हिमाचल प्रदेश भाजपा की रैली में अनुराग ठाकुर, जयराम ठाकुर और राजीव बिंदल से जुड़ी राजनीतिक गतिविधियां

हिमाचल में भाजपा रैलियों से उभरे सवाल: कांगड़ा की उपेक्षा, हमीरपुर में बगावत की आंच और 2027 का सियासी महासंग्राम

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​हिमाचल प्रदेश (सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक)।

देवभूमि हिमाचल प्रदेश की राजनीति का मिजाज अब बेहद तेजी से बदलने लगा है और इस बदलते परिदृश्य में सत्तारूढ़ व विपक्षी खेमों की रणनीतियां खुलकर सामने आने लगी हैं। आज हम विशेष विश्लेषण कर रहे हैं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हालिया राज्यव्यापी रैलियों, सांगठनिक फेरबदल और पार्टी के भीतर गहराते असंतुलन का।
​2027 के आगामी विधानसभा चुनाव भले ही दूर नजर आ रहे हों, लेकिन भाजपा के भीतर सियासी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो चुकी है। एक तरफ जहां पूर्व केंद्रीय मंत्री व हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर का विधानसभा चुनाव न लड़ने से जुड़ा बयान मीडिया व सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक में चर्चा का विषय बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा नेतृत्व प्रदेश भर में ताबड़तोड़ रैलियां करके अपनी सांगठनिक ताकत का मुआयना कर रहा है।
​पार्टी ने राज्य को चार अलग-अलग संसदीय क्षेत्रों में बांटकर अपने अभियान को गति देने की कोशिश की, जिसमें मंडी, शिमला और कांगड़ा के आयोजन मुख्य आकर्षण रहे। बीते दिन दो प्रमुख सियासी मंचों से भाजपा दिग्गजों का शक्ति प्रदर्शन साफ झलका—मंडी में जहां पूर्व मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने पूरा मोर्चा संभाल रखा था, वहीं हमीरपुर के मंच पर पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद अनुराग ठाकुर के साथ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल एक साथ मौजूद दिखे।


​1. मंडी में ‘जय राम’ का जलवा और वर्चस्व
​मंडी की विशाल रैली ने एक बार फिर यह संदेश पूरी मुखरता से दिया कि ‘मंडी किसकी है—मेरी मंडी है, जय राम ठाकुर की मंडी है।’ पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने गृह क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ का अहसास कराते हुए साबित किया कि मंडी का किला आज भी उनके ही नेतृत्व में पूरी तरह सुरक्षित है। कल का पूरा दिन राज्य की राजनीति में एक बड़े सियासी ‘महामुकाबले’ के रूप में दर्ज हुआ, जहां दिग्गजों ने अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी।


​2. कांगड़ा, देहरा, सुजानपुर और बड़सर: उपेक्षा के सवाल और भीतरघात का साया
​हिमाचल की राजनीति का यह स्थापित नियम है कि शिमला की गद्दी की असली चाबी 15 विधानसभा सीटों वाले कांगड़ा जिले और हमीरपुर संसदीय क्षेत्र के पास ही होती है।
​हाल ही में जब कांगड़ा जिले में भाजपा की पदयात्रा आयोजित की गई, तो वहां प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल की अनुपस्थिति ने सियासी हलकों को गर्मा दिया। इस उपेक्षा और कांगड़ा को साइडलाइन किए जाने की चर्चाओं के बीच, हमीरपुर में आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे कांगड़ा, देहरा, सुजानपुर और बड़सर के स्थानीय भाजपाइयों ने शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ अपने सवाल खुलकर सामने रखे:
​क्या भाजपा एक बार फिर कांगड़ा की सियासत और जनमत को हल्के में लेने की भूल कर रही है?
​क्या 2027 के चुनावों से पहले कांगड़ा और हमीरपुर के समीकरणों में कोई बड़ा उलटफेर होने जा रहा है?
​क्या मैदानी हकीकत को नजरअंदाज कर भाजपा खुद को पूरी तरह से ‘कंफर्ट जोन’ में मान बैठी है?


