सुरेंद्र राणा की बेबाक कलम से / ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
चंडीगढ़ न्यूज़ रूम:
आज दिल में उठती एक गहरी टीस और जेहन में कौंधते कुछ जलते हुए सवालों को लेकर कलम उठाई है। चंडीगढ़ के न्यूज़ रूम में बैठते हुए जब नज़र पंजाब के लहलहाते खेतों, कश्मीर की वादियों और हिमाचल के बर्फीले शांत पहाड़ों से लेकर कन्याकुमारी के समंदर तक दौड़ती है, तो आत्मा अंदर तक झकझोर उठती है।
यह सवाल आज अचानक यूं ही नहीं उठे। आज जब देखता हूँ कि अपनी मांगों को लेकर पटरियों पर बैठकर ट्रेनें रोक दी जाती हैं, राजमार्ग जाम कर दिए जाते हैं, तो दिल दहल उठता है। चाहे वह मैदानी इलाकों की ट्रेनें हों या हिमाचल और कश्मीर के दुर्गम रास्तों पर फंसी गाड़ियां—किसी लाचार मुसाफिर को अस्पताल पहुंचना है, किसी को अपनी मां के अंतिम दर्शन करने हैं, किसी छात्र की परीक्षा है—उन बेबस राहगीरों का क्या कसूर? विरोध का हक सबको है, मगर किसी का रास्ता रोककर जिंदगी थका देना कहां का इंसाफ है? सरकारों को भी समझना होगा कि हालात इस हद तक क्यों पहुंचे, और चक्का जाम करने वालों को भी अपनी अंतरात्मा में झांकना होगा कि क्या आम जनता का गला घोंटकर इंसाफ मिलता है?
यह कोई किताबी रिपोर्ट नहीं है; यह एक जमीनी पत्रकार का अपने देश और समाज से जुड़ा सीधा दर्द है। आज जब मुड़कर 1960 से 1980 के उस दौर को देखता हूँ, तो आंखें भर आती हैं। वह हमारा दौर था—पैसों की तंगी थी, साइकिलों पर जिंदगी कटती थी, मगर घरों में बुजुर्गों की चौखट का एक खौफ और बेपनाह अदब था।
लेकिन आज 2026 के चौराहे पर खड़े होकर जब देखता हूँ, तो लगता है कि हमारी रूह तक को किसी ने गिरवी रख दिया है। एक तरफ हमारे दौर का वो अनुशासन और संस्कार था, और दूसरी तरफ आज 2025-26 में आंखें खोलने वाले वो दूधमुंहे बच्चे हैं जो 2050 तक इस मुल्क के नौजवान बनेंगे। सवाल यह है कि क्या 2050 का हिंदुस्तान इंसानों का होगा या सिर्फ रोबोट्स, एआई की चिप्स, नशे की दलदल और पटरियों पर लाठियां खाते बेरोजगारों का?
1. 1960-1980 का वो सुनहरा वक्त: जब जेबें खाली थीं, मगर सीनों में गैरत जिंदा थी
हमारे वक्त में पिता की आंख की एक झिड़की ही इंसान को सीधा रखने के लिए काफी थी। शिक्षकों की छड़ी में गुस्सा नहीं, भविष्य संवारने की फिक्र होती थी। राशन की कतारों में घंटों खड़े रहकर भी चेहरे पर सब्र और संतोष था। किसी के घर में शादी हो या मातम, पूरा कुनबा बिना बुलाए कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो जाता था।
मेहनत की सूखी रोटी में भी बरकत थी, और सबसे बड़ी बात—अहसासों में सच्चाई थी। आज खुद से और अपनी ही हमउम्र पीढ़ी से यह सवाल पूछने को मजबूर हूँ कि वह मर्यादा, वह सब्र और वह बड़ों के पैरों को छूने वाला सम्मान आखिर कौन से समंदर में डूब गया?
2. आज की ज़मीनी सच्चाई: खाली हाथ, बढ़ता नशा और सड़कों-पटरियों पर संग्राम
अब ज़रा आज 2026 की हकीकत देखिए। पंजाब, हरियाणा से लेकर हिमाचल के शांत पहाड़ों और कश्मीर की वादियों तक युवाओं की बेचैनी एक जैसी दिखती है।
बचपन मोबाइल में कैद: खेल के मैदान वीरान पड़े हैं, और बच्चों का बचपन 6 इंच की स्क्रीन में रील्स देखते-देखते दम तोड़ रहा है।
डिग्रियों की कतार और नशे की दलदल: पंजाब के मैदानों से लेकर हिमाचल की शांत वादियों तक, एमए, एमएससी, बीटेक की डिग्रियां हाथ में लिए नौजवान रोजगार के लिए भटक रहे हैं। जब सालों के पसीने के बाद भी भविष्य में सिर्फ अंधेरा दिखता है, तो यही हताशा कई नौजवानों को दीमक की तरह फैलते नशे की गर्त में धके ल देती है। नशा सिर्फ एक लत नहीं, बल्कि टूटे हुए सपनों और व्यवस्था की नाकामी का खौफनाक नतीजा है।
ट्रेनें बंद, रास्ते ठप, जनता बेहाल: बात-बात पर रेलवे ट्रैक जाम कर देना, सड़कें रोक देना अब आम हो गया है। मरीज एंबुलेंस में दम तोड़ते हैं, दूर-दराज का मुसाफिर और पहाड़ों की ओर जाने वाले राहगीर घंटों रास्तों पर भूखे-प्यासे तड़पते हैं। नौजवानों का आक्रोश अपनी जगह सही हो सकता है, मगर आम जनता को बंधक बनाना किस सोच का हिस्सा है?
