विशेष समाचार सेवा: सुरेंद्र राणा (ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक)
सोलन। हिमाचल प्रदेश में सरकारी काम करवाने के नाम पर रिश्वतखोरी के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। सोलन जिले से एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ ज़मीन के बंटवारे यानी ‘तकसीम’ की प्रक्रिया पूरी करने के बदले महज ₹1,500 की रिश्वत मांगने के आरोप में बंदोबस्त विभाग के एक पटवारी के खिलाफ विजिलेंस में एफआईआर दर्ज की गई है। हालांकि, इतने कम पैसों को लेकर अब कई तरह के गंभीर सवाल भी खड़े होने लगे हैं।
क्या है पूरा मामला?
शिकायतकर्ता विकास कुमार के अनुसार, उन्हें अपनी ज़मीन की तकसीम (बंटवारा) का काम करवाना था। आरोप है कि बंदोबस्त विभाग में तैनात पटवारी अंकुर ने इस काम को आगे बढ़ाने के एवज में ₹1,500 की मांग की। हैरानी की बात यह है कि रिश्वत की यह रकम नकद लेने की बजाय गूगल पे (Google Pay) के माध्यम से भेजने को कहा गया, जिसके लिए पटवारी ने अपना मोबाइल नंबर भी दिया था।
शिकायतकर्ता ने इस बातचीत से जुड़ी ऑडियो रिकॉर्डिंग राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (विजिलेंस) को सौंप दी। इसके आधार पर 3 नवंबर को सोलन विजिलेंस थाने में आरोपी पटवारी अंकुर के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत एफआईआर दर्ज कर ली गई है। मामले में फिलहाल जांच जारी है।
₹1,500 की रिश्वत पर उठ रहे बड़े सवाल: भ्रष्टाचार या फंसाने की साजिश?
इस मामले के सामने आने के बाद प्रशासनिक हलकों में और आम जनता के बीच चर्चाओं का बाजार गर्म है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या महज़ ₹1,500 जैसी छोटी सी राशि के लिए कोई पटवारी खुलेआम रिश्वत मांगेगा?
कई बार आम व्यावहारिक जीवन में ऐसा भी देखा जाता है कि लोग आपस में पैसों का आदान-प्रदान कर लेते हैं—जैसे किसी के पास नकद न होने पर ऑनलाइन ट्रांसफर करवा लेना और बदले में नकद ले लेना, या किसी अन्य लेन-देन का हिसाब। ऐसे में यह सवाल भी लाजिमी है कि क्या ₹1,500 का यह मामला वाकई भ्रष्टाचार का है, या फिर इसके पीछे किसी रंजिश के तहत पटवारी को फंसाने की कोई सोची-समझी चाल है?
गहन जांच की दरकार:
डीजीपी सुबोध तिवारी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भ्रष्टाचार के मामलों में कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी, जो कि सराहनीय है। लेकिन पंजाब दस्तक का यह मानना है कि ₹1,500 जैसी मामूली रकम के इस मामले की पुलिस और विजिलेंस को बेहद गहराई और निष्पक्षता से जांच करनी चाहिए। किसी की नौकरी और आजीविका का सवाल दांव पर है, इसलिए यह दूध का दूध और पानी का पानी होना बेहद जरूरी है कि यह सचमुच घूसखोरी थी या फिर किसी साजिश का हिस्सा।
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