कंगना रनौत के समर्थन में मंडी की जनता

अफसरशाही की लेटलतीफी पर बिफरी जनता: विक्रमादित्य के बाद अब कंगना के तेवरों के समर्थन में उतरा मंडी से लेकर ट्राइबल बेल्ट

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​मंडी (हिमाचल प्रदेश)
ग्राउंड रिपोर्ट: उमांशी राणा, वरिष्ठ पत्रकार | पंजाब दस्तक


​मंडी संसदीय क्षेत्र में सांसद कंगना रनौत के कड़े तेवरों के बाद प्रशासनिक गलियारों में मचा घमासान लगातार गहराता जा रहा है। बीडीओ (खंड विकास अधिकारी) संघ द्वारा सांसद निधि के कार्यों के बहिष्कार के ऐलान के बाद अब आम जनता खुलकर मैदान में उतर आई है। ‘पंजाब दस्तक’ की ग्राउंड रिपोर्ट में मंडी सदर से लेकर रामपुर और दूरदराज के पूरे ट्राइबल (जनजातीय) इलाकों तक जनता का रुख बिल्कुल साफ है—अफसरों की मनमानी और फाइलों पर कुंडली मारकर बैठने की आदत अब बर्दाश्त नहीं होगी।


​बीडीओ संघ का बहिष्कार और मान-सम्मान की दुहाई
सांसद कंगना रनौत द्वारा समीक्षा बैठक में विकास कार्यों में देरी पर तीखे सवाल पूछे जाने से नाराज बीडीओ संघ ने मंडी जिले में सांसद निधि के विकास कार्यों में सहयोग न करने का फैसला लिया है। संघ का तर्क है कि अधिकारी जमीनी स्तर पर विकास की रीढ़ की हड्डी हैं और ऐसे बयानों से उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंची है। संघ ने दो टूक कहा है कि जब तक सांसद की ओर से सकारात्मक और सम्मानजनक संवाद की पहल नहीं होती, तब तक वे काम नहीं करेंगे। संघ ने इस गतिरोध को सुलझाने के लिए राज्य सरकार से दखल देने की मांग की है।


​विक्रमादित्य के तेवरों की नजीर और जनता का आक्रोश
हिमाचल में अफसरों की सुस्ती पर जनप्रतिनिधियों का गुस्सा नया नहीं है। इससे पहले प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह भी अपने दौरों के दौरान पीडब्ल्यूडी अधिकारियों की ढिलाई पर कड़ा रुख अपना चुके हैं। विक्रमादित्य सिंह ने भी लापरवाह अफसरों को मंच से कड़ी फटकार लगाई थी और कई अधिकारियों को सीधे कारण बताओ नोटिस थमा दिए थे। जनता का कहना है कि जब काम अटके रहेंगे, तो जनप्रतिनिधि सवाल पूछेगा ही।


​मंडी से रामपुर और पूरे ट्राइबल इलाकों से ग्राउंड रिपोर्ट
‘पंजाब दस्तक’ ने मंडी सदर, रामपुर और समूचे ट्राइबल क्षेत्रों के ग्रामीणों, महिलाओं, बुजुर्गों और नौजवानों से सीधे बातचीत की, जहां लोगों ने अफसरों की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए:
​घंटों दफ्तरों के चक्कर, लटकती फाइलें: ट्राइबल क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों के लोगों का कहना है कि वे अपनी समस्याएं लेकर अपने चुने हुए विधायक या सांसद के पास ही जाएंगे। जब आम नागरिक सरकारी दफ्तरों में जाता है, तो अधिकारी उनकी बात तक नहीं सुनते। फाइलों को महीनों तक इधर से उधर घुमाया जाता है।


​जनता के प्रति जवाबदेही जनप्रतिनिधि की: लोगों का स्पष्ट कहना है कि मुख्यमंत्री, मंत्री या सांसद का काम केंद्र और राज्य से बजट लाना है। सांसद जनता के वोट से चुनकर आती हैं, इसलिए वे जनता और मीडिया के प्रति जवाबदेह हैं, न कि बंद कमरों में बैठे अफसर। आपदा और त्रासदी के बाद यदि केंद्र का पैसा जमीन पर खर्च नहीं होगा, तो जनप्रतिनिधि का नाराज होना पूरी तरह जायज है।


​लाखों की सैलरी, गाड़ियां और सहूलियतें: जनता ने बीडीओ संघ के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि अधिकारियों को सरकार से लाखों रुपये का वेतन, सरकारी गाड़ियां, चपरासी और पूरा प्रशासनिक अमला मिलता है। जब डीए (DA) या वेतनमान की बात आती है, तो संघ बनाकर तुरंत आवाज उठाई जाती है, लेकिन जब जनता के काम का हिसाब मांगा जाए, तो बहिष्कार का रास्ता चुन लिया जाता है।
​काम करें या रास्ता छोड़ें: स्थानीय नौजवानों और ग्रामीणों का साफ कहना है कि प्राइवेट सेक्टर में पढ़े-लिखे युवाओं को दिन-रात कड़ी मेहनत के लिए दिल्ली, बेंगलुरु, नोएडा और पुणे भटकना पड़ता है। अगर अफसर सरकारी तनख्वाह लेकर भी काम करने को तैयार नहीं हैं, तो वे अपनी कुर्सियां छोड़ें; लाखों योग्य और शिक्षित युवा पूरी निष्ठा से काम करने के लिए तैयार बैठे हैं।


​पंजाब दस्तक का विशेष नजरिया: गरिमा और संवाद भी जरूरी
इस पूरे मामले पर ‘पंजाब दस्तक’ की विशेष पड़ताल का यह भी मानना है कि सिक्के के दोनों पहलुओं को देखना जरूरी है। अधिकारी और कर्मचारी प्रदेश और देश के विकास की रीढ़ की हड्डी होते हैं, उनके बिना कोई भी योजना धरातल पर नहीं उतर सकती। अधिकारियों का भी अपना मान-सम्मान और गरिमा होती है। यद्यपि सांसद का गुस्सा जनता के रुके हुए कामों के प्रति था, लेकिन समीक्षा बैठक में जिस ऊंची आवाज और कड़े लहजे में बात की गई, उससे थोड़ा बचा जा सकता था।


​जनप्रतिनिधियों के पास प्रशासनिक ढिलाई से निपटने के कई वैधानिक तरीके होते हैं—जैसा कि मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने किया था कि लापरवाही बरतने वालों को सीधे नोटिस दिए जाएं, प्रशासनिक जांच बैठाई जाए या नियमानुसार चार्जशीट की जाए। माननीय सांसदों, मंत्रियों और विधायकों को भी सार्वजनिक रूप से संवाद करते समय अपनी भाषा और गरिमा का ध्यान रखना चाहिए, ताकि प्रशासनिक व्यवस्था और लोकतंत्र का संतुलन बना रहे।


​आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है
सांसद कंगना रनौत के कड़े तेवर, बीडीओ संघ द्वारा काम बंद करने का फैसला और मंडी से लेकर ट्राइबल क्षेत्रों की जनता के इस आक्रोश पर आपकी क्या राय है? क्या अधिकारियों की जवाबदेही तय करने का यह तरीका सही था या संवाद का रास्ता दूसरा होना चाहिए था? अपने विचार और कमेंट्स नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर साझा करें। आपके कमेंट्स हमारा मनोबल बढ़ाते हैं और जनता की आवाज को मजबूती से सरकार तक पहुंचाने में मदद करते हैं।
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