हिमाचल में ‘आर्थिक तंगी’ का शोर, पर अपनों की जेब पर ‘सरकारी मेहरबानी’ का ज़ोर!

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​ईमानदार करदाताओं की जेब पर डाका, पर हुक्मरानों की सहूलियतों में बंपर बढ़ोतरी!
​लाखों लोग देते हैं इनकम टैक्स, पर सुविधाओं के नाम पर मिल रही सब्सिडी में कटौती और बंद भर्तियाँ।
​सरकारी वकीलों और सलाहकारों की फौज पर पानी की तरह बह रहा टैक्सपेयर का पैसा।


​(सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक)
​अखबारी सुर्खियाँ (पंजाब दस्तक एक्सक्लूसिव):
​शिमला: पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश इस समय वित्तीय असंतुलन और सरकारी कर्ज़ के भारी दबाव में है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस तंगी से बाहर निकलने के नाम पर सारा बोझ सिर्फ़ आम आदमी, मध्यम वर्ग, कर्मचारियों और ईमानदार करदाताओं (Taxpayers) के कंधों पर डाला जा रहा है। हिमाचल का आम नागरिक और नौकरीपेशा वर्ग अपनी मेहनत की कमाई से लाखों रुपये का इनकम टैक्स और GST सरकार के खजाने में जमा करता है। लेकिन जब सुविधाओं की बात आती है, तो सामाजिक कल्याण योजनाओं, सब्सिडी और नई पक्की भर्तियों पर ताले लटकाने की तैयारी कर ली जाती है, जबकि सत्ता के गलियारों में बैठे ओहदेदारों के शाही खर्चों पर पूरी तरह खामोशी ओढ़ ली गई है।
​श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने शासकों और शीर्ष पद पर बैठे लोगों के नैतिक धर्म व आचरण को लेकर एक अत्यंत गूढ़ एवं सार्वभौमिक संदेश प्रतिपादित किया है:


​यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

(अर्थात: श्रेष्ठ व शीर्ष पदों पर विराजमान लोग जैसा आचरण स्थापित करते हैं, सामान्य जनमानस भी उसी का अनुसरण करता है। वे जो मानदंड तय कर देते हैं, समस्त समाज उसी का अनुगमन करता है।)
​ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सरकार खुद अपने खर्चों में कटौती का उदाहरण पेश नहीं करेगी, तो टैक्स देने वाली आम जनता से कड़े फैसलों और त्याग की उम्मीद कैसे की जा सकती है?


​नीतियों में साफ़ विषमता: करदाताओं पर कड़े नियम, अपनों के लिए छूट
​प्रदेश की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में दोहरे मापदंड साफ़ झलक रहे हैं:
​मानदेय और भत्तों में उछाल: हालिया बजटीय फैसलों के ज़रिए जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों के वेतन-भत्तों में सीधे 24 फीसदी का इज़ाफा कर दिया गया। इतना ही नहीं, हर 5 साल बाद इसमें अपने-आप बढ़ोतरी का पक्का कानूनी इंतज़ाम भी कर लिया गया है।
​निगम-बोर्डों में ‘शाही’ नियुक्तियाँ: विभिन्न बोर्डों और निगमों में बिठाए गए राजनीतिक चेहरों (अध्यक्षों-उपाध्यक्षों) का मासिक मानदेय बढ़ाकर डेढ़ लाख रुपये कर दिया गया है, जो पहले की तुलना में कई गुना ज़्यादा है।
​सलाहकारों का भारी खर्च: प्रशासनिक मदद के नाम पर ओएसडी (OSD) और सलाहकारों की पूरी टोली तैनात है, जिनकी पगार और सुविधाओं पर टैक्सपेयर की गाढ़ी कमाई हर महीने पानी की तरह बहाई जा रही है।


​पंजाब दस्तक के तीखे सवाल: जवाब कौन देगा?
​1. लाखों की संख्या में इनकम टैक्स देने वाले प्रदेशवासियों को बदले में क्या मिल रहा है—नौकरियों पर पाबंदी और महँगाई?
​2. सब्सिडी और भर्तियों पर रोक सिर्फ आम जनता के लिए क्यों? क्या नेताओं और सलाहकारों के भत्तों पर कटौती नहीं हो सकती?
​3. जब 75 से 90 सरकारी वकील पहले से तैनात हैं, तो महंगे प्राइवेट वकीलों पर करदाताओं का पैसा क्यों लुटाया जा रहा है?


​राजनीतिक घमासान और विशेषज्ञों का नजरिया
​”वित्तीय घाटे की आड़ में आम टैक्सपेयर को न पीसे सरकार” — जयराम ठाकुर
पूर्व मुख्यमंत्री व नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने निशाना साधते हुए कहा, “हमारी व्यवस्था के दौरान बोर्ड-निगमों के प्रमुखों को सीमित मानदेय मिलता था, जिसे बढ़ाकर अब 1.5 लाख कर दिया गया है। दर्जनों सलाहकारों और वकीलों की फौज खड़ी कर ली गई है। सरकार को चाहिए कि वह वित्तीय अनुशासन के नाम पर आम नागरिक और गरीब की जेब पर डाका डालने के बजाय अपनी इस फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाए।”


​”कामकाज की ज़रूरतों के हिसाब से होती हैं नियुक्तियाँ” — राजेश धर्माणी
कैबिनेट मंत्री राजेश धर्माणी ने पलटवार करते हुए कहा, “प्रशासनिक और जनहित के कार्यों को गति देने के लिए ही सलाहकारों और अध्यक्षों की तैनाती की जाती है, जो पहले की सरकारों में भी होती रही है। राज्य पर इस वक्त 6,000 करोड़ रुपये के वित्तीय घाटे का दबाव है। व्यवस्था सुधार के लिए सभी पक्षों का सहयोग ज़रूरी है और गैर-ज़रूरी खर्चों पर लगाम लगाई जा रही है।”


​”आर्थिक बदहाली के लिए नीतियाँ और अफ़सरशाही दोनों उत्तरदायी” — प्रदीप चौहान
पंजाब दस्तक से बातचीत में पूर्व आर्थिक सलाहकार प्रदीप चौहान ने कहा, “प्रदेश की इस माली हालत के लिए सिर्फ़ परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि राजनीतिक फैसले और नौकरशाही दोनों ज़िम्मेदार हैं। वित्त विभाग को चाहिए कि वह सिर्फ आम जनता की सुविधाओं पर कैंची चलाने के बजाय इन भारी-भरकम सलाहकारों और ओहदेदारों के भत्तों में कटौती के ठोस प्रस्ताव तैयार करे।”


​पंजाब दस्तक का विशेष विश्लेषण और हमारी राय
​कर्मचारियों को पुरानी पेंशन (OPS) का हक़ तो मिला, लेकिन उसके बाद से नई पक्की नौकरियों के दरवाज़े लगभग बंद से हो गए हैं। परीक्षाओं के नतीजे अटके हैं और नए पदों का सृजन थम गया है। ‘पंजाब दस्तक’ का साफ़ मानना है कि टैक्स देने वाली जनता के हितों की रक्षा के लिए आर्थिक सुधारों की शुरुआत सबसे पहले शीर्ष राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर से होनी चाहिए, ताकि आम जनता का व्यवस्था पर भरोसा बना रहे।


​’पंजाब दस्तक’ की विशेष अपील व आपकी राय:
​क्या ईमानदारी से टैक्स देने वाले आम नागरिक के साथ यह अन्याय नहीं है?
क्या सरकार को फिजूलखर्ची रोककर सलाहकारों की पगार घटानी चाहिए? नीचे कमेंट बॉक्स (Comment Box) में अपनी राय ज़रूर लिखें!
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