सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
सिनेमाई पर्दे की गूंजती हुंकार—‘झुकूंगा नहीं…’ आज हिमाचल प्रदेश की जल-नीति और सियासत की सबसे सटीक हकीकत बन चुकी है। सिरमौर और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी पर आकार ले रही करीब 15,000 करोड़ रुपये की किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर दशकों से जो दबाव हिमाचल पर बनता आया था, वह शिमला की अडिग इच्छाशक्ति के आगे ढह गया।
परियोजना में 680 मीटर चौड़े विशाल बांध और 32 किलोमीटर लंबी झील के निर्माण से कई राज्यों की प्यास तो बुझेगी, लेकिन जब 1,500 मिलियन यूनिट्स बिजली उत्पादन के पावर कंपोनेंट का 50% खर्च हिमाचल पर थोपने की तैयारी हुई, तो मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने दस्तखत करने से दो टूक इनकार कर दिया। मुख्यमंत्री की सीधी दलील थी—जब डूब क्षेत्र और विस्थापन हमारा है, पानी हमारा बहेगा, तो 600 करोड़ का कर्ज हिमाचल क्यों ढोए? नतीजतन, दबाव ऐसा बना कि लाभार्थी राज्य दिल्ली और राजस्थान को यह पूरा खर्च अपने कंधों पर उठाना पड़ा। बिना एक भी धेला लगाए, समझौते की बिजली बेचकर हिमाचल के खजाने में सालाना 1,200 से 1,500 करोड़ (आगे चलकर 2,000 करोड़ तक) का शुद्ध मुनाफा आना अब पक्का हो चुका है।
श्रेय लेने की सियासी जंग: ‘तीन ठाकुर’ आमने-सामने
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू (साहसिक नेतृत्व): सत्ता पक्ष और समर्थकों का साफ कहना है कि यदि मुख्यमंत्री ने मेज पर ‘पुष्पा’ वाले तेवर न दिखाए होते, तो प्रदेश पर 600 करोड़ का अनावश्यक बोझ लद जाता। बीबीएमबी और पोंग डैम विस्थापितों के पुराने कड़वे अनुभवों से सीख लेते हुए सीएम सुक्खू ने पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के उस ऐतिहासिक विजन को जमीन पर उतारा है, जिसमें राज्य के हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर कम से कम 30% रॉयल्टी की पैरवी की गई थी।
अनुराग ठाकुर (केंद्र की ढाल): पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने इस पूरी वित्तीय जीत का सेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सिर बांधा है। उनका तर्क है कि 90% जल घटक का खर्च केंद्र की मोदी सरकार वहन कर रही है और दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व के आशीर्वाद व सीधे दखल के बिना पहाड़ी राज्य के अधिकारों की ऐसी रक्षा मुमकिन नहीं थी।
जयराम ठाकुर (संघर्ष की नींव): पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर का दावा है कि इस मसले को उनकी भाजपा सरकार ने युद्धस्तर पर उठाया था। उनका कहना है कि उस दौर में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आप और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार के अड़ियल रवैये के चलते समझौता सिरे नहीं चढ़ पाया था; आज बदली परिस्थितियों में हिमाचल को जो मिला है, उसकी मजबूत नींव पूर्व भाजपा सरकार के प्रयासों से ही तैयार हुई थी।
देवभूमि के स्वाभिमान की जीत
श्रेय चाहे दिल्ली की मोदी सरकार के खाते में दर्ज हो, पूर्व सरकार की फाइलों में तलाशा जाए या फिर मौजूदा मुख्यमंत्री के गैर-समझौतावादी तेवर के नाम रहे—धरातल का सच यही है कि जीत हिमाचल के जल अधिकारों और स्वाभिमान की हुई है। बिना वित्तीय जोखिम के हर साल मिलने वाला हजारों करोड़ का राजस्व हिमाचल को आत्मनिर्भर राज्य बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
दर्शकों से सीधी अपील:
इस बड़ी खबर और हिमाचल के इस ऐतिहासिक फैसले पर आपकी क्या राय है? आपको क्या लगता है, इस जीत का असली श्रेय किसे जाना चाहिए? अपने विचार और कमेंट्स नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें, हमें आपकी प्रतिक्रिया का बेसब्री से इंतजार रहेगा।
ऐसी ही सटीक, निष्पक्ष और बेबाक खबरें देखने के लिए देखते रहें—पंजाब दस्तक, सच की आवाज, आपकी आवाज!

