शिमला के खलीनी स्थित अरण्य भवन में कैंटीन की आड़ में संचालित कमर्शियल दुकानों को लेकर उठे सवाल।

जब अरण्य भवन बना ‘शॉपिंग हब’… खलीनी स्थित वन विभाग मुख्यालय में नियमों को ठेंगा दिखाकर सजा बाजार!

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​विशेष एक्सक्लूसिव रिपोर्ट | सुरेंद्र राणा (वरिष्ठ ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक)
​शिमला: राजधानी शिमला के खलीनी स्थित प्रधान मुख्य अरण्यपाल (PCCF) मुख्यालय यानी ‘अरण्य भवन’ में एक ऐसा अनूठा प्रशासनिक कारनामा सामने आया है, जिसने महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वन संरक्षण और पर्यावरणीय नीतियों का संचालन करने वाले इस प्रदेश स्तरीय शीर्ष कार्यालय के भीतर एक पूरा ‘कमर्शियल बाजार’ तैयार कर दिया गया है।


​हकीकत यह है कि दफ्तर के कर्मचारियों के लिए महज एक छोटी कैंटीन (चाय-नाश्ते के प्रबंध) की सिफारिश की गई थी। मगर इसी अनुमति की आड़ में खेल रचते हुए अरण्य भवन परिसर में किराने की दुकानें, सब्जी काउंटर और जनरल स्टोर खोलकर उन्हें बाकायदा व्यावसायिक दरों पर अलॉट कर दिया गया।


​हिदायत दरकिनार, नियमों की खुली अनदेखी
​पंजाब दस्तक की पड़ताल में सामने आए अंदरूनी दस्तावेज इस समूचे घटनाक्रम को स्पष्ट रूप से अनियमितता करार देते हैं:
​मुख्यालय की सख्त एडवाइजरी: 9 जनवरी 2026 को जारी लिखित निर्देशों में स्पष्ट उल्लेख था कि परिसर में केवल सीमित खान-पान सामग्री वाली कैंटीन ही संचालित की जा सकती है।


​बाय-लॉज़ का उल्लंघन: राशन या किराना स्टोर जैसी व्यावसायिक इकाइयां स्थापित करना नगर निगम उप-नियमों और सरकारी परिसंपत्ति उपयोग नीति का सीधा उल्लंघन है।


​व्यक्तिगत जवाबदेही का प्रावधान: आदेश में पूर्व में ही अंकित किया गया था कि स्वीकृत दायरे से बाहर जाकर यदि दुकानें आवंटित की गईं, तो उत्पन्न होने वाली किसी भी विधिक या प्रशासनिक समस्या के लिए संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे।
​इसके बावजूद मुख्यालय की हिदायतों को ठंडे बस्ते में डालकर टेंडर प्रक्रिया चलाई गई और दफ्तर के भीतर व्यापारिक गतिविधियां शुरू करवा दी गईं।


​प्रक्रियागत खामियां और अधिकारियों का मौन
​सरकारी व्यवस्था में किसी भी राजकीय भवन के उपयोग का स्वरूप बदलने अथवा कमर्शियल गतिविधियां शुरू करने हेतु वित्त विभाग (Finance Department) एवं सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य होती है।
​जब इस पूरे प्रकरण के बाबत PCCF डॉ. संजय सूद का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने विषय को आंतरिक व्यवस्था से जुड़ा बताकर विस्तृत टिप्पणी करने से परहेज़ किया। शीर्ष स्तर पर इस विषय पर साधी गई चुप्पी कई प्रशासनिक सवाल खड़े करती है।


​जनसाधारण के लिए सख्ती, तंत्र के भीतर ढील?
​राजकीय संपत्तियों का निर्माण सार्वजनिक कर-राजस्व से होता है और उनका उपयोग निर्धारित नियमों के दायरे में ही अपेक्षित है:
​प्रशासनिक मापदंड: शहर के किसी हिस्से में यदि कोई सामान्य नागरिक बिना अनुमति अस्थायी स्टॉल भी लगाता है, तो स्थानीय प्रशासन तत्काल चालान या जब्ती की कार्रवाई करता है।


​मूल प्रश्न: क्या कारण है कि जब राज्य के सबसे बड़े वन कार्यालय परिसर के भीतर बिना वैधानिक अनुमतियों के पूरा व्यापारिक ढांचा खड़ा कर दिया जाता है, तब जवाबदेही से किनारा कर लिया जाता है?


​कर्मचारियों की सुविधा के नाम पर राजकीय परिसर का व्यावसायिक उपयोग सीधे तौर पर निर्धारित प्रक्रियाओं की अवहेलना की ओर संकेत करता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च प्रशासनिक स्तर पर इसकी निष्पक्ष समीक्षा की जाएगी।


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​पंजाब दस्तक के लिए खलीनी (शिमला) से वरिष्ठ ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा की ग्राउंड रिपोर्ट।

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