विशेष खोजी रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ (पूर्व अनुभाग अधिकारी एवं प्रोटोकॉल ऑफिसर, हिमाचल प्रदेश सचिवालय)
शिमला/चंडीगढ़:राजनीतिक गलियारों में अक्सर यह माना जाता है कि किसी भी राज्य की तरक्की तभी मुमकिन है जब उसका आंतरिक ढांचा मजबूत हो और सीमा पर बैठे पड़ोसी राज्यों का रुख सहयोगात्मक हो। जब तक पड़ोसियों का रवैया दोस्ताना नहीं होता, तब तक भौगोलिक और आर्थिक विकास की राह आसान नहीं होती। मगर हिमाचल प्रदेश के मामले में यह समीकरण हमेशा एकतरफा रहा। इस पहाड़ी राज्य ने अपने संसाधनों से दूसरों के आशियाने तो रोशन किए, लेकिन जब हिमाचल को उसका जायज वित्तीय हक देने की बारी आई, तो पड़ोसी राज्यों ने हमेशा उदासीनता की चादर ओढ़ ली।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (BBMB) के बकाये का यह विवाद दशकों पुराना है। प्रदेश की हर सरकार ने, चाहे उसका राजनीतिक रंग कोई भी रहा हो, इस अधिकार को हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकी और इस संघर्ष को हमेशा जिंदा रखा। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखू ने जिस आक्रामक और रणनीतिक अंदाज में इस ठंडे बस्ते में पड़े मुद्दे को दोबारा केंद्र और पड़ोसी मुख्यमंत्रियों के सामने उठाया है, उसने चंडीगढ़ से लेकर दिल्ली तक की सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है।
धूमल की अदालत, वीरभद्र की पैरवी और सुखू का सीधा प्रहार
इस ऐतिहासिक संघर्ष की पृष्ठभूमि को देखें तो साफ होता है कि यह हिमाचल के हक के लिए विभिन्न मुख्यमंत्रियों के निरंतर और सामूहिक प्रयासों का नतीजा रहा है:
साल 1998 (प्रेम कुमार धूमल सरकार): हिमाचल के अधिकारों की कानूनी जंग की नींव रखी गई, जब राज्य सरकार ने अपने वैधानिक हक के लिए देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का रुख किया।
साल 2011 (ऐतिहासिक फैसला): करीब 13 साल के लंबे अदालती संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक और न्यायमूर्ति आर.वी. रवींद्रन की खंडपीठ ने हिमाचल के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि हिमाचल इन परियोजनाओं में 7.19% हिस्सेदारी का असली हकदार है।
साल 2016 (वीरभद्र सिंह सरकार): इस फैसले के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय वीरभद्र सिंह ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर हिमाचल के इस हक को लेकर बेहद मजबूती से अपना पक्ष रखा और एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा था।
जयराम सरकार का कदम: पूर्व की भाजपा सरकार ने भी इस मामले में टालमटोल कर रहे पड़ोसी राज्यों पर दबाव बनाने के लिए अदालत की अवमानना (Contempt of Court) याचिका दायर करने तक की पूरी रूपरेखा तैयार कर ली थी।
अब सुखू का ‘सुखविंदर’ अंदाज: साल 2022 में कमान संभालने के बाद सीएम सुखविंदर सिंह सुखू ने इस 28 साल पुराने मामले को पूरी आक्रामकता के साथ फ्रंट फुट पर ला दिया है। हाल ही में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ मोबाइल फोन पर दो-टूक बातचीत और हरियाणा के सीएम नायब सिंह सैनी को लिखी गई कड़क चिट्ठी यह साफ बयां करती है कि हिमाचल अब अपने अधिकारों से पीछे हटने वाला नहीं है।
मेगावाट का महा-संग्राम: अरबों का है पूरा खेल
आखिर पड़ोसी राज्य पंजाब और हरियाणा इस विशाल एरियर को देने में आनाकानी क्यों कर रहे हैं? इसकी मुख्य वजह बीबीएमबी के इन तीन सबसे बड़े पावर प्रोजेक्ट्स की उत्पादन क्षमता में छिपी है:
भाखड़ा बांध प्रोजेक्ट: 1325 मेगावाट क्षमता
ब्यास सतलुज लिंक (BSL) सुंदरनगर: 990 मेगावाट क्षमता
पोंग बांध प्रोजेक्ट: 396 मेगावाट क्षमता
