शिमला: राजधानी में बरसात से हुए नुकसान की भरपाई और जनता से जुड़े कार्यों को करने के लिए पैसा न होने का बहाना बनाने वाला नगर निगम इन दिनों अफसरों के दफ्तर और कोठियां चमका रहा है। नगर निगम कार्यालय में अफसरों के दफ्तर एक-एक कर चमकाए जा रहे हैं। दीवारों पर अफसरों की पसंद का वुडन वर्क हो रहा है। यह सभी दफ्तर उपायुक्त कार्यालय भवन में बने हैं जो नगर निगम की अपनी संपत्ति तक नहीं है। यही नहीं, कई अधिकारियों के सरकारी आवासों को भी चकाचक किया जा रहा है।
संजौली में भी एक आवास को चमकाने का काम इन दिनों जोरों से चल रहा है। उधर दूसरी ओर शहर में भारी बारिश से तबाही हो रही है। कई वार्डों में सड़कें पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं तो कई धंसने की कगार पर हैं। रास्तों के भी यही हाल हैं। लेकिन आपदा के समय में नगर निगम प्रशासन दफ्तरों और कोठियों पर लाखों रुपये खर्च कर रहा है।
सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसे समय में जब शहर की जनता को राहत देने की जरूरत है, निगम प्रशासन इसके विपरीत काम कर रहा है। आरोप लग रहे हैं कि इनमें से कुछ कार्यों के तो टेंडर तक नहीं किए हैं। इस पर अब भाजपा ने भी मोर्चा खोलते हुए सवाल उठा दिए हैं। हालांकि, निगम प्रशासन का कहना है कि दफ्तरों की मरम्मत के टेंडर पिछले साल के हैं। अब सिर्फ काम करवाया जा रहा है।
आपदा में भी व्यवस्था परिवर्तन : भाजपा
भाजपा पार्षदों का कहना है कि यह आपदा में व्यवस्था परिवर्तन हो रहा है। भाजपा पार्षद सरोज ठाकुर ने कहा कि वह निगम दफ्तर में करवाए जा रहे कार्यों से हैरान हैं। शहर में सड़कें रास्ते बंद हैं और निगम इन कामों पर पैसा बहा रहा है। यह कार्य बाद में भी हो सकते हैं। पार्षद आशा शर्मा ने कहा कि उनके वार्ड में दो साल पहले खुले बुक कैफे में निगम कुर्सियां तक नहीं लगा रहा।
इसके लिए पैसा न होने का बहाना बनाते हैं। नगर निगम दफ्तर पहुंचे पूर्व डिप्टी मेयर राकेश शर्मा ने कहा कि उनके पिछले प्रस्ताव निगम ने पैसा न होने का तर्क देकर रद्द कर दिए। नाले पक्के करने और सड़कें बनाने जैसे काम लटक गए। लेकिन निगम दफ्तर आकर देखा तो पता लगा कि पैसों का संकट नहीं है। सिर्फ जनता के लिए पैसा नहीं है।
महापौर बोले, यह रूटीन के कार्य
यह सभी रूटीन के कार्य हैं। जहां जरूरत है, वहीं मरम्मत हो रही है। यह हर साल होती है। यदि पैसों की बर्बादी का कोई मामला है तो उसका पता करेंगे। – सुरेंद्र चौहान, महापौर नगर निगम शिमला
