पंजाब दस्तक
ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा की विशेष रिपोर्ट
हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान और कृषि उत्कृष्टता के नाम आज एक और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज हो गई है। प्रदेश के 8 नए पारंपरिक उत्पादों को प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication – GI) टैग मिल गया है। इन नए उत्पादों के शामिल होने के साथ ही अब हिमाचल प्रदेश के कुल 17 पारंपरिक उत्पाद जीआई रजिस्ट्री में पंजीकृत हो चुके हैं।
राज्य सरकार ने इसे प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक बेहद अहम और बड़ा कदम बताया है। यह ऐतिहासिक सफलता हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद (HIMCOSTE) के निरंतर प्रयासों के चलते हासिल हुई है। इस गौरवपूर्ण अवसर पर संस्थान की निदेशक डॉक्टर रूपाली ठाकुर तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के सदस्य सचिव डॉक्टर सुरेश अत्री भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।
देश-दुनिया में क्यों खास हैं हिमाचल के ये उत्पाद?
हिमाचल प्रदेश के जिन 8 सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और कृषि महत्व वाले उत्पादों को जीआई टैग से नवाजा गया है, उनकी अपनी एक ऐतिहासिक और अनूठी कहानी है:
मंडी की सेपू बड़ी (मंडयाली धाम की जान): मंडी की सेपू बड़ी देश-विदेश में काफी प्रसिद्ध है। सदियों से इसे पारंपरिक ‘मंडयाली धाम’ (शाही भोज) में मुख्य व्यंजन के रूप में परोसा जाता है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सेपू बड़ी को बेहद पसंद करते हैं और अक्सर हिमाचल दौरे के दौरान अपने भाषणों में इसका जिक्र करना नहीं भूलते।
सिरमौरी लोहिया (डॉ. वाई.एस. परमार की पसंद): सिरमौर का यह पारंपरिक ऊनी परिधान पूरे प्रदेश की शान है। हिमाचल प्रदेश के निर्माता और पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर यशवंत सिंह परमार भी विशेष तौर पर सिरमौरी लोहिया पहनते थे।
चंबा मेटल आर्ट/थाल और सफेद मक्की: चंबा में मेटल थाल (धातु शिल्प) का चलन राजा-महाराजाओं के समय से है, जो आज भी वहां की अनूठी कला को दर्शाता है। इसके अलावा चंबा की सफेद मक्की भी अपने खास स्वाद के लिए जानी जाती है।
किनौरी टोपी, सेब और आभूषण: किन्नौर की पारंपरिक टोपी और वहां के रसीले सेब दुनिया भर में चर्चित हैं। वहीं, किन्नौरी महिलाओं के चांदी के पारंपरिक आभूषण भी हमेशा आकर्षण का केंद्र रहते हैं, जिन्हें महिलाएं शादियों और विशेष त्योहारों में बड़े चाव से पहनती हैं।
स्पीति का सीबकथॉर्न (छरमा): यह औषधीय गुणों से भरपूर एक बेशकीमती जंगली बेरी है।
सोलनी सफेद मक्का: यह अपने विशिष्ट स्वाद और पारंपरिक कृषि महत्व के लिए पहचानी जाती है।
जानिए, क्या होता है जीआई (GI) टैग और क्यों है यह जरूरी?
भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication): जीआई टैग मुख्य रूप से किसी भी उत्पाद को दिया जाने वाला एक विशेष नाम, कानूनी प्रमाण या ट्रेडमार्क होता है। यह उस उत्पाद की विशिष्ट उत्पत्ति, गुणवत्ता और प्रामाणिकता के आधार पर दिया जाता है। इस टैग से यह सुनिश्चित होता है कि वह उत्पाद केवल और केवल उसी खास भौगोलिक क्षेत्र में तय मानकों के साथ बनाया या उगाया जा रहा है।
महत्वपूर्ण नियम और संचालन:
10 वर्षों के लिए मान्यता: एक बार जीआई टैग मिलने पर यह 10 वर्षों के लिए मान्य होता है, जिसे अवधि पूरी होने के बाद दोबारा रिन्यू (नवीनीकृत) कराया जा सकता है।
मंत्रालय और अधिनियम: भारत में यह प्रतिष्ठित टैग वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत ‘भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री’ की ओर से दिया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया वस्तुओं का भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत संचालित होती है।
नकल पर रोक: जीआई टैग मिलने के बाद कोई भी अन्य व्यक्ति, नकली ब्रांड या कंपनी इस नाम का दुरुपयोग करके अपना सामान नहीं बेच सकती। इससे उत्पाद की ओरिजिनलिटी सुरक्षित रहती है।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने दी बधाई
इस बड़ी उपलब्धि पर मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने समस्त प्रदेशवासियों को बधाई दी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह सफलता राज्य सरकार द्वारा पिछले 3.5 वर्षों में हिमाचल की पारंपरिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और निरंतर किए गए ईमानदार प्रयासों का ही सुखद परिणाम है। जीआई टैग मिलने से वैश्विक बाजार में इन उत्पादों की मांग और सही मूल्य (Price) बढ़ेगा, बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी, नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे और हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई मजबूती मिलेगी।
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