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के अनुसार, इन परियोजनाओं से जुड़े कुल एरियर का 60% हिस्सा पंजाब को और 40% हिस्सा हरियाणा को चुकाना है।
नकद बनाम बिजली: आंकड़ों का सबसे बड़ा खुलासा
वैधानिक गणना के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश की यह कुल बकाया राशि लगभग ₹4,200 करोड़ बैठती है। इसमें अकेले भाखड़ा से ₹2,724 करोड़, सुंदरनगर (मंडी) प्रोजेक्ट से ₹1,034.54 करोड़ और पोंग बांध से ₹491.89 करोड़ की देनदारी शामिल है।
चौंकाने वाली हकीकत यह है कि अगर पंजाब और हरियाणा इस नकदी के बदले हिमाचल को बिजली के रूप में भुगतान करना चाहें, तो यह 1,300 करोड़运行 यूनिट बिजली बनती है, जिसकी वर्तमान बाजार कीमत ₹6,500 करोड़ को भी पार कर जाती है! यही कारण है कि अक्टूबर 2011 के बाद की चालू हिस्सेदारी तो हिमाचल को मिलने लगी, लेकिन पिछले एरियर पर पड़ोसी राज्य आज भी टालमटोल कर रहे हैं।
किसाऊ बांध की ‘महाविजय’ से बदला हौसला, अब रणबांकुरे तैयार
हिमाचल की इस नई रणनीतिक आक्रामकता के पीछे हाल ही में मिली एक बहुत बड़ी सफलता है। पिछले 8 सालों से राष्ट्रीय महत्व की किसाऊ बांध परियोजना को लेकर एक बड़ा वित्तीय गतिरोध (Financial Deadlock) बना हुआ था। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हुए हालिया घटनाक्रम के बाद सभी पक्ष इस गतिरोध को सुलझाने पर सहमत हो गए। इस बड़ी जीत ने सुखू सरकार के इरादों को और मजबूत कर दिया है। सरकार का रुख साफ है कि जब किसाऊ जैसी जटिल समस्या का हल निकाला जा सकता है, तो बीबीएमबी का पुराना बकाया क्यों नहीं वसूला जा सकता?
उजड़े थे 370 गांव, 35 हजार विस्थापित: हमारी कुर्बानी पर रोशन हुआ देश
हिमाचल जब आज अपना अधिकार मांग रहा है, तो यह कोई रियायत नहीं बल्कि अपने लोगों के भारी त्याग और आंसुओं का मुआवजा है। भाखड़ा बांध के निर्माण के लिए हिमाचल के 370 गांव हमेशा के लिए जलमग्न हो गए। 35,000 से ज्यादा लोगों को अपनी पैतृक भूमि छोड़नी पड़ी और 7,000 के करीब परिवारों ने विस्थापन का वो गहरा दर्द झेला जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं है।
हिमाचल के इसी महा-बलिदान के दम पर पड़ोसी मैदानी राज्यों में औद्योगिक और कृषि क्रांति आई और करोड़ों घर जगमगा उठे। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस राज्य ने खुद को संकट में डालकर दूसरों की दहलीज पर उजाला किया, उसे अपने ही हक के लिए पिछले 28 सालों से संघर्ष करना पड़ रहा है।
पंजाब दस्तक का विश्लेषण: कड़े फैसलों और दमदार पैरवी के माहिर हैं सीएम सुखू
यहाँ यह बताना बेहद लाज़मी है कि ‘पंजाब दस्तक’ के प्रबुद्ध दर्शकों और राजनीतिक विश्लेषकों का भी यही मानना है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखू राज्य के हितों की रक्षा के लिए बेहद कड़े फैसले लेने के लिए जाने जाते हैं। वह एक ऐसे कुशल और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले प्रशासक साबित हुए हैं, जो हिमाचल के स्वाभिमान के लिए किसी भी मंच पर डटकर बहस करने और आंखों में आंखें डालकर अपना पक्ष मजबूती से रखने का दम रखते हैं। कड़े फैसलों को अंजाम तक पहुँचाने की इसी महारत के कारण जनता को विश्वास है कि यह ऐतिहासिक गतिरोध अब जरूर टूटेगा।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को आए 15 साल हो चुके हैं और लड़ाई शुरू हुए 28 साल। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखू की यह हालिया ताबड़तोड़ चिट्ठियां, फोन कॉल्स, कड़े प्रशासनिक फैसले और किसाऊ बांध वाली रणनीतिक जीत, पड़ोसी राज्यों के अड़ियल रवैये को पिघलाकर हिमाचल के पहाड़ों में उसके हक की नई सुबह कब तक लाती हैं।
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