हिमाचल प्रदेश से युवाओं और प्रतिभा का पलायन

पहाड़ों की पूंजी, प्रतिभा और जवानी का महा-पलायन: सचिवालय के 35 साल के तजुर्बे के बाद आधी रात को उपजी बेबाक ‘मन की बात’

Spread the love

(ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा की कलम से — सचिवालय में 35 साल की ईमानदार सेवाएं, प्रोटोकॉल ऑफिसर का लंबा सफर और अब ‘पंजाब दस्तक’ के जरिए जनता की बेबाक आवाज)


​जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
(माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊंचा है।)
​शास्त्रों का यह पावन श्लोक हमेशा रग-रग में बहता रहा, मगर आज रात के 11:30 बज चुके हैं। बाहर खामोशी पसरी है, लेकिन सीने के भीतर एक टीस, एक गहरी बेचैनी है जिसने आंखों की नींद उड़ा दी है।


​राज्य सचिवालय में पूरे 35 बरस पूरी ईमानदारी, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता के साथ सरकारी सेवाएं निभाईं। लंबे समय तक प्रोटोकॉल ऑफिसर के तौर पर जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिला। इस दायित्व के चलते देश-प्रदेश के बड़े-बड़े राजनेताओं, नामी उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और शीर्ष हस्तियों से करीब से मिलना हुआ, एक मजबूत पहचान बनी। पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय राजा वीरभद्र सिंह जी और पूर्व मुख्यमंत्री प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल जी जैसे कद्दावर नेताओं के साथ काम करने का मौका मिला। वहीं प्रदेश के मुख्य सचिव रहे वी.सी. फारका जी, वरिष्ठ आईएएस व अतिरिक्त मुख्य सचिव रहे तरुण श्रीधर जी और नरेंद्र चौहान जी जैसे नीति-निर्माताओं के साथ फाइलों को बनते, नीतियों को ढलते और सत्ता के फैसलों को बहुत करीब से देखा।

​सब कुछ देखने-परखने के बाद आज मन भर आया है। दिल में यह कसक उठती है कि सचिवालय की उस 35 साल की ईमानदार सेवा और अब पत्रकारिता के जरिए जनता की नब्ज टटोलने के बाद, क्यों न अपने अंतर्मन की यह पीड़ा सीधे सरकार और अवाम तक पहुंचाऊं? आज गरीब परिवारों के पढ़े-लिखे नौजवान दर-दर भटक रहे हैं, हाथ में डिग्रियां हैं मगर जेब में नौकरी नहीं। रोजगार के अभाव में हमारा होनहार युवा हताश होकर नशे के दलदल की तरफ धकेला जा रहा है। आखिर हमारे इस खूबसूरत प्रदेश की व्यवस्था को किसकी नजर लग गई है?


​दूसरों को क्या नसीहत दूं… जब खुद वेव एस्टेट मोहाली में आशियाना बनाया
​मैं किसी को उपदेश देने नहीं बैठा। कड़वा सच तो यह है कि खुद मैंने भी अपनी पूरी जिंदगी की गाढ़ी कमाई, पेंशन और भविष्य निधि का एक-एक पैसा लगाकर वेव एस्टेट, सेक्टर 85, मोहाली में अपना मकान बनाया। जब हमारी अपनी सरकारें अपने ही घर में बुनियादी सुविधाएं देने में असमर्थ हो जाएं, तो इंसान अपने परिवार की सलामती, बेहतर इलाज और बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए बाहर छत तलाशने को विवश हो जाता है।


​मोहाली, खरड़ और जीरकपुर में बहती हिमाचल की पूंजी: 1300-1400 करोड़ का नुकसान
​पिछले 20-30 सालों से यह पलायन निरंतर जारी है। आज हिमाचल का शायद ही कोई ऐसा परिवार बचा हो, जिसका पंजाब, हरियाणा या दिल्ली-एनसीआर में अपना फ्लैट, प्लॉट या विला न हो। पिछले 10-12 वर्षों में मोहाली और खरड़ के हलके में जो चमचमाती तरक्की दिख रही है, वह किसी जादू से नहीं, बल्कि हिमाचल की जनता के पसीने की कमाई से खड़ी हुई है।


​1300 से 1400 करोड़ का सालाना रिसाव: हिमाचल की जनता हर साल कम से कम 1300 से 1400 करोड़ रुपये बाहरी राज्यों की जीएसडीपी (GSDP) में झोंक रही है। जब कोई नागरिक बाहर जमीन या फ्लैट लेता है, तो भारी-भरकम स्टैंप ड्यूटी और रजिस्ट्री फीस बाहरी खजाने में जमा होती है। वहां बाजारों में खरीदारी, इलाज और शिक्षा पर खर्च होने वाला स्टेट जीएसटी (SGST) दूसरे सूबों को आर्थिक रूप से मजबूत करता है, जबकि हिमाचल के हिस्से केवल चढ़ता हुआ सरकारी कर्ज और वीरान होते गांव आते हैं।


