ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा
पंजाब दस्तक, चंडीगढ़ न्यूज़ रूम
नई दिल्ली / चंडीगढ़:
देश के सबसे बड़े त्योहारी सीजन—दिवाली और धनतेरस—से ठीक पहले दिल्ली के व्यापारिक गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। दिवाली की खरीदारी के सबसे अहम पड़ाव पर विपक्षी दलों और कांग्रेस द्वारा 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित विशाल महारैली को लेकर व्यापारियों में जबरदस्त रोष पनप गया है।
दिल्ली, जो पूरे उत्तर और मध्य भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक हब (Hub) है, में इस वक्त पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान समेत भिन्न-भिन्न राज्यों से लाखों छोटे-बड़े व्यापारी व आम खरीदार खरीदारी करने पहुंचते हैं। लेकिन दिवाली से ठीक 4-5 दिन पहले 10 लाख से अधिक लोगों के दिल्ली में जुटने और मध्य दिल्ली की संभावित नाकेबंदी ने व्यापारियों के होश उड़ा दिए हैं।
₹10,000 करोड़ का व्यापार दांव पर, 10 नवंबर के बाद रैली कराने की उठी मांग
व्यापारिक संगठनों के राष्ट्रीय आकलनों के अनुसार, दिवाली और धनतेरस के इस ‘पीक सीजन’ के दौरान दिल्ली के बाजारों में ₹25,000 करोड़ से अधिक का कारोबार होता है।
व्यापारियों का साफ कहना है कि अगर 1 नवंबर को रामलीला मैदान में इतनी बड़ी रैली होती है, तो सुरक्षा कारणों से चांदनी चौक, सदर बाजार, भागीरथ पैलेस, खारी बावली और कनॉट प्लेस जैसे मुख्य बाजार पूरी तरह सील या पंगु हो जाएंगे। इससे व्यापारियों को सीधे तौर पर 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
व्यापारी संगठनों (CTI व CAIT) ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सांसद राहुल गांधी को पत्र (Letter) भेजकर और ऑनलाइन पिटिशन चलाकर पुरजोर मांग की है कि इस रैली को 10 नवंबर (भाई दूज) के बाद री-शेड्यूल किया जाए।
विपक्षी दलों और कांग्रेस को सोच-विचार की सख्त जरूरत
व्यापारियों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन और रैली करना हर राजनीतिक दल का अधिकार है, लेकिन यह किसी की रोज़ी-रोटी की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
3,000 करोड़ का पहले ही हो चुका है नुकसान: व्यापारियों के मुताबिक अक्टूबर के शुरुआती हफ्तों में हुए विभिन्न प्रदर्शनों और पाबंदियों के कारण दिल्ली का बाजार पहले ही ₹3,000 करोड़ का घाटा सह चुका है।
विपक्ष से अपील: विपक्षी गठबंधनों और कांग्रेस नेतृत्व को इस पर गहराई से विचार करना चाहिए कि जब देश भर—विशेषकर पंजाब, हिमाचल, बिहार और यूपी—से छोटे कारोबारी साल भर का स्टॉक खाली करने और नया माल खरीदने दिल्ली आते हैं, ऐसे में ट्रैफिक डायवर्जन और नाकेबंदी उनके पेट पर लात मारने जैसा होगा।
भिन्न-भिन्न प्रदेशों से जुड़ा है दिल्ली का व्यापार तंत्र
दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन है:
उत्तर भारत का सप्लाई हब: पंजाब और हिमाचल से सेब, ऊनी कपड़े और ड्राई फ्रूट्स का व्यापार दिल्ली से संचालित होता है।
बिहार और पूर्वांचल के खरीदार: बिहार, झारखंड और यूपी के लाखों व्यापारी दिवाली, छठ और लग्न (शादियों के सीजन) का सामान खरीदने दिल्ली के थोक बाजारों पर ही निर्भर रहते हैं।
दिहाड़ी मजदूरों पर मार: यदि बाजार बंद रहते हैं या ग्राहक नहीं पहुंचते, तो पंजाब, बिहार और यूपी से आए लाखों कुली, ऑटो-रिक्शा चालक, रेहड़ी-पटरी वाले और ट्रांसपोर्टर्स के चूल्हे ठंडे पड़ जाएंगे।
व्यापारिक संघों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि राजनीतिक दल अपनी जिद पर अड़े रहे और रैली की तारीख नहीं बदली गई, तो व्यापारी वर्ग बड़े पैमाने पर विरोध दर्ज कराने को मजबूर होगा।
हमारी राय (संपादकीय दृष्टिकोण):
पंजाब दस्तक की राय: लोकतंत्र में अपनी बात रखना और राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करना हर दल का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन जब मामला लाखों छोटे-बड़े व्यापारियों, रेहड़ी-पटरी वालों और देश भर से आने वाले आम खरीदारों की रोज़ी-रोटी का हो, तो राजनीतिक दलों को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। त्योहारी सीजन ही व्यापारियों के लिए पूरे साल की कमाई का आधार होता है। ऐसे में 1 नवंबर की इस विशाल रैली को 10 नवंबर (भाई दूज) के बाद टालना ही जनहित और व्यापार हित में सबसे न्यायसंगत कदम होगा।
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क्या राजनीतिक दलों को दिवाली के इस पीक सीजन में अपनी रैली टालकर व्यापारियों को राहत देनी चाहिए?
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