​3. हमीरपुर बना सबसे असंतुलित संसदीय क्षेत्र: 6 विधानसभाओं में आंतरिक घमासान
​राजनीतिक विश्लेषण की नजर से देखें तो 2022 के चुनावी नतीजों में भी जय राम ठाकुर को सबसे जोर का झटका इसी हमीरपुर क्षेत्र से लगा था। वर्तमान में हमीरपुर संसदीय क्षेत्र भाजपा के लिए राज्य का सबसे असंतुलित और तनावपूर्ण इलाका बन चुका है। यहां की 6 ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां बाहर से आए नेताओं (कांग्रेस बागियों व निर्दलीयों) का अंदरूनी तौर पर पुरजोर और रणनीतिक विरोध शुरू हो चुका है:
​1. हमीरपुर जिला (3 सीटें): आशीष शर्मा (हमीरपुर), इंद्रदत्त लखनपाल (बड़सर) और राजेंद्र राणा (सुजानपुर के पूर्व चेहरे) के भाजपा में आने के बाद से स्थानीय भाजपा कैडर में भारी असंतोष है। हमीरपुर में आशीष शर्मा को मात देने के लिए भाजपा का ही एक गुट ‘पॉकेट्स’ में गुप्त रूप से काम करने में जुट गया है।
​2. सुजानपुर का तनाव: सुजानपुर में भाजपा के पुराने चेहरे रहे राजेंद्र राणा के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने और सियासी फेरबदल के बाद से क्षेत्र में राजनीतिक माहौल बेहद तनावपूर्ण बना हुआ है।
​3. बड़सर की चुनौती: बड़सर सीट पर इंद्रदत्त लखनपाल के लिए भी अंदरूनी बगावत के कारण डगर आसान नहीं दिख रही है।
​4. कुटलैहड़ व गगरेट का असंतुलन: कुटलैहड़ में देवेंद्र कुमार (भुट्टो) को भाजपा के पूर्व मंत्री वीरेंद्र कंवर के माध्यम से सीधी और बड़ी चुनौती मिल रही है। वहीं, गगरेट में चैतन्य शर्मा का रास्ता राजेश ठाकुर का खेमा रोक कर खड़ा है।
​5. देहरा का सियासी समीकरण: देहरा सीट पर होशियार सिंह पूरी तरह से बैकफुट पर दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि खुद मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने देहरा की कमान अपने हाथ में ले रखी है।
​हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र के भीतर भाजपा के अपने ही कैंपस के लोग इन बाहरी चेहरों को बेदखल करने के लिए रणनीतिक नीति बनाकर काम कर रहे हैं, जिससे यह पूरा क्षेत्र राजनीतिक बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है।


​4. हमीरपुर रैली: ऐन वक्त पर बदला ठिकाना, गांधी चौक छोड़ निजी हॉल में सिमटा कार्यक्रम
​हमीरपुर में बीते दिन आयोजित रैली सांगठनिक तालमेल की पोल खोल गई:
​स्थान में अचानक बदलाव: पूर्व निर्धारित योजना के तहत यह रैली शहर के दिल माने जाने वाले गांधी चौक पर होनी थी, लेकिन ऐन वक्त पर इसे एक निजी बैंक्वेट हॉल के भीतर समेट दिया गया।
​कम्यूनिकेशन का अभाव: स्थान परिवर्तन की पुख्ता जानकारी बड़सर, सुजानपुर, देहरा और दूर-दराज से पहुंचे समर्थकों व भाजपाइयों तक समय पर नहीं पहुंची।
​अव्यवस्था और तितर-बितर कैडर: सही सूचना न होने की वजह से बाहर से आए कार्यकर्ता सड़कों पर भटकते रहे। पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और डॉ. राजीव बिंदल की मौजूदगी के बावजूद पूरी रैली अव्यवस्थित और बिखरी-बिखरी नजर आई।
​पंजाब दस्तक का निष्पक्ष राजनीतिक विश्लेषण
​हिमाचल प्रदेश की सियासत का इतिहास गवाह है कि कांगड़ा, देहरा, सुजानपुर, बड़सर और हमीरपुर के कार्यकर्ताओं को उपेक्षित रखकर या बाहर से आए नेताओं को जबरन थोपकर सत्ता तक नहीं पहुंचा जा सकता। यदि भारतीय जनता पार्टी 2027 के महासंग्राम से पहले अपने ही संगठन के भीतर सुलग रही इस बगावत की चिंगारी को शांत नहीं करती, तो आने वाले समय में पार्टी को इसका भारी सियासी खामियाजा भुगतना तय है।


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​सुरेंद्र राणा
ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक

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