​रेफर पर्ची का खौफ: खरड़-मोहाली में लोग सिर्फ इसलिए बसे क्योंकि वहां विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं हैं। पहाड़ में आज भी किसी गरीब या बुजुर्ग की रात को सांस फूल जाए, तो अस्पताल वाले सीधे ‘पीजीआई चंडीगढ़’ की पर्ची थमा देते हैं। लोग बाहर इसलिए बसे ताकि इमरजेंसी में 15 मिनट के भीतर विशेषज्ञ डॉक्टर का दरवाजा खटखटाया जा सके।


​निजी विश्वविद्यालयों में करोड़ों की फीस: हिमाचल का युवा प्राथमिक शिक्षा के बाद उच्च व तकनीकी डिग्रियों के लिए पंजाब की प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में करोड़ों रुपये फीस में बहा रहा है और माता-पिता पेट काटकर बच्चों के मुस्तकबिल के लिए यह रकम जुटा रहे हैं।


​व्हाइट-कॉलर जॉब्स से परहेज और बेंगलुरु-पुणे से विदेश तक भटकती प्रतिभा
​सरकारों ने कभी गरीब और मध्यमवर्गीय युवाओं के लिए कॉर्पोरेट और व्हाइट-कॉलर नौकरियों का माहौल बनाने की सोची ही नहीं। बजट में घोषणाएं सिर्फ ‘ई-टैक्सी चला लो’ या ‘सोलर प्लांट लगा लो’ तक सीमित कर दी जाती हैं।
​आज हालात यह हैं कि हिमाचल के हजारों प्रतिभावान आईटी और टेक्निकल प्रोफेशनल्स बेंगलुरु, पुणे, मुंबई और विदेशों (फॉरेन कंट्रीज) में जाकर मल्टीनेशनल कंपनियों की रीढ़ बने हुए हैं। जो युवा बाहर नहीं जा पाते, वे 20-25 हजार रुपये की नौकरी के लिए मोहाली और चंडीगढ़ के धक्के खा रहे हैं। दूसरी तरफ, मोहाली के एयरपोर्ट रोड पर जाकर देखिए—दो-दो, तीन-तीन कमरों से शुरू होकर करोड़ों का काम कर रहे आईटी स्टार्टअप्स की कमान हिमाचल के युवाओं के हाथों में है। वे वहां दफ्तरों का किराया दे रहे हैं, स्थानीय लोगों को रोजगार बांट रहे हैं, टैक्स और टीडीएस कटवा रहे हैं और पंजाब की जीडीपी को पंख लगा रहे हैं।


​क्या छह प्रमुख जिलों में आईटी और इंडस्ट्री हब नहीं बन सकते थे?
​सवाल यह खड़ा होता है कि जो टेक दिग्गज बेंगलुरु, पुणे या मोहाली में बैठकर दुनिया चला रहे हैं, क्या वे हिमाचल में नहीं आ सकते थे?
​हमीरपुर, धर्मशाला, मंडी, चंबा, सिरमौर और शिमला—इन प्रमुख जिलों में आईटी हब, टेक्निकल हब और आधुनिक इंडस्ट्री क्लस्टर क्यों नहीं खड़े किए जा सकते?


​अगर इन जिलों में टेक पार्क्स बनते, तो बेंगलुरु और पुणे में काम करने वाली बड़ी कंपनियां यहां अपने कैंपस खोलतीं।
​जब कंपनियां यहां आतीं, तो स्थानीय बच्चों को घर के पास लाखों का पैकेज मिलता। यहां भी आधुनिक टाउनशिप्स बनतीं, लोग नए मकान बनाते, रियल एस्टेट चमकता, स्थानीय आर्थिकी मजबूत होती और नशे की तरफ भटकती युवा पीढ़ी को एक मजबूत दिशा मिलती।


​फाइलों, सेमिनारों और दौरों में कैद विकास: धरातल पर शून्य
​अफसोस की बात यह है कि यह सब सिर्फ कागजों, सरकारी फाइलों और बड़े-बड़े फाइव-स्टार सेमिनारों तक सिमट कर रह गया है। सरकारें और अधिकारी देश-विदेश के टूरों पर जाते हैं, एमओयू (MoU) साइन होने के दावे होते हैं, लेकिन हकीकत में वे केवल बैठकों और फोटो-ऑप तक ही सीमित रहते हैं। धरातल पर आज तक कोई ठोस आईटी या नॉलेज पार्क आकार नहीं ले पाया।
​इसके साथ ही, अगर नए निवेश को आकर्षित करना है, तो हमें पहाड़ों की दमघोंटू ट्रैफिक समस्या का भी स्थायी हल निकालना होगा। मौजूदा संकरी सड़कों के किनारे जाम बढ़ाने के बजाय, मुख्य शहरों से बाहर नए सुनियोजित सैटेलाइट टाउन और आधुनिक शहर बसाने होंगे, जहां चौड़ी सड़कें, निर्बाध बिजली, हाई-स्पीड इंटरनेट और सुगम ट्रांसपोर्ट सिस्टम हो।


