किसाऊ बांध परियोजना और हिमाचल को सालाना 600 करोड़ का लाभ

किसाऊ बांध परियोजना पर दिल्ली में मंगलवार को ऐतिहासिक महाकरार: पूर्व से वर्तमान तक के सतत प्रयासों का सुखद परिणाम, हिमाचल की झोली में सालाना ₹600 करोड़ का वरदान

Spread the love

​सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
​विशेष संपादकीय रिपोर्ट | नई दिल्ली / शिमला:


​गणेश उत्सव के पावन माहौल और संकटमोचन हनुमान जी के प्रिय वार यानी मंगलवार की सुबह समूचे उत्तर भारत के जल प्रबंधन, अंतरराज्यीय समन्वय और आर्थिकी के लिए एक युगांतरकारी अध्याय की साक्षी बनने जा रही है। फाइल-दर-फाइल करीब दो दशकों तक दबी रही राष्ट्रीय महत्व की महत्वाकांक्षी किसाऊ जलविद्युत व सिंचाई परियोजना अब धरातल पर आकार लेने जा रही है।
​कल देश की राजधानी नई दिल्ली में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल और केंद्रीय ऊर्जा मंत्री की अगुवाई में ऐतिहासिक एमओयू (MoU) पर हस्ताक्षर होंगे। इस साझा महामंच पर हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के साथ दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मौजूद रहेंगे। यह महाकरार जहां मैदानी राज्यों की प्यास बुझाएगा, वहीं हिमाचल प्रदेश के खजाने को सालाना ₹600 करोड़ का बड़ा आर्थिक संबल देगा।


​इस ऐतिहासिक अवसर पर हमारे शास्त्रों की यह कालजयी उक्ति सटीक बैठती है:
​”अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम्।
अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः॥”
(अर्थात्: संसार में कोई भी अक्षर ऐसा नहीं जो मंत्र न बन सके, कोई वनस्पति ऐसी नहीं जो औषधि न हो और कोई भी संसाधन व्यर्थ नहीं होता; आवश्यकता केवल उस कुशल नेतृत्व व ‘योजक’ की होती है जो सही समय पर उसका सही उपयोग करना जानता हो।)


​धूमल-जयराम से लेकर सुक्खू तक: सतत प्रयासों और समय के चक्र की जीत
किसी भी विशाल राष्ट्रीय परियोजना की नींव रातों-रात नहीं रखी जाती, बल्कि यह विभिन्न सरकारों के निरंतर संघर्ष, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और नीतिगत निरंतरता का सुखद परिणाम होती है। किसाऊ परियोजना को आज इस मुकाम तक पहुंचाने में हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्रियों का योगदान भी बेहद सराहनीय और उल्लेखनीय रहा है।
​प्रो. प्रेम कुमार धूमल का शुरुआती संघर्ष: पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने अपने कार्यकाल में इसे राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित करवाने से लेकर अंतरराज्यीय समन्वय की पहली मजबूत ईंट रखी थी। उन्होंने केंद्र और पड़ोसी राज्यों के साथ लगातार बैठकें कर परियोजना को प्राथमिकताओं में बनाए रखा।


​जयराम ठाकुर की निरंतर पैरवी: पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के कार्यकाल में भी इस मसले पर जबर्दस्त मेहनत हुई। उन्होंने पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ दर्जनों दौर की बैठकें कीं, फाइलों की हर अड़चन को दूर करने के लिए पूरी ताकत झोंकी और मामले को कभी ठंडे बस्ते में नहीं जाने दिया।


​समय का अपना एक चक्र होता है—‘कार्य तभी परिपक्व होकर फल देता है जब उसका सही समय आता है’। पूर्व सरकारों द्वारा तैयार की गई इसी मजबूत जमीन पर आगे बढ़ते हुए मौजूदा मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस मामले को अंतिम मुकाम तक पहुंचाया। सीएम सुक्खू ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के समक्ष हिमाचल के वित्तीय हितों का केस जिस आक्रामकता और तार्किकता के साथ रखा, उसी का नतीजा है कि आज हिमाचल के हक में यह ऐतिहासिक फैसला संभव हो पाया है।


