वरिष्ठ पत्रकार: उमांशी राणा (हमीरपुर) —
## हमीरपुर ब्लॉक: पूरे प्रदेश में हमीरपुर का अलग सियासी मिजाज; प्रधान पद पर नहीं हुआ एक भी निर्विरोध चयन, हर पंचायत में सीधी भिड़ंत
हमीरपुर: नगर निकाय चुनाव में 78.89% का रिकॉर्ड मतदान करने के बाद अब हमीरपुर ब्लॉक का ग्रामीण क्षेत्र पंचायत चुनाव के रंग में पूरी तरह रंग चुका है। राज्य चुनाव आयोग के ताजा आंकड़ों ने हमीरपुर के कड़े राजनीतिक मुकाबले पर मुहर लगा दी है। हिमाचल के अन्य जिलों में जहां सैकड़ों प्रधान निर्विरोध चुन लिए गए हैं, वहीं हमीरपुर पूरे प्रदेश का इकलौता ऐसा जिला बनकर उभरा है जहां ‘प्रधान’ के पद पर एक भी सीट सर्वसम्मति से तय नहीं हो सकी है। हर सीट पर दो से तीन धड़े आमने-सामने हैं। इस कड़े मुकाबले ने साबित कर दिया है कि मुख्यमंत्री के गृह जिले की जमीनी सियासत कितनी आक्रामक है। चुनावी रणनीति बनाने और वोटर्स को रिझाने के लिए बंद कमरों में बैठकों का दौर आधी रात तक चल रहा है।
## सुजानपुर ब्लॉक: शहरी निकाय के नतीजों के बाद अब पंचायतों पर नजर; वार्डों में जोड़-तोड़ और शह-मात का खेल तेज
सुजानपुर: सुजानपुर शहरी निकाय चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद अब सभी राजनीतिक दलों और स्थानीय दिग्गजों ने अपनी पूरी ताकत ग्रामीण क्षेत्रों की पंचायतों में झोंक दी है। 26 मई को होने वाले पहले चरण के मतदान के लिए सुजानपुर ब्लॉक के गांवों में चुनावी चौपालें सजने लगी हैं। शहरी क्षेत्र में अपनी साख गंवाने वाले कुछ बड़े चेहरे अब पंचायतों में अपने करीबियों को जिताकर राजनीतिक कमबैक करने की फिराक में हैं। वहीं, युवा चेहरे इस बार पारंपरिक राजनीति को चुनौती दे रहे हैं। गांवों में विकास के दावों से ज्यादा इस बात पर चर्चा है कि कौन सा उम्मीदवार किस बड़े नेता का करीबी है, जिससे मुकाबला पूरी तरह से प्रतिष्ठा की जंग बन चुका है।
## नादौन ब्लॉक: मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में साख की लड़ाई; हर पंचायत में चौकसी बढ़ी, चुनाव प्रचार ने पकड़ी रफ्तार
नादौन: मुख्यमंत्री का अपना निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण नादौन ब्लॉक पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं। यहां पंचायत चुनाव के लिए प्रचार अब अपने चरम पर पहुंच गया है। पहले चरण की वोटिंग के लिए अब बेहद कम समय बचा है, जिसे देखते हुए प्रत्याशियों ने घर-घर जाकर वोट मांगने की रफ्तार दोगुनी कर दी है। स्थानीय प्रशासन ने भी सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर कमर कस ली है। नादौन की कई संवेदनशील पंचायतों में चुनावी समीकरण हर घंटे बदल रहे हैं। सत्तापक्ष के समर्थक जहां विकास कार्यों के नाम पर वोट मांग रहे हैं, वहीं अन्य गुट स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक ढिलाई को मुद्दा बनाकर वोटर्स को गोलबंद कर रहे हैं।
## भोरंज ब्लॉक: पंचायत चुनाव में कांटे की टक्कर; पार्टी लाइन से हटकर स्थानीय गुटबाजी और रसूख हावी
भोरंज: भोरंज ब्लॉक की पंचायतों में इस बार का चुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। हालांकि यह चुनाव आधिकारिक तौर पर पार्टी सिंबल पर नहीं हो रहे हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर बड़े नेताओं का वरदहस्त ही उम्मीदवारों की जीत-हार तय करता है। भोरंज में इस समय पारंपरिक गुटों को नए उभरते राजनीतिक समीकरणों से कड़ी चुनौती मिल रही है। सोशल मीडिया से लेकर गांवों की गलियों तक पोस्टर वॉर शुरू हो चुका है। उम्मीदवारों द्वारा मतदाताओं को रिझाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। भोरंज मुख्यालय के आसपास की पंचायतों में रसूखदारों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है।
## बड़सर ब्लॉक: मैहरे और बड़सर बेल्ट के ग्रामीण इलाकों में चुनावी सरगर्मी; नुक्कड़ सभाओं में गूंज रहे स्थानीय मुद्दे
बड़सर: बड़सर और मैहरे बेल्ट से सटी ग्राम पंचायतों में इन दिनों राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर है। पंचायत चुनाव के तीनों चरणों (26, 28 और 30 मई) को लेकर उम्मीदवारों ने अपना-अपना वोट बैंक सुरक्षित करना शुरू कर दिया है। ग्रामीण इलाकों में हो रही नुक्कड़ सभाओं में सड़कों की हालत, स्ट्रीट लाइट और पेयजल जैसे बुनियादी मुद्दे तो उठाए जा रहे हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर जातिगत और पारिवारिक समीकरणों को साधने की कोशिशें ज्यादा हो रही हैं। बड़सर ब्लॉक में इस बार युवाओं और महिला उम्मीदवारों की अच्छी खासी तादाद ने पुराने राजनीतिक गणितज्ञों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
## बिझड़ी ब्लॉक: चुनावी प्रचार में उतरे बड़े चेहरे; देर रात तक बैठकों का दौर, वोटर्स को साधने की हरसंभव कोशिश
बिझड़ी: बिझड़ी ब्लॉक की पंचायतों में चुनावी रणभेरी बजते ही माहौल पूरी तरह राजनीतिक हो चुका है। पहले चरण के मतदान में अपनी बढ़त सुनिश्चित करने के लिए उम्मीदवारों ने पूरी ताकत झोंक दी है। दिन के समय खेतों और घरों में जनसंपर्क करने के बाद, देर रात को रणनीतिक बैठकें आयोजित की जा रही हैं। बिझड़ी के ग्रामीण क्षेत्रों में इस बार का मुकाबला इसलिए भी कड़ा है क्योंकि जिला परिषद और पंचायत समिति के सदस्य भी अपने-अपने समर्थित प्रधानों को जिताने के लिए मैदान में उतर आए हैं। इस सियासी घमासान के बीच आम जनता खामोश है, जिससे उम्मीदवारों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं।
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