सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक न्यूज़ रूम (चंडीगढ़)
चंडीगढ़: देश के स्वास्थ्य तंत्र और दवा बाजार में चल रहे एक खौफनाक और बेरहम खेल ने अब देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट को भी झकझोर कर रख दिया है। हिमाचल प्रदेश के बद्दी से लेकर देश के तमाम बड़े फार्मा हबों—बेंगलुरु, पुणे, मुंबई, हैदराबाद और अहमदाबाद—में फैक्ट्रियों से निकलने वाली जीवनरक्षक दवाइयां आम मरीजों तक पहुँचते-पहुंचते अपनी मूल कीमत से 2,000% से लेकर 6,600% तक महंगी हो जाती हैं। अस्पताल के आईसीयू में तड़पते मरीजों की सांसों पर यह मुनाफाखोरी किसी कत्लेआम से कम नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में खुला दवा माफिया का काला चिट्ठा
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (किशन चंद जैन बनाम एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड, रिट याचिका संख्या 1098/2023) दायर की गई है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की बेंच के समक्ष जब यह मामला पहुँचा, तो अदालत ने तीखे शब्दों में चिंता जताई कि आखिर गैर-पेटेंट और जरूरी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की कोई ठोस सीमा क्यों नहीं तय की जा रही है। याचिका में यह मुख्य रूप से उठाया गया है कि दवा कंपनियों और बिचौलियों का यह सिंडिकेट मरीजों की गाढ़ी कमाई और जमीन-जायदाद तक बिकवाकर अपनी तिजोरियां भर रहा है, जबकि स्वास्थ्य नियामक (NPPA) और सरकारें आंखें मूंदकर बैठी हैं।
रेट फिक्सिंग का मकड़जाल: आखिर कौन तय करता है एमआरपी?
सवाल यह है कि हिमाचल प्रदेश के बद्दी, कर्नाटक के बेंगलुरु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना (हैदराबाद), महाराष्ट्र (मुंबई, पुणे, औरंगाबाद) और गुजरात के औद्योगिक क्षेत्रों में जब दवाइयां बनती हैं, तो इनका मूल्य निर्धारण कौन करता है?
एसी कमरों में बैठे सिंडिकेट के नुमाइंदे कागजी लागत कम दिखाकर एमआरपी पर कई गुना मुनाफा छाप देते हैं। इसके बाद बाजार में ‘डिस्काउंट’ का ढोंग रचा जाता है—दामों पर 30% या 40% छूट का झांसा देकर ग्राहकों को यह अहसास कराया जाता है कि उन्हें फायदा मिला है, जबकि असलियत में लागत से कई गुना ज्यादा वसूली जारी रहती है।
कलेजा चीर देने वाले लूट के आंकड़े
देशभर के बाजारों में बिकने वाली इन चुनिंदा जरूरी दवाओं के आंकड़े सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी हैं:
बूफी पोल (Boufi Pole) इंजेक्शन (संक्रमण के इलाज में उपयोग):
रिटेलर की खरीद कीमत: मात्र ₹74
मरीज़ के लिए तय MRP: ₹4,981
मुनाफा मार्जिन: पूरे 6,631%!
टैली प्रेसिड (Tally Presid) इंजेक्शन (आपातकालीन ब्लीडिंग रोकने की दवा):
रिटेलर की खरीद कीमत: मात्र ₹56
मरीज़ के लिए तय MRP: ₹3,050 से अधिक
मुनाफा मार्जिन: 5,346% (53 गुना से ज्यादा)
पॉलिसिलिन सोडियम (Polycillin Sodium) इंजेक्शन (गंभीर एंटीबायोटिक):
रिटेलर की खरीद कीमत: ₹210
मरीज़ के लिए तय MRP: ₹9,702
मुनाफा मार्जिन: 4,520%
टॉक्सो केयर (Toxocare) (कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की दवा):
रिटेलर की खरीद कीमत: ₹1,000
मरीज़ के लिए तय MRP: ₹21,618
मुनाफा मार्जिन: 2,000% से अधिक
डॉक्टर का काम इलाज, पर सिस्टम की मिलीभगत पर सवाल
चिकित्सकों का मुख्य कार्य मरीज की जांच करना, सर्जरी करना और सही उपचार लिखना है। परंतु जब पर्ची पर लिखी जाने वाली दवाइयां ही भारी-भरकम मुनाफाखोरी और कई बार घटिया गुणवत्ता वाली होंगी, तो गरीब मरीज का सही इलाज कैसे संभव होगा?
आज देश के विभिन्न हिस्सों में तमाम मुद्दों पर प्रदर्शन और हड़तालें हो रही हैं, लेकिन आम आदमी की जीवन-मरण से जुड़ी इस लूट पर ड्रग कंट्रोलर्स (Drug Controllers) और ड्रग इंस्पेक्टरों की पूरी फौज खामोश बैठी है। केंद्र सरकार से लेकर विभिन्न राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और स्वास्थ्य सचिवों (Health Secretaries) को राजनीति से ऊपर उठकर इस पर जवाब देना होगा। इंसान की जिंदगी में दो ही जगह सबसे ज्यादा आर्थिक शोषण होता है—एक अदालतों के चक्कर और दूसरी अस्पतालों के खर्चे।
’पंजाब दस्तक’ का संकल्प
बद्दी से लेकर देश के अन्य प्रमुख फार्मा हबों तक फैले इस रेट-फिक्सिंग सिंडिकेट और भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ ‘पंजाब दस्तक’ का यह अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक इन मुनाफाखोरों और सौदागरों पर कठोर कानूनी शिकंजा नहीं कसा जाता।
देखते रहें पंजाब दस्तक — सच की आवाज, आपकी आवाज।
