डिग्रियां लेकर नौकरी की तलाश में भटकते पढ़े-लिखे युवा

​विशेष महा-कवरेज: डिग्रियां हाथ में, चेहरे पर मायूसी! बेरोजगारी से बढ़ता नशा, रुकते रिश्ते और 35 हज़ार की लाचारी… ‘पंजाब दस्तक’ पर सुरेंद्र राणा का सीधा सवाल!

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​सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक, चंडीगढ़ न्यूज़ रूम
​चंडीगढ़: एक तरफ केंद्र सरकार 7वें वेतन आयोग के तहत महंगाई भत्ते (DA) को 60% से बढ़ाकर 63% करने का जश्न मना रही है, तो दूसरी तरफ 8वें वेतन आयोग के तहत ₹69,000 की न्यूनतम सैलरी की मांगें अखबारों की सुर्खियां बनी हुई हैं। लेकिन ‘पंजाब दस्तक’ आज उस कड़वे और दर्दनाक सच को उजागर कर रहा है, जिसे देखकर हर मां-बाप का दिल रो पड़ता है।
​सवाल सीधा है—जब देश में पक्की और योग्यता के मुताबिक नौकरियां ही नहीं हैं, तो ये बड़े-बड़े वेतन आयोग और डीए किसके लिए बनाए जा रहे हैं?


​इंजीनियर, पीएचडी और गोल्ड मेडलिस्ट हाथ में डिग्रियां लेकर लाचार!
​आज का सच यह है कि देश का युवा अनपढ़ या अनपढ़ों जैसा नहीं है। हमारे बच्चों ने रात-रात भर जागकर पढ़ाई की है, नामी स्कूलों-कॉलेजों से मेरिट हासिल की है, इंजीनियरिंग की डिग्रियां ली हैं, पीएचडी (PhD) की है और कई युवा गोल्ड मेडलिस्ट हैं।
​लेकिन आज स्थिति यह है कि:
​30-35 हजार की लाचारी: बड़े-बड़े टेक्निकल डिग्री होल्डर और पीएचडी पास युवा अपनी डिग्रियों को हाथों में रखकर देखते रहने को मजबूर हैं। जो युवा लाखों के पैकेज का हकदार था, उसे 30 से 35 हजार रुपये की मामूली नौकरी के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।
​माता-पिता की चिंता और रुकते रिश्ते: पढ़ा-लिखा युवा घर में बैठा है। माता-पिता दिन-रात परेशान हैं कि बच्चों का भविष्य क्या होगा? रोजगार न होने और सम्मानजनक सैलरी न मिलने के कारण युवाओं की शादियां तक नहीं हो पा रही हैं। रिश्ते रुक रहे हैं और घर-परिवार मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं।
​बेरोजगारी से बढ़ता नशा: जब योग्यता के हिसाब से काम नहीं मिलता और हताशा हद से बढ़ जाती है, तो देश का युवा डिप्रेशन का शिकार हो रहा है। यही मुख्य वजह है कि आज युवाओं में नशे का चलन तेजी से बढ़ रहा है। हुक्मरानों को समझना होगा कि नशे की इस आग के पीछे रोजगार का न होना सबसे बड़ा कारण है!


​रेलवे, बिजली बोर्ड से सेक्रेटेरिएट तक पद गायब, आउटसोर्सिंग का शोषण!
​एक दौर था जब रेलवे, बिजली बोर्ड, फूड एंड सप्लाई, कृषि, पंचायती राज, शिक्षा विभाग, राज्यों के सेक्रेटेरिएट और केंद्र के मंत्रालयों में लाखों पक्के पद होते थे।
​लेकिन आज सरकारें पक्के पद खत्म करके 15 से 20-30 हजार रुपये की आउटसोर्सिंग और ठेका प्रथा चला रही हैं। जहाँ कभी 10 लोग काम करते थे, वहाँ एक कंप्यूटर लगा दिया गया और अब रही-सही कसर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पूरी कर रही है। Gen-Z (आज की नई पीढ़ी) पूछ रही है कि आखिर हम जाएं तो जाएं कहाँ?


​OPS का इतिहास और आज का कड़वा सच:
​ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) का इतिहास भारत में ब्रिटिश काल से शुरू हुआ था और आजादी के बाद 1950 में इसे औपचारिक रूप से लागू किया गया, जिसे 1 जनवरी 2004 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय बंद करके न्यू पेंशन स्कीम (NPS) में बदल दिया गया।
​आज नेता चुनावी रैलियों में ओपीएस की रट लगा रहे हैं, लेकिन ‘पंजाब दस्तक’ पूछता है कि—जब विभागों में पक्की पोस्टें (Posts) ही खत्म कर दी जाएंगी और बच्चा 30 हजार की आउटसोर्सिंग पर रहेगा, तो ओपीएस का क्या मतलब रह जाएगा? ओपीएस की बात करने से पहले सरकारों को पक्के पदों का नया स्केल और स्थाई भर्तियां देनी होंगी।


गाँव-गाँव के स्कूलों में न्यू टेक्नोलॉजी की शिक्षा और पक्के टेक-टीचर्स हों!
​देश के शिक्षा मंत्रालय को अब पुरानी प्रणाली से बाहर आना होगा:
​स्कूलों में न्यू टेक्नोलॉजी: इतिहास और पारंपरिक विषयों के साथ-साथ गाँव से लेकर शहर के हर सरकारी स्कूल में ‘न्यू टेक्नोलॉजी’ (एआई, कोडिंग, रोबोटिक्स, आधुनिक स्किल) को अनिवार्य विषय बनाया जाए।
​स्पेशल टेक-टीचर्स की पक्की भर्ती: गाँव-गाँव के स्कूलों में आधुनिक तकनीक पढ़ाने के लिए नए और योग्य टेक-टीचर्स की स्थायी भर्तियां की जाएं ताकि बच्चों को स्कूल स्तर से ही भविष्य के लिए तैयार किया जा सके।


​’पंजाब दस्तक’ के सीधे सवाल:
​योग्यता का अपमान कब तक? पीएचडी, इंजीनियर और गोल्ड मेडलिस्ट युवाओं को 30-35 हजार की अस्थायी नौकरी पर कब तक मजबूर किया जाएगा?
​नशे और बेरोजगारी पर जवाब दो: युवाओं का भविष्य अंधकार में धकेलने और नशे की तरफ बढ़ने के लिए कौन जिम्मेदार है?
​पक्के पद और नई टेक्नोलॉजी कब? आउटसोर्सिंग बंद करके नए पक्के स्केल पर भर्तियां और स्कूलों में न्यू टेक्नोलॉजी की शिक्षा कब लागू होगी?


​सुरेंद्र राणा की कलम से:
“देश को सिर्फ कागजी डीए बढ़ोतरी या चुनावी दांव-पेचों की जरूरत नहीं है। देश को अपने पढ़े-लिखे बच्चों के सम्मान, पक्की नौकरियों और गाँव-गाँव तक आधुनिक शिक्षा की जरूरत है। अगर हुक्मरानों ने आज के युवा का दर्द नहीं समझा, तो आने वाली पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी।”
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