​भाखड़ा से भी 10 मीटर ऊंचा होगा बांध, 97 हजार हेक्टेयर खेतों की बुझेगी प्यास
इंजीनियरिंग के लिहाज से किसाऊ बांध देश का नया गौरव बनेगा। अब तक देश के सबसे ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांधों में शुमार भाखड़ा नांगल बांध (226 मीटर) ऊंचाई के मामले में दूसरे पायदान पर आ जाएगा, क्योंकि टोंस नदी पर बनने वाले किसाऊ बांध की ऊंचाई करीब 236 मीटर होगी।
​1324 मिलियन क्यूबिक लीटर जलभंडार: परियोजना के विशाल जलाशय में 1324 मिलियन क्यूबिक लीटर पानी का अथाह संचय होगा।
​अन्नदाताओं को नई जिंदगी: इस जलराशि से उत्तर भारत के 97,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि क्षेत्र को नियमित सिंचाई की सुविधा मिलेगी।


​जल बंटवारे का अनुपात: हरियाणा सबसे बड़ा हिस्सेदार
परियोजना के कुल जल प्रवाह में राज्यों का कोटा इस प्रकार तय हुआ है:
​हरियाणा: कुल उपलब्ध जल का सबसे बड़ा हिस्सा यानी 47.18 प्रतिशत अकेले हरियाणा को आवंटित होगा।
​उत्तर प्रदेश: दूसरे सबसे बड़े लाभार्थी के तौर पर यूपी को 3.71 बिलियन क्यूबिक पानी की आपूर्ति होगी।
​राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली: पेयजल किल्लत से जूझने वाली दिल्ली के हिस्से 0.724 बिलियन क्यूबिक पानी आएगा।
​इसके साथ ही राजस्थान और उत्तराखंड की सूखी धरती को भी इस जल-बैंक से भरपूर संबल मिलेगा।


​लागत का पेंच सुलझा: ₹800 करोड़ की बचत, ₹2000 करोड़ का भार लाभार्थी राज्यों पर
परियोजना के दो हिस्से हैं—वाटर कंपोनेंट और पावर कंपोनेंट। पिछले 8 वर्षों से विवाद यह था कि पावर कंपोनेंट की लागत का भारी बोझ अकेले हिमाचल क्यों उठाए।
​मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने केंद्रीय कृषि और ऊर्जा मंत्रियों की बैठकों में स्पष्ट तर्क दिया कि जमीन और नदियां हिमाचल की हैं, विस्थापन का दर्द प्रदेश झेलेगा और पानी का शत-प्रतिशत लाभ मैदानी राज्य लेंगे; ऐसे में हिमाचल पर ₹800 करोड़ का अंशदान थोपना न्यायसंगत नहीं है। केंद्र सरकार ने इस ठोस दलील को माना। अब पानी का उपभोग करने वाले राज्य ही हिमाचल के हिस्से की ₹2000 करोड़ की पावर कंपोनेंट लागत को वहन करेंगे।


​100 करोड़ यूनिट मुफ्त बिजली और हर साल ₹600 करोड़ का राजस्व
इस ऐतिहासिक समझौते के तहत हिमाचल प्रदेश को बिना एक भी पैसा खर्च किए हर वर्ष 100 करोड़ यूनिट बिजली बिल्कुल मुफ्त मिलेगी, जिसका बाजार मूल्य करीब ₹600 करोड़ बैठता है।
​मुख्यमंत्री के प्रधान मीडिया सलाहकार नरेश चौहान ने कहा कि यह निर्णय प्रदेश के दीर्घकालिक वित्तीय स्वाभिमान को मजबूत करेगा। चौहान ने रेखांकित किया कि चाहे शिमला के ऐतिहासिक वाइल्ड फ्लावर हॉल को राज्य के अधीन लाना हो, जलविद्युत परियोजनाओं से रॉयल्टी का अधिकार सुनिश्चित करना हो या फिर किसाऊ के आठ साल पुराने अवरोध को समाप्त करना—यह नेतृत्व दर्शाता है कि हिमाचल के अधिकारों की रक्षा हर मंच पर प्राथमिकता से की जा रही है।
​मंगलवार को दिल्ली का यह साझा मंच सहकारी संघवाद का वह जीवंत उदाहरण बनेगा, जहां पूर्व से लेकर वर्तमान तक के साझा प्रयासों ने उत्तर भारत की प्यास और ऊर्जा की जरूरत का स्थायी समाधान निकाल दिया है।


​उत्तर भारत की सबसे तेज, निष्पक्ष और सटीक पत्रकारिता के लिए आपके अपने भरोसेमंद चैनल ‘पंजाब दस्तक’ को लाइक करें, शेयर करें, फॉलो करें और सब्सक्राइब करना न भूलें। हर खबर पर पैनी नजर—देखते रहें पंजाब दस्तक!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *