प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल और OROP की संसद में पहली आवाज

OROP की संसद में पहली ललकार, पर श्रेय से कोसों दूर: ‘सड़कों के मसीहा’ प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल के उस ऐतिहासिक संघर्ष, सख्त प्रशासन और बेदाग सियासत की दास्तान

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​हमीरपुर (सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक):
देशभर के लाखों पूर्व सैनिकों और वीरभूमि हिमाचल के फौजी परिवारों के हक से जुड़े सबसे बड़े मुद्दे ‘वन रैंक-वन पेंशन’ (OROP) की पहली आधिकारिक गूंज संसद के पटल पर उठाने का ऐतिहासिक श्रेय पूर्व मुख्यमंत्री प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल को जाता है। 1990 के लोकसभा के संसदीय रिकॉर्ड इस बात के जीवंत गवाह हैं कि प्रोफेसर धूमल ने उस दौर में संसद के भीतर पूरी संजीदगी और आक्रामकता के साथ ओआरओपी लागू करने की पुरजोर मांग दर्ज करवाई थी। हालांकि, ओआरओपी का वास्तविक क्रियान्वयन बाद में केंद्र सरकार की प्रक्रिया और निर्णयों से जुड़ा विषय रहा और भारत सरकार ने नवंबर 2015 में रक्षा बलों के लिए ओआरओपी के कार्यान्वयन की अधिसूचना जारी की।


​फर्ज निभाया, कभी राजनीतिक श्रेय की होड़ नहीं की
आज की सियासत में जहां छोटे-छोटे कदमों का ढिंढोरा पीटने की होड़ मची रहती है, वहीं प्रोफेसर धूमल की सादगी और कर्तव्यनिष्ठा देखिए कि संसद में सबसे पहले इस मुद्दे को उठाने के बावजूद उन्होंने कभी इसका व्यक्तिगत या राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिश नहीं की। जब भी यह विषय उठा, वे हमेशा यही कहते रहे कि फौजी भाइयों और हिमाचल की जनता ने उन्हें वोट देकर संसद भेजा था, इसलिए उनके अधिकारों की आवाज उठाना कोई एहसान नहीं बल्कि उनका नैतिक फर्ज था। श्रेय लेने की ओछी राजनीति से दूर रहकर केवल अपना कर्तव्य निभाना ही प्रोफेसर धूमल को बाकी राजनेताओं से अलग कतार में खड़ा करता है।


​पत्रकारों और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सच्चे संरक्षक
प्रोफेसर धूमल की एक बड़ी विशेषता मीडिया और पत्रकारों के प्रति उनका बेहद आदरणीय दृष्टिकोण रही। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को वे केवल खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की नब्ज समझने वाला सच्चा आईना मानते रहे हैं। शिमला के सचिवालय से लेकर जिला मुख्यालयों और ग्रामीण अंचलों तक काम करने वाले कलमकारों से उनका संवाद हमेशा पारिवारिक रहा। हर पत्रकार को नाम से जानना, उनके कठिन परिश्रम का सम्मान करना और तीखी आलोचना को भी सहज भाव से सकारात्मक सुधार के लिए स्वीकारना उनकी राजनीतिक शुचिता का प्रमाण रहा।


​दिन-रात सिर्फ हिमाचल का चिंतन और प्रशासनिक हनक
सत्ता में रहे हों या विपक्ष में, प्रोफेसर धूमल की हर सांस और हर सोच केवल और केवल हिमाचल प्रदेश के चौमुखी विकास के इर्द-गिर्द घूमती रही। वे जितने आम जनता और कार्यकर्ताओं के लिए सहज, सुलभ और कोमल रहे, प्रशासनिक बैठकों में उतने ही सख्त और तेज-तर्रार प्रशासक साबित हुए। जब शिमला से उनका हेलीकॉप्टर हमीरपुर, ऊना या चंबा के लिए उड़ान भरता, तो जिलों के अफसरों में अनुशासन और काम को लेकर एक स्वाभाविक असर नजर आता था। प्रोफेसर साहब का स्पष्ट रुख था—अफसरशाही जनता की सेवा के लिए है। उनके मुंह से निकला शब्द नौकरशाही के लिए ‘पत्थर की लकीर’ माना जाता था।


​’सड़कों के मसीहा’ और कड़े ऐतिहासिक फैसले
पहाड़ों के दुर्गम गांवों तक डामर की सड़कें पहुंचाकर विकास की रोशनी फैलाने के कारण ही जनता ने उन्हें ‘सड़कों के मसीहा’ का खिताब दिया। उनका दौरा तय होते ही लोक निर्माण विभाग (PWD) युद्धस्तर पर सक्रिय हो जाता था। उन्होंने सड़कों का ऐसा संजाल बिछाया, जिसने प्रदेश की बागवानी, पर्यटन और आर्थिकी की तकदीर बदल दी। वहीं पर्यावरण और सादगी के लिए ‘ग्रीन मंडे’ जैसा कड़ा फैसला लेकर उन्होंने नजीर पेश की, जहां सोमवार को सचिवालय में अफसरों के साथ-साथ मुख्यमंत्री खुद भी पैदल ही दफ्तर पहुंचते थे।


​विधानसभा के तेवर और राजा वीरभद्र सिंह संग गरिमापूर्ण दोस्ती
विधानसभा के भीतर प्रोफेसर धूमल की संसदीय गरिमा देखने लायक होती थी। सत्ता में मुख्यमंत्री रहते हुए उनके तर्कों में ऐसी धार होती थी कि विपक्षी खेमा खामोशी से सुनता था; वहीं विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने कभी ओछी राजनीति या सिर्फ नारेबाजी का सहारा नहीं लिया। छह बार के मुख्यमंत्री स्वर्गीय राजा वीरभद्र सिंह के साथ उनका कड़ा सियासी मुकाबला रहा, मगर दोनों दिग्गजों के बीच की व्यक्तिगत दोस्ती, आपसी शालीनता और सम्मान पूरे देश की राजनीति के लिए मिसाल बनी रही।


​समीरपुर: दलगत सीमाओं से परे ‘आशीर्वाद’ का धाम
समीरपुर आज सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि हिमाचल की राजनीतिक यात्रा की पहचान बन चुका है। चाहे सत्ता किसी की भी हो, समीरपुर स्थित उनके आवास पर हर दल के नेताओं का पहुंचना उनकी स्वीकार्यता को दर्शाता है। इसका जीवंत उदाहरण जनवरी 2023 में दिखा, जब मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सरकार बनने के बाद समीरपुर पहुंचकर प्रोफेसर धूमल के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और उन्हें टोपी व शॉल से सम्मानित किया। यह साबित करता है कि राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन प्रोफेसर धूमल के प्रति मनभेद किसी का नहीं रहा।


​आपकी राय हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है:
पूर्व मुख्यमंत्री प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल जी द्वारा संसद में OROP की पहली आवाज उठाने, कभी श्रेय न लेने की उनकी सादगी, मीडिया के प्रति उनके सम्मान और इस विशेष रिपोर्ट पर आपकी क्या राय है? अपनी बेबाक और विवेकपूर्ण राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें। हमें आपके विचारों का इंतजार रहेगा। देखते रहें पंजाब दस्तक।
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