यादा विधायक जीतकर आते हैं, तो दिल्ली से केंद्रीय पर्यवेक्षक (Observers) आते हैं और ‘पर्ची’ निकलती है कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा। राजस्थान (भजनलाल शर्मा) और हरियाणा (नायब सिंह सैनी) के उदाहरण सबके सामने हैं, जहाँ किसी को कानों-कान खबर नहीं थी और नए चेहरों को मुख्यमंत्री बना दिया गया। भाजपा में जिसे टिकट मिल गई, बाकी तमाम नेताओं को अपना अहम छोड़कर चुपचाप उस उम्मीदवार के पीछे चलना ही पड़ता है।
कांग्रेस छोड़ आए दिग्गजों, पंचायतों और जिला परिषद चुनाव के समीकरण पर भी नजर
फरवरी 2024 में राज्यसभा चुनाव के दौरान हर्ष महाजन के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर भाजपा में शामिल हुए पूर्व कांग्रेस विधायकों (जैसे धर्मशाला से सुधीर शर्मा, बड़सर से इंद्रदत्त लखनपाल, देवेंद्र सिंह भुट्टो आदि) और निर्दलीय नेताओं की मैदानी सक्रियता पर भी इस सर्वे की पैनी नजर है। ये नेता आज भाजपा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मैदान में उतरे हुए हैं।
इसके अलावा हाल ही में संपन्न हुए पंचायत और जिला परिषद चुनावों में किस पार्टी और किस संभावित प्रत्याशी का प्रभाव ज्यादा रहा, उसका पूरा लेखा-जोखा भी इस रिपोर्ट में जोड़ा जा रहा है।
गृह मंत्री के आदेश से लाहौल-स्पीति से लेकर मंडी तक नेता मैदान में
गृह मंत्री अमित शाह के कड़े निर्देशों के बाद भाजपा के सभी छोटे-बड़े नेता और कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों में पूरी तरह फील्ड में उतर चुके हैं। चाहे वह ट्राइबल क्षेत्र लाहौल-स्पीति हो, दुर्गम चंबा हो, हमीरपुर हो या सियासी केंद्र मंडी—हर जगह राजनीतिक तापमान गरमा गया है।
हमारा मानना सीधा और निष्पक्ष है—हम किसी राजनीतिक दल (बीजेपी, कांग्रेस या आप) के नहीं हैं, हम तो सीधे जनता और पंजाब दस्तक से जुड़े हैं। जो सरकार गरीब जनता की सेवा करे, महंगाई कम करे, बेरोजगारी दूर करे और लोगों के अधिकारों के लिए लड़े, वही जनता के भरोसे पर खरी उतरेगी!
पंजाब दस्तक – सच की आवाज़
आपका अपना चैनल—लाइक करें, शेयर करें और देखते रहें पंजाब दस्तक!
