हिमाचल प्रदेश में 27 साल बाद लॉटरी शुरू करने की तैयारी

हिमाचल में 27 साल बाद लॉटरी की वापसी: होली पर निकल सकता है पहला बंपर, 20 नवंबर तक बिडिंग से तय होगी कंपनियों की किस्मत

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​वरिष्ठ पत्रकार काजल, पंजाब दस्तक
​शिमला (पंजाब दस्तक)।

गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार ने राजस्व जुटाने के लिए एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। प्रदेश में पूर्व धूमल सरकार द्वारा बंद की गई लॉटरी प्रणाली को करीब 27 वर्षों बाद एक बार फिर बहाल करने का खाका तैयार कर लिया गया है। पंजाब दस्तक को मिली विशेष जानकारी के अनुसार, राज्य में ऑनलाइन लॉटरी नहीं चलेगी, बल्कि सिर्फ और सिर्फ ऑफलाइन (कागजी टिकट) लॉटरी ही चलाई जाएगी।


​लॉटरी प्रक्रिया को शुरू करने की चयन प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल है, इसलिए इसमें अभी समय लगेगा। माना जा रहा है कि लोहड़ी या बैसाखी के अवसर पर पहला बंपर निकलना मुश्किल है, लेकिन अगले साल होली के त्योहार पर पहला बड़ा बंपर ड्रा निकाला जा सकता है। हालांकि, नियमित लॉटरी इससे काफी पहले शुरू होने की पूरी संभावना जताई जा रही है।


​20 नवंबर तक बिडिंग, टेंडर प्रक्रिया शुरू
​पंजाब दस्तक की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, लॉटरी संचालन के लिए आबकारी एवं कराधान विभाग ने टेंडर अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर जारी कर दिए हैं:
​20 नवंबर तक बिडिंग की अंतिम तिथि: कंपनियों को आवेदन करने के लिए 20 नवंबर तक की समय-सीमा दी गई है। इसके बाद ही स्थिति साफ होगी कि कितनी कंपनियां इस दौड़ में शामिल होती हैं।
​तारीख बढ़ने की संभावना: यदि बिडिंग प्रक्रिया में अपेक्षित संख्या में कंपनियां आगे नहीं आती हैं, तो सरकार बिडिंग की अंतिम तिथि को आगे भी बढ़ा सकती है।
​कंपनी के रुझान का इंतजार: विभाग फिलहाल कंपनियों के रुख और उनके आवेदनों के रुझान का इंतजार कर रहा है।


​प्रतिदिन 12 ड्रा, ₹10 का टिकट और 10 करोड़ लाइसेंस फीस
​सरकार ने लॉटरी संचालन के लिए बेहद कड़े वित्तीय और व्यावहारिक नियम तय किए हैं:
​न्यूनतम टिकट दर: आम जनता की पहुंच में रखने के लिए टिकट की न्यूनतम खरीद दर ₹10 तय की गई है।
​रोजाना 12 ड्रा: व्यवस्था को रफ्तार देने और राजस्व बढ़ाने के लिए प्रतिदिन अधिकतम 12 ड्रा आयोजित किए जाएंगे।
​10 करोड़ रुपये लाइसेंस फीस: चयनित कंपनी से प्रदेश सरकार सालाना 10 करोड़ रुपये की लाइसेंस फीस वसूलेगी।
​2% टर्नओवर शेयर का करार: उसी कंपनी को ठेका दिया जाएगा, जो सरकार को कंपनी के कुल टर्नओवर की न्यूनतम 2% राशि देने का पक्का करार करेगी।


​विकास का सहारा या सामाजिक ताने-बाने पर संकट?
​सरकार का रुख: राज्य सरकार को उम्मीद है कि इस कदम से खजाने में हर साल 50 से 100 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व आएगा, जिसका इस्तेमाल राज्य की विकास योजनाओं को रफ्तार देने में होगा।
​विपक्ष का तीखा हमला: दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इसका पुरजोर विरोध शुरू कर दिया है। विपक्ष का तर्क है कि जिस लॉटरी को पूर्व धूमल सरकार ने प्रदेश के हित में बंद किया था, उसे फिर से शुरू किया जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि हिमाचल का युवा पहले ही नशे की चपेट में है, ऐसे में लॉटरी जैसी योजनाओं से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।


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​दर्शकों, इस पूरे मुद्दे पर आपकी क्या राय है?
पूर्व धूमल सरकार ने हिमाचल में लॉटरी को बंद किया था। अब सुक्खू सरकार खजाना भरने के लिए इसे फिर से शुरू करने जा रही है। क्या हिमाचल सरकार को प्रदेश में यह लॉटरी खोलनी चाहिए या नहीं? क्या राजस्व बढ़ाने के लिए और भी कई बेहतर रास्ते हो सकते हैं? विपक्ष तो इसे बंद करने के पक्ष में है और इसका विरोध कर रहा है, परंतु आपकी क्या राय है—क्या हिमाचल सरकार को यह कदम उठाना चाहिए?
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