​संकीर्ण सियासत की भेंट चढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर
​किसी भी राज्य की आर्थिकी उसके मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर पर टिकी होती है, लेकिन हिमाचल में बजट का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज और देनदारियां चुकाने में निकल जाता है। मोहाली में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट की नजदीकी ने पूरे इलाके का नक्शा बदल दिया। हमारे यहां रणनीतिक बुनियादी प्रोजेक्ट्स पर सिर्फ संकीर्ण सियासत होती है कि एयरपोर्ट कहां बने, जबकि कुल्लू-भुंतर पहले से मौजूद है।
​दिन-रात सोशल मीडिया और सियासी मंचों पर इस बात की नूराकुश्ती चलती है कि सांसद कंगना रनौत ने क्या कहा और मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने उस पर क्या पलटवार किया। इन सतही बयानों की राजनीति में उन असल सवालों को दफना दिया गया है जो गरीब जनता की रोजी-रोटी, बच्चों की नौकरियों और प्रदेश की आर्थिक बदहाली से जुड़े हैं।


​सरकारों को क्या करना चाहिए?
​अगर हिमाचल को वाकई आर्थिक संकट और 90 हजार करोड़ से अधिक के कर्ज के दलदल से बाहर निकालना है, तो नीति-निर्माताओं को कागजी बयानों और दौरों से बाहर निकलकर धरातल पर कड़े फैसले लेने होंगे:
​आईटी व टेक्निकल कॉरिडोर: हमीरपुर, धर्मशाला, मंडी, चंबा, सिरमौर और शिमला में आधुनिक आईटी हब और प्लग-एंड-प्ले को-वर्किंग स्पेस तैयार किए जाएं। बाहर कंपनियों में काम कर रहे या स्टार्टअप चला रहे हिमाचली युवाओं को राज्य में यूनिट लगाने पर टैक्स छूट, सस्ती बिजली और इंसेंटिव दिए जाएं।


​नए सुनियोजित शहरों का निर्माण और ट्रैफिक सुधार: पुराने शहरों के ट्रैफिक जाम से मुक्ति पाने के लिए मुख्य हाईवे और शहरों से बाहर आधुनिक सुविधाओं वाले नए टाउनशिप विकसित किए जाएं।
​स्वास्थ्य सुविधाओं का विकेंद्रीकरण: प्रमुख जिलों में पीपीपी मोड पर सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल खड़े किए जाएं, ताकि रेफर पर्ची का जानलेवा सिलसिला बंद हो और जनता का करोड़ों रुपया इलाज के नाम पर बाहर न बहे।


​व्हाइट-कॉलर जॉब्स और युवा शक्ति का संरक्षण: युवाओं को केवल छोटे-मोटे स्वरोजगार तक सीमित रखने के बजाय सॉफ्टवेयर, डेटा और कोर टेक्निकल सेक्टर में नौकरियां पैदा की जाएं, ताकि युवा भटकाव और नशे से दूर रहकर प्रदेश के निर्माण में भागीदार बन सकें।
​सचिवालय में 35 साल की ईमानदार सेवाओं, प्रोटोकॉल के दौर में बने तमाम संपर्कों और अब एक सजग पत्रकार के नाते, मेरे अंतर्मन की यह खुली पुकार है ताकि हमारे हिमाचल का पैसा, प्रतिभा और भविष्य अपनी ही माटी में फल-फूल सके।


​जनता के नाम अपील:
​यह एक ऐसा जमीनी विश्लेषण है जो मैं हर हफ्ते समय निकालकर आपके बीच लाता रहता हूं। अगर आपको यह विश्लेषण सच्चा और सटीक लगे, तो थोड़ा समय निकालकर इसे पूरा जरूर पढ़ें और कमेंट बॉक्स में अपने विचार और सुझाव जरूर दर्ज करें।
​यदि आपके मन में भी अपने इलाके, अपनी समस्याओं या प्रदेश के विकास को लेकर कोई ‘मन की बात’ या पीड़ा है, तो हमें लिखकर भेजें—पंजाब दस्तक आपकी आवाज बनकर उसे प्रमुखता से उठाएगा और सत्ता के गलियारों तक पहुंचाएगा।


​इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक करें, शेयर करें और हमारे फेसबुक पेज व चैनल को फॉलो/सब्सक्राइब जरूर करें।
​सच की आवाज, जनता की आवाज — देखते रहें पंजाब दस्तक, आपका अपना चैनल!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *