पंजाब दस्तक
सुरेंद्र राणा की कलम से (ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक)
चंडीगढ़/शिमला (पंजाब दस्तक):
रात का सन्नाटा गहरा चुका था, लेकिन आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। दिमाग में विचारों की एक कसमकश चल रही थी और दिल किसी अनजाने दर्द से भारी हो रहा था। आधी रात को जब नींद उचटी, तो मन में यही सवाल बार-बार कौंधने लगा कि आखिर देश के ईमानदार नागरिक और मेहनत-कश मध्यमवर्ग के साथ यह कैसा अन्याय हो रहा है?
आज यह कोई रूटीन खबर या राजनीतिक विश्लेषक का लेख नहीं है। यह रात के सन्नाटे में उकेरी गई मेरी सच्ची ‘मन की बात’ है, जिसे मैं अपने सभी पाठकों और ‘पंजाब दस्तक’ के दर्शकों के साथ साझा कर रहा हूँ। यह दर्द देश के नीति-निर्माताओं, सांसदों, विधायकों और भारत सरकार के उच्च वित्त अधिकारियों तक पहुँचाने की एक विनम्र कोशिश है।
संसद का आदर्श वाक्य और जमीनी कड़वी सच्चाई
हमारी भारतीय संसद का मुख्य द्वार एक पावन श्लोक से सुशोभित है, जो हर जनप्रतिनिधि और शासक को उसकी नैतिक जिम्मेदारी याद दिलाता है:
”अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
(अर्थात: यह मेरा है और यह पराया, ऐसी सोच छोटे मन वालों की होती है। उदार हृदय वालों के लिए तो संपूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है।)
लेकिन आज देश के नीति-निर्माताओं से मेरा सीधा सवाल है—जब संसद की दीवारें पूरे विश्व को परिवार मानने का संदेश देती हैं, तो फिर देश के उस ईमानदार टैक्सपेयर को संकट के समय ‘अजनबी’ और ‘लावारिस’ क्यों छोड़ दिया जाता है, जो अपनी कमाई से इस देश की अर्थव्यवस्था को संभालता है?
सॉफ्टवेयर इंजीनियर का ₹45 लाख का पैकेज और डिप्रेशन की अँधेरी खाई
यह कहानी कोई काल्पनिक किस्सा नहीं है, बल्कि आज के भारत का एक खौफनाक और नंगा सच है। बेंगलुरु में काम करने वाले एक होनहार युवा को ₹45 लाख सालाना का पैकेज मिला। उस बच्चे ने बड़ी ईमानदारी और स्वाभिमान के साथ पिछले 5 वर्षों में अपनी कमाई से करीब ₹30 लाख का भारी-भरकम टैक्स सरकार की तिजोरी में जमा कराया।
लेकिन फिर एक दिन अचानक कॉरपोरेट जगत में छंटनी (Layoff) का चाबुक चला और उसकी नौकरी चली गई। कुछ महीने तो उसने अपनी जमा-पूंजी से घर चलाया, लेकिन जब बचत का आखिरी रुपया भी खत्म हो गया, तो वही होनहार और स्वाभिमानी युवा डिप्रेशन के भयानक अंधेरे में धकेल दिया गया।
अब दिल पर हाथ रखकर सोचिए— जब तक वह युवा लाखों रुपये टैक्स भर रहा था, तब तक वह देश का ‘आदर्श नागरिक’ था। लेकिन जिस दिन उसकी नौकरी छूटी और उसे सहारा चाहिए था, उस दिन सरकार का पूरा तंत्र गायब मिला।
अमेरिका जैसी ‘सामाजिक सुरक्षा’ भारत में क्यों गायब?
दुनिया के विकसित देशों को देखें, तो अमेरिका और यूरोप में टैक्स देने वाले हर नागरिक को ‘सोशल सिक्योरिटी’ (सामाजिक सुरक्षा) का अधिकार हासिल है। अगर किसी वजह से नौकरी चली जाती है, तो सरकार दूसरी नौकरी मिलने तक उसे बेरोजगारी भत्ता और पेंशन देती है, ताकि किसी की गरिमा पर आंच न आए।
लेकिन हमारे यहाँ? हमारे देश में व्यवस्था केवल “आने दो” के सिद्धांत पर चल रही है। सरकारें टैक्स तो पूरे हक और सख्ती से वसूलती हैं, लेकिन मुसीबत के समय टैक्सपेयर को पूरी तरह उसके हाल पर छोड़ देती हैं।
मुफ्तखोरी का जाल और पिसता मध्यमवर्ग
आज देश की राजनीति में एक अजीब सी होड़ मची है। जो वर्ग ₹1 का भी इनकम टैक्स नहीं देता, उसे खुश करने के लिए मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त राशन और अनगिनत लोक-लुभावन योजनाएं परोसी जा रही हैं।
लेकिन जिस नौकरीपेशा नागरिक और मध्यमवर्ग के खून-पसीने से यह पूरी व्यवस्था चल रही है, उसके लिए क्या है? यही हाल छोटे व्यापारियों का है, जो 30% टैक्स भरकर भी सिर्फ सरकारी तंत्र के उत्पीड़न और रिश्वतखोरी का शिकार होते हैं।
दर्शकों और पाठकों से अपील (सुरेंद्र राणा की कलम से)
देश का कानून बनाने वाले आदरणीय जन-प्रतिनिधियों और अधिकारियों से मेरे सीधे सवाल हैं:
क्या इस देश में ईमानदारी से टैक्स भरना कोई गुनाह है?
जो युवा देश का खजाना भरते हैं, उनके बुरे वक्त के लिए सरकार के पास कोई ‘सोशल सिक्योरिटी’ नीति क्यों नहीं है?
क्या सरकार का व्यवहार देश के हर नागरिक के साथ एक जिम्मेदार माता-पिता जैसा नहीं होना चाहिए?
यह मेरी सच्ची मन की पीड़ा है। मैं आप सभी पाठकों और पंजाब दस्तक के दर्शकों से दिल से अपील करता हूँ—इस लेख को पढ़ने के बाद अपने कमेंट्स और विचार मुझे ज़रूर दें। आपके कमेंट्स का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहेगा। आखिर कब तक यह सवाल अनुत्तरित रहेगा? आखिर क्यों?
सोचिएगा जरूर और अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर लिखिएगा!
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लेखक: सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ (पंजाब दस्तक)