3. प्रशासनिक सुस्ती और वोटों की सियासत: क्या नौजवान सिर्फ रैलियों की भीड़ हैं?
उत्तर के पहाड़ी राज्यों से लेकर दक्षिण के समंदर तक, किसी भी राज्य की व्यवस्था को देख लीजिए—
रेवड़ियों की सियासत: चुनाव आते ही मुफ्त के वादों की झड़ी लग जाती है। लेकिन क्या किसी हुक्मरान ने यह सोचा कि मैदानों और पहाड़ों के नौजवानों के हाथों को नशा नहीं, पक्का काम, हुनर और सम्मान की रोजी-रोटी कैसे मिलेगी?
फाइलों में दफन भविष्य: नीतियां सिर्फ वातानुकूलित कमरों में कागजों पर बनती हैं। युवाओं को केवल चुनाव जीतने का औजार और रैलियों की भीड़ बनाकर छोड़ दिया गया है। जब यही युवा हताश होकर ट्रैक पर बैठता है, तो प्रशासन लाठियों और मुकदमों से उसकी आवाज दबाने की कोशिश करता है।
4. 2025 से 2050: आने वाला कल और रूह कंपा देने वाले सवाल
जो बच्चे 2025-26 के इस दौर में जन्म ले रहे हैं, 2050 में वे 25 साल के होंगे। ज़रा दिल पर हाथ रखकर सोचिए—
जब वे इंसानी स्पर्श से ज्यादा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), स्क्रीनों और रोबोटिक मशीनों के बीच बड़े होंगे, तो क्या वे अपने बुजुर्ग मां-बाप के आंसुओं और दर्द की भाषा समझ पाएंगे?
जब ऑटोमेशन और मशीनें नौकरियां निगल चुकी होंगी, तब अगर आज से ही नशे से दूर रखकर तकनीकी हुनर और रोजगार की जमीन तैयार नहीं की गई, तो क्या वो पीढ़ी मानसिक तनाव, अकेलेपन और डिप्रेशन की भेंट नहीं चढ़ जाएगी?
क्या रिश्ते सिर्फ वर्चुअल दुनिया के ‘मैसेज’ बनकर रह जाएंगे और संयुक्त परिवारों की आखिरी पहचान भी मिट जाएगी?
एक पत्रकार की कलम से आत्मावलोकन: वक्त रहते हम सबको मिलकर समझना होगा
एक निष्पक्ष पत्रकार के नाते मेरा मकसद सिर्फ उंगली उठाना नहीं, बल्कि पूरे समाज को आईना दिखाना है। यह चुनौती किसी एक सरकार या पार्टी की नहीं है—यह हम सबकी सामूहिक विफलता और जिम्मेदारी का सवाल है।
सरकारों को वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर हर हाथ को नशा-मुक्त माहौल, हुनर और पक्का रोजगार देना होगा। वहीं विरोध करने वाले संगठनों और युवाओं को भी यह समझना होगा कि आम राहगीरों की राह में कांटे बिछाकर और ट्रेनें रोककर कोई हक हासिल नहीं होता। 1960 के दौर के संस्कारों, मर्यादा और सब्र को आज की आधुनिक सोच के साथ जोड़ना हम सबकी साझी जिम्मेदारी है—नहीं तो 2050 का समाज केवल मशीनों और खोखले इंसानों का ऐसा जंगल बनकर रह जाएगा जहां इंसान तो होंगे, मगर इंसानियत ढूंढने से भी नहीं मिलेगी।
आपकी राय, आपका मंच — दिल खोलकर लिखें:
यह खबर सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि हर मां-बाप, नौजवान और बुजुर्ग के आत्ममंथन के लिए है। आप चाहे 1960 के दौर के हों, मिलेनियल हों, या आज की नई पीढ़ी के—इस जलते हुए मुद्दे पर, बढ़ते नशे पर और बात-बात पर होने वाले चक्का जाम पर आपके मन में क्या विचार उठते हैं? क्या आपको भी लगता है कि हमारी संस्कृति और आने वाली नस्लों को बचाने के लिए हम सबको और सरकारों को मिलकर तुरंत जागना होगा?
अपनी उम्र और अपने मन के विचार नीचे कमेंट बॉक्स में बेबाकी से जरूर साझा करें। आपके विचार ही इस चर्चा को असली ताकत देंगे।
देखते रहें ‘पंजाब दस्तक’ — सच की आवाज़!
